प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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'विषयोंके चिन्तनसे मनुष्यकी विषयोंमें आसक्ति होती है,
आसक्तिसे कामना उत्पन्न होती है, (कामकी तृप्तिमें बाधा
होनेसे) उस कामसे ही क्रोध उत्पन्न होता है, क्रोधसे सम्मोह
होता है, सम्मोहसे स्मृतिभ्रंश, स्मृतिभ्रंशसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे
(पुरुषका) सर्वनाश हो जाता है।'
सर्वनाशके कारणभूत विषयोंका चिन्तन होनेमें विषय और विषयी
पुरुषोंका संग ही प्रधान है, यही दुःसंग है; अतएव इसका सर्वथा
त्याग करना चाहिये।
तरंगायिता अपीमे संगात्समुद्रायन्ति ॥ ४५ ॥
४५-ये (काम-क्रोधादि) पहले तरंगकी तरह (क्षुद्र
आकारमें) आकर भी (दुःसंगसे विशाल) समुद्रका आकार
धारण कर लेते हैं।
जबतक दोषोंका समूल विनाश न हो जाय, तबतक तनिक-से
दोषसे डरते ही रहना चाहिये; जैसे ईंधनमें दबी हुई जरा-सी चिनगारी
हवाके जोरसे विशाल अग्निका रूप धारण कर लेती है, इसी प्रकार
दबा हुआ जरा-सा भी दोष कुसंग पाते ही पनपकर विशाल रूप
धारण कर लेता है। पहले-पहल जब मनमें काम-क्रोधका विकार
उत्पन्न होता है तो उसकी एक लहर-सी ही आती है, परन्तु कुसंग
पाते ही वह लहर समुद्र बन जाती है; फिर चारों ओरसे सारे हृदयपर
उसीका अधिकार हो जाता है, सद्विचारके प्रवेशकी भी गुंजाइश नहीं
रह जाती; उससे सर्वनाश ही होता है। अतएव यह नहीं समझना
चाहिये कि हमारे अन्दर सद्गुण अधिक हैं और दोष कम हैं, इससे
कुसंगसे हमारी क्या हानि होगी! वरं सदा-सर्वदा अत्यन्त सावधानीके
साथ सब प्रकारसे कुसंगका त्याग ही करना चाहिये।
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