मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
by पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार)
४ मत्तविलास-प्रहसन
'नटैर्यत् प्रदर्श्यते तन्नाट्यम् । तत्र नृत्यगीतादीनां प्रवेशो नास्ति ।'¹
अर्थात् नटों के द्वारा जो प्रदर्शित किया जाता है तथा जिसमें नृत्त
गीतादि का समावेश नहीं होता है वह नाट्य कहलाता है। परन्तु महिमभट्ट
ने नाट्य में गीत का प्रयोग स्वीकार किया है। उनके मत में नाट्य 'वाक्या-
र्थाभिनयात्मक' तथा रसाश्रय होता है।² नन्दिकेश्वर के मतानुसार आदर्श
पूर्वकथा के अभिनय को नाट्य कहते हैं।³ वे नाट्य की प्रतिष्ठा सत्त्व में
मानते हैं—
'सत्त्वे नाट्यम् प्रतिष्ठितम् ।' (अभि० दर्पण, १५)
नाट्य का मुख्य धर्म है—कथनोपकथन; आचार्यों की मान्यता है कि
कथनोपकथन के बिना अनुकृति अधूरी होगी; इसलिए नाट्य में वाचिकाभिनय
का विशेष महत्त्व है।⁴
नाटक का उद्भव
नाटक की उत्पत्ति कब और कैसे हुई यह संस्कृत साहित्य का एक
विवादास्पद विषय है। आदि काल से ही मानव हृदय में अनुकरण की प्रवृत्ति
रही और उसका काल-क्रम से विकास होकर नाटक के रूप में उसकी परिणति
हुई यह पौराणिक मान्यता है। 'ऋग्वेद' में यम-यमी संवाद (१०.१०) पुरूरवा-
उर्वशी संवाद (१०.९५), अगस्त्य-लोपामुद्रा संवाद (१.१७९) और विश्वा-
मित्र-नदी संवाद (३.३३) आदि नाटक के बीज माने जाते हैं। 'रामायण'
में भी नट, नर्तक, नाटक, रङ्ग एवं कुशीलव आदि का प्रयोग और 'महाभारत'
में रङ्गशाला, नट आदि का उल्लेख इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि नाटकों
का विकास अवश्य होने लगा था। भारतीय परम्परा नाटक को पंचम वेद
ही मानती है और इसका साक्षात् प्रमाण है—भरतमुनि का 'नाट्यशास्त्र'।
१. उद्धृत—वाचस्पति गैरोला, 'भारतीय नाट्यपरम्परा और अभिनय-
दर्पण,' पृ० ७६
२. वही, पृ० ७७
३. अभि० दर्पण, १५
४. वाचस्पति गैरोला, 'भारतीय नाट्यपरम्परा और अभिनयदर्पण', पृ० ८०
भूमिका ५
इसके प्रथम अध्याय में ही नाटक की उत्पत्ति के विषय में लिखा है कि त्रेता
युग में ब्रह्मा द्वारा नाटक की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा ने 'ऋग्वेद' से पाठ्य 'सामवेद'
से गान, 'यजुर्वेद' से अभिनय और 'अथर्ववेद' से रस इन चार तत्त्वों को ग्रहण
किया-
जग्राह पाठ्यमृग्वेदात्सामभ्यो गीतमेव च ।
यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादपि ॥
ब्रह्मा की प्रेरणा से विश्वकर्मा ने नाट्यगृह की रचना की और
भरतमुनि ने अभिनय की व्यवस्था की। भरत ने अपने सौ शिष्यों और
अप्सराओं को नाट्य कला की शिक्षा दी। इस नाट्य कला को पूर्ण करने
के लिए शिव ने नाट्य के साथ ताण्डव, पार्वती ने लास्य नृत्य और विष्णु ने
नाट्य रीति प्रदान की। इस प्रकार भरत ने नाट्यशास्त्र का प्रणयन कर
नर लोक में नाट्य का प्रचार किया।
शुभङ्करकृत 'सङ्गीतदामोदर' में नाटक की उत्पत्ति के विषय में लिखा
है कि—प्राचीन काल में इन्द्र के द्वारा प्रार्थना किए जाने पर ब्रह्मा ने वेदों
से आकर्षण कर पञ्चम नाट्य वेद को बनाया ऐसा सुना जाता है। स्मृति
में चार वेद और एक उपवेद कहे गये हैं। उनमें शिव ने ब्रह्मा को गन्धर्व-
वेद (नाट्यवेद) उपवेद बताया। ब्रह्मा ने भरत को बताया और भरत के
द्वारा उसका मर्त्यलोक में प्रचार किया गया। अतः शिव, ब्रह्मा और भरत
इस नाट्यवेद के प्रयोजक माने गये हैं—
इहानुश्रूयते ब्रह्मा शक्रेणाभ्यर्थितः पुरा।
चकाराऽकृष्य वेदेभ्यो नाट्यवेदं तु पञ्चमम् ॥
उपवेदोऽथ वेदाश्च चत्वारः कथिताः स्मृतौ ।
तत्रोपवेदो गान्धर्वः शिवेनोक्तः स्वयम्भुवे ॥
