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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 93 of 178

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Page 93

मायासे कौन तरता है ? ९१
भोजनाच्छादने चिन्तां वृथा कुर्वन्ति वैष्णवाः।
योऽसौ विश्वम्भरो देवः स किं दासानुपेक्षते ॥
'वैष्णव आहारादिके लिये व्यर्थ ही चिन्ता करते हैं। जो
भगवान् समस्त विश्वके सब जीवोंका भरण-पोषण करते हैं वे
क्या अपने सेवकोंको कभी भूल सकते हैं?
यः कर्मफलं त्यजति, कर्माणि संन्यस्यति ततो निर्द्वन्द्वो
भवति ॥ ४८ ॥
४८-जो कर्मफलका त्याग करता है, कर्मोंका भी त्याग
करता है और तब सब कुछ त्यागकर जो निर्द्वन्द्व हो जाता है।
योगक्षेमकी चिन्ताका त्याग करनेवाला कर्मफलका त्यागी
होता ही है, अथवा योगक्षेमके त्यागके लिये भी कर्मफलके
त्यागकी आवश्यकता होती है। वस्तुतः अब यहाँसे प्रेमी भक्तके
लक्षणोंका आरम्भ हो गया है। ये भक्तिके साधकोंके लिये आदर्श
साधन हैं और सिद्ध प्रेमी भक्तोंके स्वाभाविक गुण ! भक्त जो कुछ
ब्राह्मणी तो अचरजमें डूब गयी; कहने लगी—'वह तो बड़े सीधे-सादे, अक्रोधी और
परम भागवत हैं; तुम-सरीखे नयनमनलुभावन बालकको वह क्यों मारने लगे ?'
बालकने कहा—'मैं सच कहता हूँ माँ! उन्होंने ही एक शूलसे मेरे बदनको काट डाला
है, उन्होंने क्यों ऐसा किया, इस बातको तो वही जानें।'
इतना कहकर और प्रसाद रखकर बालक वहाँसे चल दिया; ब्राह्मणीको
अन्यमनस्क होनेके कारण उसको जानेका पता नहीं लगा। वह कुछ भी न समझकर
अति दुःखित चित्तसे स्वामीके घर आनेकी बाट देखने लगी। समयपर ब्राह्मण घर आये।
ब्राह्मणीने विनयके साथ, किन्तु रोष और विषादभरे शब्दोंमें सारा वृत्तान्त ब्राह्मणको कह
सुनाया। पण्डितजी गृहिणीकी बात सुनकर अवाक् हो गये। गीताके श्लोकपर हरतालकी
कलम फेरनेकी घटनाको स्मरणकर वह व्याकुल हो उठे। उनकी आँखोंसे आँसुओंकी
धारा बहने लगी। ब्राह्मण अब समझे कि सचमुच ही भगवान् अपने विश्वासी भक्तके
लिये स्वयं सिरपर ढोकर आहारादि पहुँचाते हैं। गीता श्रीभगवान्‌का अंग है। गीताका
श्लोक काटनेसे भगवान्‌के शरीरपर चोट लगी है। ब्राह्मण अपनी करनीपर पश्चात्ताप
करते-करते मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। भगवान्‌ने उन्हें दर्शन देकर कृतार्थ किया।
कुछ समय बाद उठकर वे भगवान्‌से क्षमा-प्रार्थना करने लगे और भावविह्वल होकर
गीताके चारों ओर 'वहाम्यहम्' 'वहाम्यहम्' लिखने लगे !