प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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मेरे-मेरेके अनगिनत बन्धनोंमें जीव बँधा है, इन ममताके
बन्धनोंको तोड़ना होगा। अवश्य ही सत्संग और सन्तोंकी
सेवारूपी दिव्य मणिदीपकके प्रकाशसे ममतारूपी अन्धकारमयी
रात्रिका अन्धकार बहुत कम हो जाता है, तथापि पहले सन्तसंगमें
जानेके लिये भी तो ममताको कम करनेकी आवश्यकता है।
अतएव संसारके इन ममत्वके विषयोंको दुःखरूप, अनित्य और
अज्ञानमूलक समझकर इनके प्रति मेरे भावको सर्वथा त्याग
करना चाहिये। यह समझना चाहिये कि संसारमें मेरा कुछ भी
नहीं है। जिस शरीरको मनुष्य मेरा ही नहीं वरं 'मैं' कहता है
वह भी नष्ट हो जाता है, तब फिर अन्य वस्तुओंमें मेरापन
समझना तो मूर्खता ही है। मायासे तरनेके लिये इस मेरेपनका
नाश जरूर करना चाहिये। जो ऐसा करता है वह मायासे तर
जाता है।
यो विविक्तस्थानं सेवते, यो लोकबन्धमुन्मूलयति, निस्त्रैगुण्यो
भवति, योगक्षेमं त्यजति ॥ ४७ ॥
४७-जो निर्जन स्थानमें निवास करता है, जो लौकिक
बन्धनोंको तोड़ डालता है, जो तीनों गुणोंसे परे हो जाता है
और जो योग तथा क्षेमका परित्याग कर देता है।
मायासे तरनेके लिये पूर्वसूत्रमें तीन उपाय बतलाये गये हैं,
अब इस सूत्रमें चार उपाय बतलाये जाते हैं और अगले दो सूत्रोंमें
क्रमशः पाँच उपाय या लक्षण और बतलायेंगे।
ममताका त्याग दिन-रात ममत्वकी वस्तुओंके बीचमें रहनेसे
नहीं होता; संगसे तो ममता उलटी बढ़ती है; अतएव साधकको
एकान्त-सेवन करना चाहिये। श्रीभगवान्ने भी गीतामें—
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥
(१३।१०)