तेनाऽपि भरतायोक्तस्तेन मर्त्ये प्रचारितः।
शिवाऽब्जयोनिभरतास्तस्मादस्य प्रयोजकाः ॥
इस प्रकार अत्यन्त प्राचीन समय से लेकर वेद-शास्त्र और 'रामायण'
'महाभारत' आदि से नाटक की स्वतन्त्र रूप से उत्पत्ति प्रमाणित होती है।
रूपक के भेद
धनंजय के अनुसार रसों पर आश्रित रूपक दस प्रकार के होते हैं—
'दशधैव रसाश्रयम्' ।
६ मत्तविलास-प्रहसन
धनञ्जय रूपकों के भेद को एक और स्वरूप देते हैं—(१) शुद्ध रूपक
और (२) संकीर्ण रूपक ।
वस्तु, नेता और रस के आधार पर एक दूसरे से भिन्न स्वरूप वाले
दस रूपक ही शुद्ध रूपक हैं। इनमें से दो या तीन रूपकों के कतिपय लक्षणों
का मिश्रण जिस रूपक में पाया जाता है वह रूपक का संकीर्ण भेद है जैसे
नाटक और प्रकरण के लक्षणों का संकर होने के कारण नाटिका संकीर्ण
रूपक है। कुछ व्याख्याकारों ने नाटिका और प्रकरणिका दोनों को पृथक्
पृथक् संकीर्ण रूपक माना है (ना०द० १.३) । लेकिन धनिक ने इस मत
का खण्डन करके नाटिका और प्रकरणिका को रूपकों में जोड़कर बारह रूप
मान लिये हैं।
'दशरूपक' में शुद्ध रूपकों का वर्णन इस प्रकार है—
नाटकं सप्रकरणं भाणः प्रहसनं डिमः ।
व्यायोगसमवकारौ वीथ्यङ्केहामृगा इति ॥ (१.८)
अर्थात् नाटक, प्रकरण, भाण, प्रहसन, डिम, व्यायोग, समवकार, वीथी,
अङ्क और ईहामृग ।
संस्कृत साहित्य में प्रहसन
जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, प्रहसन का विषय मुख्य रूप से
हास्य ही होता है—'प्रकृष्टं हसत्यनेनेति प्रहसनम् ।' संस्कृत साहित्य के इतिहास
में प्रहसन का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है । संस्कृत के विभिन्न आचार्यों ने समय-
समय पर प्रहसन की भिन्न-भिन्न परिभाषाएँ प्रस्तुत की हैं। धनञ्जय के
मतानुसार प्रहसन नामक रूपक भेद वस्तु, सन्धि, सन्ध्यङ्ग, अङ्क तथा
लास्यादि में भाण की तरह होता है—
'भाणवद्वस्तुसन्धिसन्ध्यङ्गलास्यादीनामतिदेशः ।' (दश० ३)
प्रहसन की कथावस्तु कल्पित होती है, एक या दो अङ्क होते हैं, धूर्त, पाखण्डी
विप्र तथा कामुक आदि पात्र होते हैं; इसमें विष्कम्भक और प्रवेशक नहीं
होते हैं; इसमें अधिकतर भारती वृत्ति होती है; इसका अङ्गी रस हास्य होता
है और लास्य के दस अङ्गों का प्रयोग होता है ।
यह प्रहसन तीन प्रकार का होता है—(१) शुद्ध, (२) विकृत और
(३) सङ्कर
भूमिका ७
'तद्द्वत्प्रहसनम् त्रेधा शुद्धवैकृतसङ्करैः' ।
शुद्ध प्रहसन पाखण्डी, विप्र, चेट, चेटी और विट आदि पात्रों से युक्त होता है
उनके आचरण, वेष तथा भाषा से युक्त होता है तथा इनमें कथनोपकथन
हास्य-युक्त होता है—
पाखण्डिविप्रप्रभृति चेटचेटीविटाकुलम् ।
चेष्टितं वेषभाषाभिः शुद्धं हास्यवचोन्वितम् ॥ (दश० ३.५४)
विश्वनाथ के अनुसार जहाँ नायक धृष्ट होता है वह हास्य-विषयक
प्रहसन शुद्ध कहलाता है—
'एको यत्र भवेद् धृष्टो हास्यं तच्छुद्धमुच्यते ।' (सा०द० ६.२६६)
जैसे—'कन्दर्पकेलि' ।
शुद्ध प्रहसन में तपस्वी, संन्यासी और ब्राह्मण श्रेणी के व्यक्तियों में से
किसी एक श्रेणी के व्यक्ति को धृष्ट नायक के रूप में चित्रित किया जाता है
और जिसमें हास्य रस प्रमुख होता है ।
विकृत प्रहसन कामुक आदि की भाषा और वेष को धारण करने
वाले नपुंसक, कञ्चुकी तथा तपस्त्री आदि पात्रों से युक्त होता है—
'कामुकादिवचोवेषैः षण्डकञ्चुकितापसैः विकृतम् ।' (दश०३.५५)
संकीर्ण प्रहसन वीथी के अङ्गों से मिश्रित तथा धूर्तों से भरा हुआ
होता है—
'सङ्कराद् वीथ्या सङ्कीर्णं धूर्तसङ्कुलम् ।' (दश० ३.५६)
परन्तु जहाँ एक ओर कुछ आचार्य प्रहसन के तीन भेद मानते हैं,
दूसरी ओर भरतमुनि, नाट्यदर्पणकार अभिनवगुप्त आदि प्रहसन के शुद्ध और
