प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextप्रेमरूपा भक्तिके साधन और सत्संगकी महिमा ७९
इसीसे भगवान् अपने निर्मल प्रेमके प्रचारार्थ ऐसे भक्तोंको,
मुक्तिके पूर्ण अधिकारी होनेपर भी, उनके मनमें प्रेमकी वासना
जागृत रखकर उन्हें सायुज्य मुक्ति नहीं देते, और इसीसे प्रेमी
भक्तगण इस प्रेम-लीला-सुखको छोड़कर मुक्तिकी कभी चाह
नहीं करते। वे मुक्त होकर भी केवल प्रेमवितरणके लिये ही
संसारमें आया करते हैं या निवास करते हैं। वे अहैतुक कृपालु
होते हैं। हमारी तीव्र इच्छा पावेंगे तो भगवत्कृपासे भगवान्का
संकेत प्राप्तकर अपने पुण्यमय दर्शन-स्पर्श-भाषण और अपनी
महती कृपासे हमें अवश्य प्रेमदान करेंगे। क्योंकि वे तो प्रेमी
जनोंकी खोजमें ही रहते हैं। उनका काम ही प्रेमदान करना है।
अतएव उन्हीं भगवत्संगी प्रेमी महानुभावोंका संग प्राप्त करो,
उन्हींकी कृपाकी इच्छा करो।
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