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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 80 of 178

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Page 80

७८ प्रेम-दर्शन
भगवान् पात्र समझकर कृपा करके अपने प्रेमका भेद देना चाहते
हैं। क्योंकि प्रेमी भक्त प्रेमास्पद प्रियतम भगवान्‌की इच्छा या
आज्ञा बिना उनके प्रेमका रहस्य किसीके सामने नहीं खोल
सकते। पहले साधकको पात्र बनना होता है। जब भगवान्‌के
निर्मल अत्युच्च प्रेमकी एकान्त आकांक्षा उसके मनमें उत्पन्न हो
जाती है तब उसका हृदय भगवत्प्रेमके लिये रोने लगता है। उसके
हृदयका आर्तनाद अन्तर्यामी आनन्दमय प्रभु सुनते हैं और तब
कृपा करके वे अपने किसी प्रेमी भक्तको आदेश या संकेत करके
उसके समागममें भेज देते हैं। वहाँ पहले उसके प्रेमकी परीक्षा
होती है। यदि उसका प्रेम कामनाशून्य और अनन्य होता है और
वह अपने आचरण और व्यवहारसे उस प्रेमी भक्तके हृदयमें
पात्रताका विश्वास पैदा कर देता है, तब वे उसका सन्देश
भगवान्‌के पास पहुँचाते हैं और भगवान्‌की आज्ञा प्राप्त करके
क्रमशः प्रेमका रहस्य उसके सामने खोलते हैं और धीरे-धीरे,
ज्यों-ज्यों उसकी पात्रता बढ़ती है, त्यों-ही-त्यों भगवान्‌की
आज्ञासे वे उसे भगवान्‌के प्रेमराज्यमें उत्तरोत्तर आगे बढ़ाकर ले
जाते हैं और अन्तमें उसपर भगवान्‌की पूर्ण कृपा होनेसे वह
भगवत्प्रेमको प्राप्त कर लेता है। राजा या उसका प्रेमी तो
अन्तर्यामी न होनेसे किसीके धोखेमें भी आ सकता है, परन्तु
भगवान् और भगवान्‌की इच्छासे नियुक्त होनेवाले प्रेमी भक्त
कभी धोखा नहीं खाते। अतएव जिसको भगवत्प्रेमकी प्राप्तिकी
इच्छा हो, उसे देवर्षिके बतलाये हुए साधनोंमें तत्पर होकर पहले
पात्र बनना चाहिये, जिससे उसपर भगवान्‌की कृपा हो और वह
भगवत्प्रेमी पुरुषोंके संगका पात्र समझा जाय। साथ ही ऐसे
भगवत्प्रेमी पुरुषोंके संगकी इच्छा प्रबलरूपसे बढ़ानी चाहिये,
क्योंकि इनके संग बिना भगवत्प्रेमकी प्राप्ति महान् कठिन है।