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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 94 of 178

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९२ प्रेम-दर्शन
करता है वह भगवान्के लिये ही करता है, उसे उसका अपने
लिये कुछ भी फल नहीं चाहिये। उसकी न कर्ममें आसक्ति है
और न उसके फलमें; वह तो यन्त्रवत् कर्म करता रहता है। परन्तु
जहाँतक उसे यह स्मरण रहता है कि मैं यन्त्र हूँ, भगवान्के लिये
कर्म करता हूँ, वहाँतक वह कर्मफलका ही त्यागी कहा जा
सकता है; कर्मका त्यागी तो तब होगा जब उसे यह भी पता नहीं
रहेगा कि मैं भी कुछ करता हूँ। जब मन-बुद्धिके पूर्ण समर्पणसे
भगवान् उसके अहंकारको सर्वथा हरण करके स्वयं ही उसके
हृदयमन्दिरमें बैठकर कर्म करने-कराने लगेंगे, तब वह कर्मोंका
सम्पूर्ण त्यागी होकर सर्वथा निर्द्वन्द्व हो जायगा। फिर उसे सुख-
दुःख, हानि-लाभ, अपना-पराया, मैं-तू आदि द्वन्द्वोंसे कोई
प्रयोजन ही नहीं रह जायगा। परन्तु जबतक ऐसी स्वाभाविक
स्थिति न हो तबतक साधनरूपसे कर्मफलत्याग और भगवत्-
विरोधी अथवा अनावश्यक कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके निर्द्वन्द्व
होनेकी चेष्टा करनी चाहिये। श्रीभगवान् कहते हैं—
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥
(गीता २।४५)
'हे अर्जुन! वेद तीनों गुणोंके प्रकाशरूप संसारको प्रकाश
करनेवाले हैं; अतएव निस्त्रैगुण्य अथवा असंसारी (निष्कामी),
सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंसे रहित, योगक्षेमकी इच्छा न करनेवाला,
नित्य सत्त्वमें स्थित और परमात्मपरायण हो जाओ।'
वेदानपि संन्यस्यति, केवलमविच्छिन्नानुरागं
लभते॥ ४९॥