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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 89 of 178

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मायासे कौन तरता है ? ८७
रहूगणैतत्तपसा न याति
न चेज्यया निर्वपणाद् गृहाद्वा।
नच्छन्दसा नैव जलाग्निसूर्यै-
र्विना महत्पादरजोऽभिषेकम्॥
(५।१२।१२)
प्रह्लाद कहते हैं कि 'हे पिता! जिन भगवान् श्रीहरिके
चरणोंका स्पर्श समस्त अनर्थोंकी निवृत्ति करनेवाला है, उन
श्रीहरिचरणोंमें तबतक प्रेम नहीं होता जबतक अकिंचन (सब
कुछ भगवान्‌को अर्पण कर चुकनेवाले) साधु महान् पुरुषोंकी
चरणधूलिसे मस्तकका अभिषेक न किया जाय।'
महात्मा जडभरत राजा रहूगणसे कहते हैं—
'हे रहूगण! यह भगवत्तत्त्वका ज्ञान और भगवत्प्रेम तप, यज्ञ,
दान, गृहस्थाश्रमद्वारा परोपकार, वेदाध्ययन और जल, अग्नि एवं
सूर्यकी उपासनासे नहीं मिलता। यह तो महापुरुषोंके चरणोंकी
धूलिमें स्नान करनेसे अर्थात् उनकी चरणसेवासे ही मिलता है।'
परन्तु इतना स्मरण रहे कि महापुरुषोंकी सेवाका अर्थ केवल
उनके समीप रहना या उनके शरीरकी सेवा करना ही नहीं है।
उसकी भी यथायोग्य आवश्यकता और सार्थकता है; परन्तु
जबतक हम उनके आज्ञानुसार क्रिया नहीं करते, उनके इशारेपर
नहीं चलते एवं उनकी रुचिके अनुसार अपना जीवन निर्माण नहीं
करते तबतक सेवामें त्रुटि ही समझनी चाहिये। अतएव इस
बातको समझकर सर्वदा और सर्वथा महानुभावोंकी सेवा करनी
चाहिये।
परन्तु इसमें ममता एक बड़ी बाधा है। ममताके बन्धनसे
सन्तसेवा ही नहीं हो सकती। घर मेरा, शरीर मेरा, परिवार मेरा,
धन मेरा, सम्बन्धी मेरे, मकान मेरा, जमीन मेरी—इस प्रकार