सङ्कीर्ण ये दो.ही भेद मानते हैं । भरतमुनि के अनुसार विकृत नामक प्रहसन
का सङ्कीर्ण में ही अन्तर्भाव हो जाता है —
'इदं (विकृतं) तु सङ्कीर्णेनैव गतार्थमिति मुनिना पृथङ् नोक्तम् ।'
(सा० द० ६०)
हास्य के भेद
प्रहसन हास्य-रस प्रधान होता है । अतः प्रहसन के भेदों का निरूपण
करने के पश्चात् हास्य के भेदों को भी स्पष्ट करना युक्तिसङ्गत होगा ।
८ मत्तविलास-प्रहसन
पण्डितराज जगन्नाथ और धनञ्जय के अनुसार हास्य रस दो प्रकार
का होता है-
(१) आत्मस्थ, (२) परस्थ ।
आत्मस्थ 'अपने' विकृत वेष-भाषा आदि विभावों का आलम्बन करके
उत्पन्न होने वाला हास है, और 'परस्थ' (दूसरे) के विकृत वेष तथा भाषा
आदि विभावों का आलम्बन करके उत्पन्न होने वाला हास है —
'विकृताकृतिवाग्वेषैरात्मनोऽथ परस्य वा ।'
(दश० ४.७५)
यह हास उत्तम, मध्यम तथा अधम प्रकृति का होने से छः प्रकार का
हो जाता है- (१) आत्मस्थ उत्तम प्रकृति, (२) आत्मस्थ मध्यम प्रकृति, (३)
आत्मस्थ अधम प्रकृति, (४) परस्थ उत्तम प्रकृति, (५) परस्थ मध्यम प्रकृति,
(६) परस्थ अधम प्रकृति ।
इस हास के पुनः छः भेद और होते हैं - (१) स्मित, (२) हसित, (३)
विहसित, (४) उपहसित, (५) अपहसित, और (६) अतिहसित ।
'स्मित' हास में केवल नेत्र विकसित होते हैं । 'हसित' में दाँत कुछ-
कुछ दिखाई देते हैं । 'विहसित' में मधुर स्वर होता है । मधुर स्वर (विहसित)
जब सिर हिलाने के साथ होता है तो 'उपहसित' कहलाता है । 'अपहसित'
वह है जिसमें नेत्र अश्रुयुक्त हो जाते हैं और 'अतिहसित' में अङ्गों को इधर-
उधर पटका जाता है-
स्मितमिह विकासिनयनं किञ्चिल्लक्ष्यद्विजं तु हसितं स्यात् ।
मधुरस्वरं विहसितं सशिरःकम्पमिदमुपहसितम् ॥ ७६ ॥
अपहसितं सास्त्राक्षं विक्षिप्ताङ्गं भवत्यतिहसितम् ।
द्वे द्वे हसिते चैषां ज्येष्ठे मध्येऽधमे क्रमशः ॥ ७७ ॥
(दश० ४)
इनमें से दो दो उत्तम, मध्यम और अधम प्रकृति के हुआ करते हैं,
अर्थात् स्मित और हसित उत्तम जन को, विहसित और उपहसित मध्यम
जन को और अपहसित तथा अतिहसित अधम जन को हुआ करते हैं ।
इस प्रकार प्रहसन में हास्य के छः भेदों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग
किया जाना चाहिए-
भूमिका ६
'रसस्तु भूयसा कार्यः षड्विधो हास्य एव च ।' (दश० ३ ५६)
काव्यशास्त्रियों द्वारा दी गई प्रहसन की विभिन्न परिभाषाओं के
आधार पर यह कहा जा सकता है कि संस्कृत में समय-समय पर प्रहसन
अवश्य लिखे गए होंगे । 'कन्दर्पकेलि', 'सागर-कौमुदी', 'केलिकेलि', 'हास्यार्णव',
'धूर्तचरितम्', 'सैरन्ध्रिका', 'लटकमेलकम्', 'भगवदज्जुकीयम्', 'मत्तविलास',
'धूर्तसमागम', 'कौतुकरत्नाकर', 'धूर्तनर्तक', 'डमरूक' और 'कौतुकसर्वस्व' आदि
प्रहसन संस्कृत साहित्य में लिखे गए परन्तु इनमें से कुछ प्रहसन ही अंशतः
या पूर्णरूप से उपलब्ध होते हैं ।
संस्कृत साहित्य के प्रहसनों में एक मार्मिक व्यंग्य होने के कारण
उनकी बड़ी ख्याति और लोकप्रियता भी रही है । उनमें यद्यपि अश्लीलता
भी कहीं-कहीं दिखाई देती है, किन्तु चार्वाक, जैन, बौद्ध, कापालिक आदि
वेद विरोधी धर्मानुयायियों के प्रति उनमें जो आक्षेप किए गए हैं, वे बड़े ही
मार्मिक हैं ।५
महेन्द्रविक्रमवर्मा और 'मत्तविलास'
महामहोपाध्याय टी० गणपति शास्त्री द्वारा १९१७ ई० में 'त्रिवेन्द्रम
संस्कृत सीरीज' में प्रकाशित पल्लववंशीय राजा महेन्द्रविक्रमवर्मा द्वारा रचित
'मत्तविलास' प्रहसन संस्कृत साहित्य का प्राचीनतम प्रहसन माना जाता है ।
बोधायनकृत 'भगवदज्जुकीय' प्रहसन का उल्लेख मामण्डूर शिलालेख में
मिलता है—
“ ......गवदज्जुकमत्तविलासादि .........”
