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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 84 of 178

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८२ प्रेम-दर्शन

चाहिये, न ऐसी बात सुननी चाहिये, न ऐसी चर्चा करनी चाहिये,
न वैसे स्थानमें जाना चाहिये, न वैसी पुस्तक या पत्रिका पढ़नी
चाहिये, न वैसा चित्र देखना चाहिये, न वैसी वस्तु खानी, सूँघनी
या स्पर्श करनी चाहिये और न वैसा विचार ही करना चाहिये,
जिससे हमारे चित्तमें विषयचिन्तनकी प्रबलता हो जाय। याद
रखना चाहिये कि मनुष्यमें अच्छे और बुरे भावोंकी उत्पत्ति और
वृद्धिमें कम-से-कम ये दस बातें प्रधान कारण होती हैं—स्थान,
अन्न, जल, परिवार, अड़ोस-पड़ोस, दृश्य, साहित्य, आलोचना,
आजीविकाका कार्य और उपासना। यदि ये सब सात्त्विक होते
हैं तो इनके सेवनसे सात्त्विकता बढ़ती है। इन्हींका सेवन सत्संग
है और यदि ये राजस या तामस हैं तो इनका सेवन दुःसंग है
और उससे अज्ञानकी वृद्धि होकर तमाम दोषोंका विकास हो
जाता है। अतएव दुःसंगका सब प्रकारसे सर्वथा त्याग करना
चाहिये।
कामक्रोधमोहस्मृतिभ्रंशबुद्धिनाशसर्वनाशकारणत्वात् ॥ ४४॥
४४-क्योंकि वह (दुःसंग) काम, क्रोध, मोह, स्मृतिभ्रंश,
बुद्धिनाश एवं सर्वनाशका कारण है।
भगवत्सम्बन्धी तत्त्व-रहस्य तथा लीला-कथाओंको छोड़कर
इन्द्रियोंको भोगके समय तृप्ति देनेवाले लौकिक विषयोंका
चिन्तन ही सर्वनाशकी जड़ है। चित्त निरन्तर या अधिक
समयतक जिस विषयका चिन्तन करता है, उसीमें उसकी
आसक्ति होती है। दुःसंगसे—सांसारिक विषयों और विषयी
पुरुषोंके शरीर, वाणी और मनद्वारा किये हुए संगसे स्वाभाविक
ही विषयासक्ति बढ़ती है। आसक्तिसे कामना होती है, यह
कामना ही समस्त पापोंका मूल है; कामनाकी तृप्तिसे अधिक
प्राप्तिके लिये लोभ उत्पन्न होता है और अतृप्तिसे वही कामना