Skip to content
SarvaKosh
प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished178 pages

Page 85 of 178

Read in context
Page 85

प्रेमरूपा भक्तिमें प्रधान बाधा कुसंगति है ८३
क्रोधके रूपमें परिणत हो जाती है। इसीलिये श्रीमद्भगवद्गीतामें
भगवान् श्रीकृष्णने राग या आसक्तिरूपी रजोगुणसे उत्पन्न
कामको ही पापोंके होनेमें प्रधान कारण बतलाया है। अर्जुनने
पूछा कि 'भगवान् ! मनुष्य न चाहता हुआ भी जबरदस्ती पकड़ा-
सा जाकर किसकी प्रेरणासे पाप करता है?' इसके उत्तरमें
भगवान् स्पष्ट कहते हैं—
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥
(श्रीमद्भगवद्गीता ३।३७)
'रजोगुणसे उत्पन्न यह काम ही क्रोध है, इस महापापी
कामका पेट कभी नहीं भरता; इस विषयमें तुम इस कामको ही
(पाप करानेवाला) अपना शत्रु मानो।' यद्यपि कामसे लोभ और
क्रोध दोनों ही उत्पन्न होते हैं परन्तु संसारमें मनमानी थोड़ी ही
कामनाओंकी पूर्ति होती है; अधिकांशमें तो विफलता ही प्राप्त
होती है। विफलतामें क्रोध उत्पन्न होता है; क्रोधकी उत्पत्ति हो
जानेपर मनुष्य विवेक-विचारशून्य हो जाता है। उसे हिताहित
कुछ भी नहीं सूझता, वह पिशाचकी भाँति केवल विनाशका ही
प्रयत्न करता है। इस मोहमें उसकी स्मृति नष्ट हो जाती है, और
स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धि मारी जाती है। बुद्धिके नष्ट होनेपर वह
इस लोक और परलोकके कल्याणपथसे गिर जाता है—उसका
सर्वनाश हो जाता है। ठीक यही बात श्रीभगवान्‌ने भी गीताके
अध्याय २, श्लोक ६२-६३ में कही है—
ध्यायतो विषयान् पुंसः संगस्तेषूपजायते।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