इस कारण से कुछ विद्वान् इस प्रहसन को भी राजा की ही रचना
मानते हैं ।
कवि का समय
सातवीं शताब्दी के राजनैतिक इतिहास के विषय में जितनी अधिक
जानकारी उपलब्ध है, उतनी उसके पहले की शताब्दियों के इतिहास की नहीं
है। इस शताब्दी के पूर्वार्द्ध में उत्तरी भारत पर अधिकांशतः स्थाण्वीश्वर के
गौरवशाली राजा हर्षवर्धन का प्रभुत्व था (६०६ ई०-६४७ ई०) । नर्मदा के
५. वाचस्पति गैरोला, 'संस्कृत साहित्य का इतिहास', पृ० ८२२ ।
१० मत्तविलास-प्रहसन
दक्षिण में महाराष्ट्र और कर्नाटक के प्रान्तों पर शक्तिशाली चालुक्यवंशीय
राजाओं का और सुदूर दक्षिण में कावेरी तट तक उतने ही प्रभावशाली
पल्लववंश के राजाओं का अधिकार था । चालुक्यवंशीय राजा पुलकेशी द्वितीय
ने अपनी शक्तिशाली सेना की सहायता से नर्मदा नदी के पश्चिमी तट से पूर्वी
तट तक अपना राज्य फैला लिया था । उसने अपने प्रतिद्वन्द्वी हर्षवर्धन की
सेना को दक्षिण की ओर बढ़ने से रोक दिया था, जैसा कि ऐहोल शिलालेख
में उल्लेख मिलता है—
'भयविगलितहर्षो येन चाकारि हर्षः ।' २३
और दक्षिण में, पुलकेशी द्वितीय ने ही अपने दूसरे प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी पल्लव-
वंशीय राजा महेन्द्रविक्रमवर्मा को परास्त करके उसे उसकी राजधानी
काञ्चीपुरी की चारदीवारी के भीतर कर दिया —
उद्भूतामलचामरध्वजशतच्छत्रान्धकारैर्बलैः
शौर्योत्साहरसोद्धतारिमथनैमौलादिभिः षड्विधैः ।
आक्रान्तात्मबलोन्नतिं बलरजः सञ्छन्नकाञ्चीपुर-
प्राकारान्तरितप्रतापमकरोद्यः पल्लवानां पतिम्⁶॥ २६
आकर्षक बात यह है कि इन तीनों ही राजाओं की साहित्य की ओर
विशेष रुचि रही । हर्षवर्धन तीन रूपकों—'प्रियदर्शिका', 'रत्नावली' और
'नागानन्द' के रचयिता हैं, यह सभी को ज्ञात है; महेन्द्रविक्रमवर्मा ने 'मत्त-
विलास' प्रहसन और सम्भवतः 'भगवदज्जुककीय' प्रहसनों की रचना की । पुल-
केशी द्वितीय की लिखी कोई रचना उपलब्ध नहीं है परन्तु उसकी विकट-
नितम्बा नामक पुत्रवधू ने कई रमणीय सुभाषित लिखे ।
इस प्रकार पुलकेशी द्वितीय के ऐहोल शिलालेख के आधार पर महेन्द्र-
विक्रमवर्मा का समय सातवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध निर्धारित होता है । पुलकेशी
द्वितीय का समय ६०९ ई० से लेकर ६४२ ई० के लगभग माना गया है । पुनः
महेन्द्रविक्रमवर्मा की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र नरसिंहवर्मा प्रथम राज्य का
उत्तराधिकारी बना और उसने ६३० ई० से ६६८ ईं० तक राज्य किया ।
'मत्तविलास' प्रहसन की प्रस्तावना में सूत्रधार के कथनानुसार
महेन्द्रविक्रमवर्मा, पल्लववंशीय राजा सिंहविष्णुवर्मा के पुत्र
6. Aihole Stone Inscription of Pulakesin II.
भूमिका ११
थे।७ सिंहविष्णुवर्मा का शासन-काल ५७५ ई० से ६०० ई० तक माना
जाता है। महेन्द्रविक्रमवर्मा अपने पिता के पश्चात् सातवीं शताब्दी के
प्रारम्भ में राजसिंहासन पर आरूढ़ हुए। अतः महेन्द्रविक्रमवर्मा का समय
६०० ई० से लेकर ६३० ई० तक मानना ही उचित है।
इस प्रकार बाह्य और अन्तः प्रमाणों के आधार पर महेन्द्रविक्रमवर्मा
का समय सातवीं शताब्दी का प्रारम्भ ही निर्धारित होता है।
जीवन-चरित
किम्बदन्ती के अनुसार महेन्द्रविक्रमवर्मा प्रारम्भ में जैन धर्मानुयायी
थे और बाद में उन्होंने शैव धर्म स्वीकार कर लिया था। 'पेरीयपुराणम्' में
उपलब्ध विवरण के अनुसार तिरुणावुक्करशु नामक एक अप्पार (साधु),
जो स्वयं जैन धर्म के अत्याचारों से पीड़ित होने के कारण शैव हो गया था,
उसने अपनी चमत्कारिणी शक्ति के द्वारा महेन्द्रविक्रमवर्मा को शैवधर्मानुयायी
बना दिया। इस बात की पुष्टि इस तथ्य से होती है कि इस राजा के द्वारा
निर्मित अनेक शिव मन्दिर बल्लम (चिंगलपेट), महेन्द्रवाड़ी (उत्तर अरकोट)
