प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextसाधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्।
मदन्यत्ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥
(श्रीमद्भा० ९।४।६८)
'साधु मेरे हृदय हैं और मैं उनका हृदय हूँ। वे मेरे सिवा और
किसीको नहीं जानते तथा मैं उन्हें छोड़कर और किसीको नहीं
जानता।' भरत रामको भजते हैं और राम भरतको—
भरत सरिस को राम सनेही। जगु जप राम रामु जप जेही॥
श्रीभगवान्ने प्रेमस्वरूपा गोपियोंके सम्बन्धमें कहा है—
मन्माहात्म्यं मत्सपर्यां मच्छ्रद्धां मन्मनोगतम्।
जानन्ति गोपिकाः पार्थ नान्ये जानन्ति तत्त्वतः॥
'हे अर्जुन ! मेरा माहात्म्य, मेरी पूजा, मेरी श्रद्धा और मेरे मनकी
बात तत्त्वसे केवल गोपियाँ ही जानती हैं और कोई नहीं जानता।'
ऐसे प्रेमी भक्तोंमें और भगवान्में क्या अन्तर है? भगवान्ने कहा
ही है—
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥
(गीता ९।२९)
'जो प्रेमसे मुझको भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ।' ऐसे
भक्त भगवत्प्रेममें इस प्रकार तल्लीन रहते हैं कि वे अपने बाह्य
रूपको भूलकर साक्षात् भगवत्-स्वरूपका अनुभव करने लगते
हैं। गोपियाँ भगवान्को ढूँढ़ती हुई ऐसी तन्मय हो गयीं कि वे
उन्हींकी लीला करने लगीं—
मोहन लाल रसालकी लीला इनहीं सोहैं।
केवल तन्मय भई कछु न जानें हम को हैं॥
(नन्ददासजी)
तदेव साध्यतां तदेव साध्यताम्॥ ४२॥
४२- (अतएव) उस (महत्संग)-की ही साधना करो,
उसीकी साधना करो।