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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 92 of 178

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Page 92

९० प्रेम-दर्शन
प्रेममें ही मस्त रहकर भगवत्-प्रेरणासे सदा-सर्वदा भगवदनुकूल
स्वाभाविक कर्म करता रहता है। भक्तका योगक्षेम स्वयं भगवान् ही
चलाते हैं। श्रीभगवान्‌ने गीतामें स्वयं कहा है—
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
(९।२२)
‘जो अनन्य भक्त निरन्तर मेरा चिन्तन करते हुए मेरी निष्काम
उपासना करते हैं उन नित्य मुझमें लगे रहनेवाले भक्तोंका योगक्षेम मैं
स्वयं वहन करता हूँ।’*
भोजनादिकी चिन्ता तो साधारण विश्वासी भक्तको भी नहीं
करनी चाहिये; जो भोजनादिके लिये भगवान्‌का भरोसा न रखकर
न्याय और सत्यमार्गका तथा सदाचारका त्यागकर पापकी शरण लेते
हैं वे तो एक प्रकारसे नास्तिक ही हैं। कहा है—

  • श्रीजगन्नाथपुरीमें एक सरल हृदयके सदाचारी ब्राह्मण सपरिवार रहते थे। उनको
    गीतासे बड़ा प्रेम था, वह दिन-रात गीताका अध्ययन और मनन किया करते थे। अवश्य
    ही उनका सकाम भाव अभी दूर नहीं हुआ था, परन्तु थे वे बड़े विश्वासी। एक दिन
    वे गीताके प्रत्येक शब्दका क्रियात्मक अर्थ देखना चाहते थे। पाठ करते समय जब
    उपर्युक्त श्लोकका ‘वहाम्यहम्’ शब्द आया, तब ब्राह्मण सोचने लगे कि क्या भगवान्
    अपने भक्तके लिये आवश्यक वस्तुएँ स्वयं ढोकर उसके घर पहुँचा आते हैं; नहीं, नहीं!
    ऐसा नहीं हो सकता, भगवान् किसी दूसरे साधनसे संग्रह करा देते होंगे। यह विचारकर
    ब्राह्मणने ‘वहाम्यहम्’ का अर्थ ठीक न बैठते देख गीताके उक्त पदको काटकर उसकी
    जगह ऊपर ‘करोम्यहम्’ लिख दिया। ब्राह्मण भिक्षावृत्तिसे जीवननिर्वाह करते थे।
    भगवान्‌की अपार माया है; एक दिन मूसलाधार वृष्टि होने लगी। ब्राह्मणदेवता उस दिन
    घरसे न निकल सकनेके कारण दिनभर सपरिवार भूखे ही रहे। दूसरे दिन वर्षा बन्द
    होनेपर ब्राह्मण भीखके लिये चले। उनके घरसे जानेके थोड़ी ही देर बाद एक खूनसे
    लथपथ अत्यन्त ही सुन्दर बालक ब्राह्मणके घरपर आकर ब्राह्मणीसे बोला—
    ‘पण्डितजी महाराजने यह प्रसाद भेजा है।’ ब्राह्मणी बालकके मनोहर बदनको देखकर
    और उसके मीठे वचन सुनकर मुग्ध हो गयी, परन्तु उसके शरीरसे खून बहता देखकर
    उसे बहुत ही दुःख हुआ। उसने आँसूभरे नेत्रोंसे पूछा—‘तुमको किस निठुरने मारा है?’
    बालकने ब्राह्मणीके पतिका नाम लेकर कहा कि ‘मुझको ब्राह्मणदेवताने मारा है।’