दड़वानूर (दक्षिण अरकोट), शिष्यमङ्गलम् और पल्लावरम् में हैं। सम्भवतः
इसी राजा ने जो विभिन्न मन्दिर बनवाए उनके स्तम्भों और दीवारों पर
तत्कालीन शासनरत राजाओं की विभिन्न उपाधियों को खुदवाने की प्रथा
प्रारम्भ की थी। उन उपाधियों में महेन्द्रविक्रमवर्मा के लिए प्रयुक्त ये उपनाम
भी मिलते हैं—गुणभर, पुरुषोत्तम, सत्यस्यन्द, अवनिभाजन, विचित्रचित्त,
नरेन्द्र, ललिताङ्ककुर, शत्रुमल्ल इत्यादि ।८ परन्तु शैव होने पर भी इस राजा
की अन्य धर्मों के प्रति पूर्ण श्रद्धा थी। इस तथ्य की पुष्टि महेन्द्रवाड़ी में
महेन्द्रतड़ाग के किनारे पर चट्टानों को काटकर महेन्द्रविक्रमवर्मा द्वारा
बनवाए गए महेन्द्रविष्णुगृह नाम के विष्णुमन्दिर से होती हैं।९ पुनः इस
राजा के विषय में प्राप्त मड्डगपट्टु (तमिलनाडु) अभिलेख इस ओर संकेत
७. पल्लवकुलधरणिमण्डलकुलपर्वतस्य सर्विनयविजितसमस्तसामन्तमण्डलस्य
आखण्डलसमपराक्रमश्रियः श्रीमहिमानुरूपदानविभूतिपरिभूतराजराजस्य
श्रीसिंहविष्णुवर्मणः पुत्रः शत्रुषद्वर्गनिग्रहपरः परहितपरतन्त्रतया महा-
भूतसधर्मा महाराजः श्रीविक्रमवर्मा नाम।
8. R. Gopalan, History of the Pallavas of Kanchi, p. 90.
9. Ibid., p, 90.
१२ मत्तविलास-प्रहसन
करता है कि राजा विचित्रचित्त ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश का भी एक
मन्दिर बनवाया था ।$^{१०}$ यह मन्दिर ईंट, काष्ठ, लोहा, चूने आदि के बिना
ही बना था। स्पष्ट रूप से यह चट्टानों को काटकर बनाए गए मन्दिरों का
संकेत करता है जिनका कि महाबलिपुरम् में महेन्द्रविक्रमवर्मा के उत्तरवर्ती
राजाओं नृसिंह व महामल्ल के समय तक पूर्ण विकास हो चुका था।
महेन्द्रविक्रमवर्मा एक प्रतिभाशाली और सुयोग्य शासक था। वह उच्च-
कोटि का विद्वान् और संस्कृत साहित्य का एक मर्मज्ञ कवि भी था। सङ्गीत
के प्रति उसकी विशेष रुचि थी। 'मत्तविलास' प्रहसन में आए विभिन्न सन्दर्भ
उसके नाना प्रकार के गुणों का संकेत करते हैं;$^{११}$ प्रज्ञा, दान, दया, अनुभाव,
धृति, कान्ति, कलाकौशल, सत्य, पराक्रम, निष्कपटता, विनय इत्यादि गुण
महेन्द्रविक्रमवर्मा की शरण में वैसे ही चले गये जैसे कि प्रलयकाल में सभी
सृष्टियाँ जगत् के आदि-पुरुष की शरण में चली जाती हैं।$^{१२}$ वह अपने राज्य
में सभी प्रकार की कविताओं का आदर किया करता था। सज्जनों की
अल्पसार वाली कविताओं का भी वह सम्मान करता था।$^{१३}$ इन्हीं गुणों के
कारण वह 'गुणभर' अर्थात् गुणियों का भरण करने वाला था। माना जाता
है कि वह संगीतज्ञ भी था और 'दक्षिणचित्र' नामक संगीत विषयक ग्रन्थ की भी
रचना उसने की थी,$^{१४}$ परन्तु वह उपलब्ध नहीं है। उसके राज्य-काल में
काञ्चीपुरी पूर्ण रूप से समृद्धि और भोग-विलास से परिपूर्ण थी।$^{१५}$
१०. एतदनिष्टकमद्रुममलोहमसुधं विचित्रचित्तेन ।
निर्मापितं नृपेण ब्रह्मेश्वरविष्णुलक्षितायतनम् ॥
११. ----शत्रुषड्वर्गनिग्रहपरः परहितपरतन्त्रतया महाभूतसधर्मा...... ।
१२. प्रज्ञादानदयानुभावधृतयः कान्तिकलाकौशलं
सत्यं शौर्यममायताविनय इत्येवम्प्रकारा गुणाः ।
अप्राप्तस्थितयः समेत्य शरणं याता यमेकं कलौ
कल्पान्ते जगदादिमादिपुरुषं सगंप्रभेदा इव ।।३।।
१३. आकरे सूक्तिरत्नानां यस्मिन् गुणगरीयसाम् ।
अर्घन्ति बहुसूक्तानि सतां सारलघून्यपि ॥४॥
14. R. Gopalan, History of the Pallavas of South India, p. 93.
१५ अहो नु खलु विमानशिखरविश्रान्तघनरसितसन्दिग्धमृदङ्गशब्दस्य
मधुसमयनिर्माणमातृकायमानमाल्यापणस्य कुसुमशरविजयघोषणायमानवर-
युवतिकाञ्चीरवस्य काञ्चीपुरस्य परा विभूतिः ।
भूमिका १३
'मत्तविलास' में दार्शनिक सम्बन्ध
महेन्द्रविक्रमवर्मा ने 'मत्तविलास' में तत्कालीन धार्मिक परिस्थितियों का
सजीव चित्रण किया है। गुप्तकालीन धार्मिक सहिष्णुता के स्थान पर
धार्मिक ईर्ष्या द्वेष जन्म ले रहा था। शैव धर्म के सम्प्रदायों में कापालिक
तथा पाशुपत जैसे सम्प्रदाय हो गए थे। बौद्ध धर्म प्रमुख रूप से ह्रासोन्मुख
हो चुका था। सभी वेदान्तियों और नैयायिकों ने दृढ़ रूप से बौद्धों के मत का
खण्डन किया। बौद्ध धर्म व जैन धर्म में जो कुरीतियाँ थीं उनको हास्य के
माध्यम से कवि ने इस प्रहसन में प्रस्तुत किया है। इस प्रहसन में शाक्य-
भिक्षु नागसेन है। इस पात्र का नाम नागसेन सम्भवतः व्यंग्य को प्रदर्शित
