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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 91 of 178

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मायासे कौन तरता है ? ८९

—'एकान्त स्थानमें रहने और मनुष्योंकी भीड़-भाड़में प्रीति
न रखनेकी आज्ञा दी है।' मनुष्य कितना भी साधन करनेकी
चेष्टा करे, परन्तु जबतक वह विषय-वासनासे जकड़े हुए
जनसमुदायमें और मोहक विषयोंसे भरे हुए स्थानोंमें रहेगा
तबतक भगवान्‌में उसका मन लगना बहुत कठिन है; इसीलिये
साधकको एकान्त देशमें रहकर भक्तिका साधन करना बतलाया
गया है। साथ ही भगवान्‌के साथ प्रेमका बन्धन बाँधनेके लिये
लोकबन्धनको तोड़ना आवश्यक है। एकान्त देशसेवनसे लोकसंग
छूट जानेके कारण लोकबन्धन स्वयमेव ही ढीला हो जायगा।
इसके अतिरिक्त भगवान्‌के रहस्य, प्रभाव और तत्त्वके साथ
मृत्युमय और दुःखालय इस लोककी तुलना करके बारम्बार
विचार करनेपर लोकबन्धन आप ही टूट जाता है।
इसके बाद भक्तिके साधकको सत्त्व, रज और तम—इन तीनों
गुणोंसे परे होना पड़ेगा। संसारका प्रकाश इन गुणोंसे ही होता है।
गुणोंका ही कार्य यह संसार है, अतएव इस संसारके पदार्थोंमें अनासक्ति
या विरक्ति होना ही निस्त्रैगुण्य या असंसारी होना है। जो मनुष्य
विषयासक्त और विषयकामी है, वही गुणबद्ध है और जो भगवदासक्त
और भगवत्प्रेमी है वही निस्त्रैगुण्य है। जो निस्त्रैगुण्य होगा वह
योगक्षेमकी चिन्ता क्यों करने लगा ? संसारमें तो उसका कोई प्रलोभन
ही नहीं है, क्योंकि वह निस्त्रैगुण्य है और मोक्षकी सिद्धिसे भी वह
निःस्पृह है; क्योंकि वह भगवान्‌का प्रेमी है। अप्राप्तकी प्राप्तिको
'योग' और प्राप्तके संरक्षणको 'क्षेम' कहते हैं। इसमें केवल
भोजनाच्छादनका भाव ही नहीं है; पारमार्थिक अर्थमें तो योगका
अर्थ है भगवत्-प्राप्ति या भगवत्-प्राप्तिका सफल साधन, और
क्षेमका अर्थ है भगवत्-प्राप्तिके साधनका संरक्षण। प्रेमी भगवद्भक्त
इन दोनों ही अर्थोंमें योगक्षेमकी परवा नहीं करता, वह तो भगवत्-