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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 82 of 178

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Page 82

प्रेमरूपा भक्तिमें प्रधान बाधा
कुसंगति है
दुःसंगः सर्वथैव त्याज्यः ॥ ४३ ॥
४३-दुःसंगका सर्वथा ही त्याग करना चाहिये।
सत्संगका महत्त्व बतलाकर अब देवर्षि दुःसंगका निषेध करते
हैं। जिस प्रकार सत्संगसे भगवत्कथा, भगवच्चर्चा, भगवन्नाम,
भगवत्प्रीति, सदाचार, शास्त्र, विवेक, वैराग्य, सत्-अभ्यास, सेवा,
सरलता, नम्रता, क्षमा, तितिक्षा, शौच, दया, अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य,
निरभिमानता और शान्ति आदिके प्रति प्रवृत्ति होती है और मनुष्य
सदाचारपरायण परमभक्त बन सकता है; इसी प्रकार इसके विपरीत
दुःसंगसे विषयवार्ता, जगच्चर्चा, लोकनिन्दा, भोगप्रीति, दुराचार,
उच्छृंखलता, अविवेक, विषयलोलुपता, दुष्ट अभ्यास, मान, दम्भ,
घमंड, क्रोध, असहिष्णुता, अपवित्रता, निर्दयता, हिंसा, असत्य,
इन्द्रियलम्पटता, अभिमान और अशान्ति आदिके प्रति प्रवृत्त होकर
मनुष्य पापपरायण और अत्यन्त विषयासक्त हो जाता है। दुःसंगसे
आसुरी सम्पत्तिके सभी दुर्गुण और दुराचारोंका विकास और विस्तार
होता है। दुःसंगसे मनुष्यके समस्त सद्गुणोंका विनाश होकर उसका
सर्वनाश हो जाता है। परम सुशीला, स्नेहमयी, प्रेमप्रतिमा देवी
कैकेयी मन्थराकी कुसंगतिके कारण ही महाराज दशरथके, भरतके,
अपने और तमाम अयोध्यावासियोंके परम शोकका कारण बनी थीं
और इसीसे उन्हें अन्तमें दुःखप्रद वैधव्यका सहन करना और प्राणप्रिय
भरतका अप्रीतिभाजन होकर रहना पड़ा था। शकुनिकी कुसंगति ही
महाभारतके भयानक संहारमें एक प्रधान कारण हुई। श्रीमद्भागवतमें
भगवान् कपिलदेव माता देवहूतिजीसे कहते हैं—