करने के लिए ही रखा गया है। नागसेन 'मिलिन्दपञ्हो' (राजा मिलिन्द
के प्रश्न) का एक बहुत बड़ा बुद्धिमान् दार्शनिक है। प्रस्तुत प्रहसन में
नागसेन के चरित्र को भ्रष्ट रूप में दिखाते हुए कवि ने 'मिलिन्दपञ्हो' के
नागसेन का अनादर कर दिया है।
बौद्ध धर्म में अनेक कुरीतियां आ गईं थीं। बौद्ध मठ और राज-
विहार भोग-विलास के स्थल बन गए थे। बुद्ध ने संघ के लिए महलों में
रहना, सुन्दर गद्दे वाले पलँगों पर सोना, दिन के पहले पहर खाना, दूसरे
पहर मधुर पेय पीना, पाँच सुगन्धों से युक्त पान खाना, महीन वस्त्र पहनना
आदि१६—इन सब की अनुमति दी थी। अतः नागसेन कहता है कि जब बुद्ध
ने इन सबका अनुमोदन किया तो स्त्री-सहवास और मद्यपान की अनुमति
ही क्यों नहीं दी ? उसके विचार से बुद्ध ने अवश्य ही इन दोनों का भी
विधान किया होगा, लेकिन वृद्ध लोगों ने इन युवकों के प्रति ईर्ष्या के कारण
कहीं छिपा दिया होगा। कापालिक के साथ कलह में जब देवसोमा नागसेन
को मदिरा देती है तो वह उसे परम सौभाग्य मानता है; परन्तु उसे बड़े लोगों
के द्वारा देखने का डर है ।१७ इससे स्पष्ट होता है कि बौद्ध भिक्षु लोगों की
१६. भोः ! परमकारुणिण भअवदा तहागएण पासादेसु वासो, सुविहि-
असय्येसु पज्जङ्केसु सअणं, पुव्वण्हे भोअणं, अवरण्हे सुरसाणि पाण-
आणि, पञ्चसुगन्धव्वोहिअं तम्बोल्लं, सण्हवसणपरिधाणं ति एदेहि
उवदेसेहि भिक्खुसङ्घस्स अणुग्गहं करन्तेण किण्णुहु इत्थि आपारिग्गहो
सुरावाणविहाणं च ण दिट्ठं ।
१७. अहो सुहोवण दो अन्भुदओ। एत्तओ दोसो-महाजणो पेक्खिस्सदि ।
१४ मत्तविलास-प्रहसन
दृष्टि से बचकर मदिरा पान भी कर लेते थे । शाक्य भिक्षु नागसेन ने बुद्ध
के कुछ शिक्षा पद जैसे न दी गई वस्तु को न लेना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचर्य
का पालन करना, जीवहिंसा न करना, असमय में भोजन न करना आदि १८
कण्ठस्थ कर लिए हैं और कापालिक व पाशुपत आदि के समक्ष स्वयं को
निर्दोष प्रमाणित करने के लिए बुद्ध के इन उपदेशों की पुनरावृत्ति करता
है । कापालिक बौद्ध धर्म पर कटाक्ष करते हुये कहता है कि बुद्ध तो
चोरशास्त्र के प्रणेता खरपट से भी बढ़कर हैं १९ क्योंकि उन्होंने वेदान्तों और
'महाभारत' से ही तत्त्वों को चुराकर अपने सिद्धान्तों की स्थापना की है । २०
कापालिक नागसेन को 'माया की सन्तान' २१ कहकर बुद्ध के मायावाद की
ओर भी संकेत करता है । बौद्ध धर्म के अनुसार इस जगत् की सत्ता
सांवृतिक है, परमार्थिक नहीं । इस संसार में स्थित सभी वस्तुएँ जैसे, पृथ्वी,
समुद्र, पर्वत इत्यादि माया के कारण ही दिखाई देती हैं, २२ वास्तव में इनका
अस्तित्व नहीं है । सब कुछ शून्य है ।
कपाली सत्यसोम कापालिक सम्प्रदाय का है । कापालिक के लिए
कपाल का रखना, अपने शरीर को भस्म-रज से मलना आदि आवश्यक था ।
कापालिक सम्प्रदाय के अनुसार मदिरापान करना, प्रिया का सहवास और
विकृत वेष धारण करना—ये सब मोक्ष की ओर ले जाते हैं क्योंकि ऐसे मार्ग
के प्रवर्तक भगवान् शिव ही हैं; अर्थात् भगवान् शिव ने ही मोक्ष के मार्ग का
यह उपाय बताया है । २३ लेकिन जैन लोग मोक्ष के मार्ग का अन्य प्रकार से
वर्णन करते हैं । उनके अनुसार तपश्चर्या आदि शारीरिक कष्टों से ही मोक्ष
की प्राप्ति हो सकती है । लेकिन कापालिक उनके इस मत का खण्डन करते
१८. अदिण्णादाणा वेरमणं सिक्खापदं । मुधावादा वेरमणं सिक्खापदं । अब्बह्म-
चय्या वेरमणं पाणादिपादा वेरमणं सिक्खापदं । अकालभोअणा वेरमणं
सिक्खापदं ।
१९. खरपटादप्यस्मिन्नधिकारे बुद्ध एवाधिकः ।
२०. वेदान्तेभ्यो गृहीत्वार्थान् यो महाभारतादपि ।
विप्राणां मिषतामेव कृतवान् कोशसञ्चयम् ॥१२॥
२१. ननु मायासन्तानसम्भवाः खलु भवन्तः ।
२२. दृष्टानि वस्तूनि महीसमुद्रमहीधरादीनि महान्ति मोहात् ।
अपह्नुवानस्य सुतः कथं त्वमल्पं न निह्नोतुमलं कपालम् ॥१३॥
२३. पेया सुरा प्रियतमामुखमीक्षितव्यं ग्राह्यः स्वभावललितो विकृतश्च वेषः ।
येनेदमीदृशमदृश्यत मोक्षवत्मं दीर्घायुरस्तु भगवान् स पिनाकपाणिः ॥७॥
भूमिका १५
हुए कहता है कि एक ओर तो ये जैन लोग यह कहते हैं कि कार्य अपने कारण
के सरूप होता है और दूसरी ओर ये दुःखरूप कारण से सुखरूपी कार्य की
उत्पत्ति होती है, यह कहते हैं ।२४ अर्थात् वे काम क्लेश पर जोर देते हैं
