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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 79 of 178

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प्रेमरूपा भक्तिके साधन और सत्संगकी महिमा ७७
अतएव भगवत्प्रेमकी प्राप्तिके लिये ऐसे भगवत्प्रेमी महापुरुषोंके
संगकी ही प्रबल इच्छा करो। भगवत्कृपासे प्रेमी सन्त मिल
जायँगे और सन्त-मिलनके प्रतापसे ही हम पाप-तापसे छूटकर
निर्मल भगवत्प्रेमको प्राप्त कर सकेंगे। इसमें एक बड़ा रहस्य है।
मान लीजिये, एक महान् प्रतापी राजा है और साथ ही वह बड़ा
भारी प्रेमी भी है; परन्तु प्रेम हरेकके साथ नहीं होता। राजा
राजसभामें और अपने राज्यमें अपना प्रभाव और ऐश्वर्य तो खूब
दिखला सकता है, परन्तु अपने मुँहसे अपने प्रेमका रहस्य
किसीके सामने नहीं कह सकता। हम प्रजाके रूपमें विधिके
अनुसार उससे मिलकर विधिवत् बातें कर सकते हैं, परन्तु न
तो प्रेमका रहस्य पूछ सकते हैं और न वह हमें बतला ही सकता
है। उसके प्रेमका गुह्य रहस्य जानना या उसके प्रेमराज्यमें प्रवेश
करना हो तो उसके किसी अनन्य प्रेमीका—जिसके साथ राजाका
व्यक्तिगत प्रेमका निर्मल (राज्यविधिसे अतीत) सम्बन्ध है और
जिसके साथ वह परस्पर खुली प्रेमचर्चा करता है—संग करना
होगा और उसके हृदयमें अपना विश्वास पैदा करके उसके द्वारा
राजाके प्रेमका रहस्य जानना होगा और उसीके द्वारा राजाके
निकट अपना प्रेमसन्देश पहुँचाना होगा तथा अपनी पात्रता सिद्ध
करनी होगी। जब राजा हमें पात्र समझ लेगा तो हमें भी उसीकी
भाँति प्रेमगोष्ठीमें शामिल कर लेगा। इसी प्रकार भगवान् भी
अपने प्रेमका रहस्य अपने मुँहसे नहीं बतलाते। भगवान्‌ने
उद्धवको प्रेमशिक्षा दिलानेके लिये गोपियोंके पास भेजा था।
प्रियतमका प्रेमरहस्य और उसके प्रेमकी गुह्यतम बातें जैसे उसकी
प्रियतमाके द्वारा ही उसकी विश्वस्त सखियोंको मिलती है, इसी
प्रकार भगवान्‌के प्रेमका रहस्य भी भगवत्प्रेमी भक्तोंके द्वारा ही
साधकको मिलता है और मिलता भी है उसीको, जिसको