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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

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७४ प्रेम-दर्शन
जाता है। यदि कहीं ऐसे महापुरुष मिल भी जाते हैं तो उनका
पहचानना बहुत कठिन होता है। क्योंकि बाह्य आचार तो ढोंगी और
नाटकके पात्र भी किसी अंशमें वैसा ही दिखला सकते हैं। आँखोंसे
आँसुओंका बहना, रोना, हँसना और चिल्लाना ही प्रेमीके लक्षण
नहीं हैं। अनेक बाह्य कारणोंसे भी ऐसा हो सकता है। फिर कोई-
कोई सच्चे प्रेमी ऐसे भी हो सकते हैं, जो इन लक्षणोंवाली स्थितिसे
भी आगे बढ़ चुके हों और जिनके बाह्य आचार साधारण समझसे
बाहर हों। प्रेमीजन तो किसीको कहने जाते ही नहीं कि हमें प्रेमी
मानो और कहनेसे मानता भी कौन है। अतएव ऐसे निःस्पृही
भगवज्जनोंकी पहचान बहुत ही कठिन है, इसीसे उनके संगको दुर्गम
बतलाया गया है। परन्तु सौभाग्यसे यदि कहीं ऐसे महात्मा पुरुष
मिल जाते हैं तो उनका बिना जाने मिल जाना भी कभी व्यर्थ नहीं
हो सकता; क्योंकि वह अमोघ है। जब साधारण सदाचारी, विद्वान्
साधुओंका समागम ही अन्तःकरणकी शुद्धिका कारण होकर पाप,
ताप और दैन्यका निवारण करनेमें समर्थ होता है; तब जिनका हृदय
भगवत्प्रेमसे छलकता है, जो प्रेम और आनन्दकी मूर्ति हैं, जिनके
स्मरणमात्रसे ही पापोंका नाश होता है, उन भगवदीय प्रेमी महात्माओंके
दर्शनका महान् फल अवश्य ही प्राप्त होता है।
जैसे अमावस्याकी अँधेरी रातमें सोया हुआ आदमी यदि
सूर्योदय होनेपर भी सोता ही रहे तो उसको न जागनेतक
प्रकाशका अनुभव नहीं होता, परन्तु प्रकाश तो सूर्योदयके साथ-
साथ हो ही जाता है। और जैसे कोई धनी पुरुष अपने किसी
प्रेमी दरिद्र आदमीके नामपर अपनी करोड़ोंकी सम्पत्ति ट्रांसफर
करवा देता है, तो वह दरिद्र उसी समयसे धनी तो हो जाता है;
परन्तु जबतक उसको इस बातका पता नहीं लगता तबतक वह
अपनेको दरिद्र ही समझता है। इसी प्रकार किन्हीं भगवत्प्रेमी

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