और मानते हैं कि तप आदि कष्टों से मोक्षरूपी सुख प्राप्त होता है ।
कापालिक का कथन है कि दुःख से सुख की उत्पत्ति असम्भव है क्योंकि दुःख
और सुख दोनों विरोधी तत्त्व हैं ।
जैन धर्मानुयायियों के लिए भी ये कुछ नियम निर्धारित हैं, जैसे कि
ब्रह्मचर्य का पालन, बालों को एक-एक करके उखाड़ना, मल धारण करना,
भोजन के समय का नियम (सूर्यास्त से पहले ही खाना), मलिन वस्त्र धारण
करना इत्यादि ।२५
इस प्रकार बौद्ध धर्म, जैन धर्म और कापालिक सम्प्रदाय के कुछ
दार्शनिक तत्त्वों का उल्लेख इस प्रहसन से प्राप्त होता है ।
कथा-वस्तु
'मत्तविलास' की कथा इस प्रकार है—सत्यसोम नाम का कापालिक
देवसोमा नाम की युवती के साथ मद्यपान करते हुए काञ्चीपुरी के मार्ग पर
घूमता है और देवसोमा के सौन्दर्य की प्रशंसा करता है। नशे की अवस्था
में वह देवसोमा के नाम का उच्चारण भी गलत करता है और इस कारण
से फिर से मद्यपान न करने का निर्णय करता है, परन्तु देवसोमा उसे ऐसा
करने से रोकती है। कापालिक प्रसन्न होता है और कापालिक धर्म के
प्रवर्तक शिव की स्तुति करता है जिन्होंने सुरापान और स्त्रीसहवास आदि
को मोक्ष प्राप्ति का साधन बताया है। परन्तु जब देवसोमा जैनों के मत
का पार्थक्य बताती है तो कापालिक उनके दर्शन को झूठा बताता है कि वे
दुःख रूपी कारण से सुख रूपी कार्य की उत्पत्ति होती है ऐसा कहते हैं जो
असंभव है। पुनः जैनों का नाम लेने से अपवित्र हुई जिह्वा के प्रक्षालन
के लिए पुनः मदिरा पीने के लिए मदिरा की दुकान पर जाते हैं लेकिन
२४. कार्यस्य निःसंशयमात्महेतोः सरूपतां हेतुभिरभ्युपेत्य ।
दुःखस्य कार्यं सुखमामनन्तः स्वेनैव वाक्येन हता वराकाः ॥८॥
२५. ये ब्रह्मचर्य-केशनिर्लोटन-मलधारण-भोजनवेलानियम-मलिनपट-परिधाना-
दिभिः प्राणिनः परिक्लेशयन्ति ।
१६ मत्तविलास-प्रहसन
वहाँ कापालिक को उसका भिक्षापात्र (कपाल) नहीं मिलता। वह संदेह
करता है कि शायद माँसपिंड से युक्त होने के कारण उसके कपाल को किसी
कुत्ते अथवा शाक्यभिक्षु ने ले लिया होगा। अतः कपाली आपद्धर्म को प्रमाण
मानकर गोशृङ्ग से मदिरा ले लेता है। फिर वे दोनों कपाल ढूँढ़ने काञ्ची-
पुरी में घूमते हैं।
इसी समय नागसेन नामक शाक्यभिक्षु अपना भिक्षापात्र लेकर वस्त्रों
के भीतर छिपाकर प्रवेश करता है। वह एक दयालु उपासक सेठ धनदास
के घर से मत्स्य-मांस से युक्त अत्युत्तम भोजन लेकर राजविहार की ओर जाता
है। तभी देवसोमा उसकी ओर संकेत करती है कि वह अंगों को सिकोड़ कर
भयभीत-सा जारहा है। नागसेन कापालिक को पहचान कर बचना चाहता
है परन्तु वह पकड़ा जाता है। कापालिक उसके भिक्षापात्र को देखना चाहता
है। नागसेन देवसोमा को ललचाई दृष्टि से देखता है। कापालिक के पूछने
पर नागसेन कहता है कि बुद्ध के उपदेशानुसार भिक्षापात्र ढक कर ही ले
जाना चाहिए। देवसोमा कापालिक से कहती है कि उसे मदिरा पीकर शक्ति
अर्जित करके शाक्यभिक्षु से विवाद करना चाहिए। कापालिक मदिरा
पीता है और नागसेन को भी मदिरा देने के लिए देवसोमा से कहता है। फिर
दोनों में झगड़ा होता है। कापालिक बलपूर्वक नागसेन से भिक्षापात्र छीनता
है पर नागसेन के धक्का दिये जाने पर गिर जाता है। नागसेन के बालों
को खींचने पर (सिर पर बाल न होने के कारण) देवसोमा भी गिर जाती
है। नागसेन उसे पकड़ कर उठाता है तो कापालिक चिल्लाता है कि वह
उसकी प्रिया का हाथ पकड़ रहा है।
इसी अवसर पर बभ्रुकल्प नामक पाशुपत प्रवेश करता है और
पूछने पर कापालिक घटना बताता है। बभ्रुकल्प देवसोमा को देखता है
जो कि उसकी कुटनी थी और जिसको कापालिक ले गया था। अतः बदला
लेने के लिए वह शत्रुपक्ष को उत्तेजित करने का निश्चय करता है। तभी
नागसेन बौद्ध धर्म के उपदेशों को बताता है। अन्ततोगत्वा, उसे अपना
भिक्षापात्र दिखाना ही पड़ता है। कापालिक उसे देखकर प्रसन्न होता है।
परन्तु पात्र को काले वर्ण का देखकर कापालिक कहता हैं कि रंग बदलने
में तो वह सिद्धहस्त है ही जैसे कि उसने अपने सफेद कपड़े लाल रंग (गेरुआ)
में रंग दिये हैं। अन्त में कोई निर्णय न होने पर बभ्रुकल्प उन दोनों को
भूमिका १७
न्यायालय में जाने के लिए कहता है, परन्तु देवसोमा कहती है कि तब तो
कापालिक हार जाएगा क्योंकि धनी बौद्ध वरिष्ठ न्यायकर्ताओं को रिश्वत
(प्रलोभन) देकर अपने पक्ष में कर लेगा। बभ्रुकल्प उनकी शङ्का को दूर
करता है और न्याय दिलाने के लिए आश्वासन देता है।
इसी क्षण एक पागल व्यक्ति हाथ में कापालिक के ही कपाल को
लिए प्रवेश करता है, जिसे उसने एक पागल कुत्ते से प्राप्त किया था। वह
उसे पाशुपत बभ्रुकल्प को देता है। तभी कापालिक अपने पात्र को पहचान
लेता है और लेना चाहता है, परन्तु तभी वह पागल उस कपाल को लेकर
भागता है और कापालिक के कहने पर सब उसे पकड़ लेते हैं। तब वह
उस कपाल को देकर चला जाता है।
सब प्रसन्न होते हैं। कापालिक नागसेन से क्षमा मांगता है और
भरत-वाक्य के साथ प्रहसन समाप्त होता है।
'मत्तविलास' में हास्य-रस
'मत्तविलास' एक शुद्ध कोटि का प्रहसन है। प्रहसन होने के कारण
यह हास्य-रस प्रधान है। संस्कृत नाटकों में हास्य रस की सृष्टि के लिए
विदूषक की योजना की जाती है। परन्तु प्रहसन में सभी पात्रों की योजना
हास्य रस के लिए ही होती है। रूपकों में कोई सामान्य व्यक्ति यदि विकृत
आकृति वेष-भूषा और विकृत अनुकरण आदि करे तो उतनी हँसी नहीं आती
जितनी सामाजिक जीवन में प्रतिष्ठित ब्राह्मण, पण्डित, भिक्षु आदि की
विकृत चेष्टाओं जैसे फिसलना, गिरना, नाचना आदि देखकर आती है।
इसीलिए विदूषक भी ब्राह्मण होता है और प्रहसन के पात्र भी विभिन्न
धार्मिक सम्प्रदायों के पाखण्डी ब्राह्मण, भिक्षु आदि ही होते हैं। वास्तव में
मानव जीवन में विपरीतता या विषमता ही हास्य रस को उत्पन्न करती है।
यह हास्य रस कई प्रकार का होता है। कहीं पात्रों की विचित्र
वेष-भूषा के माध्यम से, कहीं अभिनय द्वारा, कहीं घटना के माध्यम
से तो कहीं विचित्र प्रसङ्ग के आधार पर हास्य रस की सर्जना होती है।
'मत्तविलास' की कथा केवल एक भिक्षा पात्र पर आधारित है और
यह प्रारम्भ से अन्त तक हास्यपूर्ण है। सूत्रधार ने अपनी छोटी पत्नी के
साथ बहुत दिनों तक रमण किया जिसके फलस्वरूप उसकी बड़ी पत्नी
क्रोधित हो जाती है। सूत्रधार जब उसके पास आता है तो वह कहती है कि
१८ मत्तविलास-प्रहसन
'बहुत दिनों से जवानी के गुणों से भरे हुए मतवालों के विलास
को इस बुढ़ापे में दिखाने आए हो' ?
'अय्य किं चिरस्स कालस्स जोव्वणगुणभरमत्तविलासप्पहसणं दंसेदुं
आअदोऽसि' ।
नटी के इस कथन से सूत्रधार समझता है कि वह 'मत्तविलास' प्रहसन
के विषय में कह रही है। इस प्रकार यहाँ विचित्र प्रसङ्ग के आधार पर
हास्य-रस को प्रस्तुत किया गया है।
कपाली सत्यसोम और उसकी सहचरी देवसोमा मदिरा पीकर
काञ्चीपुरी में घूमते हैं। नशे में चूर देवसोमा को सारी पृथ्वी घूमती हुई सी
लगती है। अतः वह कपाली से सहारा देने के लिए कहती है। कपाली उसे
सहारा देने के लिए पकड़ना चाहता है परन्तु गिरने लगता है—
'प्रिये सोमदेवे! किं त्वं कुपितासि, यदवलम्बितुमुपसर्पंतो मे दूरी
भवसि ?'
ऐसा कहते हुए वह नशे के कारण नामोच्चार भी अशुद्ध करता है—सोमदेवे !
कपाली को मद्यशाला यज्ञस्थल की तरह लगती है—'अत्र हि ध्वज-
स्तम्भो यूपः, सुरा सोमः, शौण्डा ऋत्विजः, चषकाश्रमसाः, शूल्यमांसप्रभृतय
उपदंशा हविर्विशेषाः, मत्तवचनानि यजूंषि, गीतानि सामानि, उदङ्काः
स्रुवाः, तर्षोऽग्निः, सुरापणाधिपतिर्यजमानः।'
कपाली को मदिरा के नशे में सब वस्तुएँ मदिरामय ही
प्रतीत होती हैं। शिव ने अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म
कर दिया था—इस पौराणिक तथ्य को भी वह नहीं मानता। उसके विचार
में तो कामदेव का शरीर भस्म नहीं अपितु मदिरा ही बन गया—
मिथ्या त्रिलोचनविलोचनपावकेन
भस्मीकृतां मदनमूर्त्तिमुदाहरन्ति ।
स्नेहात्मिका तदभितापवशाद् विलीना
सेयं प्रिये ! मदयति प्रसभं मनांसि ॥
और उसकी सहचरी देवसोमा भी इस बात का समर्थन करती है—
'भअवं जुज्जइ एदं । णहि लोओवआरणिरदो लोअणाहो लोअं
विणासेदि ।' [भगवन् युज्यत एतद् । नहि लोकोपकारनिरतो लोकनाथो लोकं
विनाशयति । ]
भूमिका १८
शाक्यभिक्षु नागसेन भिक्षापात्र में धनदास सेठ के घर से मत्स्य-मांस
युक्त भिक्षा लाता है। उस समय वह कहता है कि बुद्ध ने जब प्रासादों में
रहना, गद्देदार पलँगों पर सोना, पञ्चगन्धयुक्त पान खाना, महीन वस्त्र
पहनना आदि का विधान किया है—तो स्त्री समागम और मद्यपान का
नियम भी अवश्य बनाया होगा। परन्तु वृद्ध बौद्धों ने युवकों के प्रति
ईर्ष्या के कारण उनसे सम्बन्धित मूल ग्रन्थों को अवश्य ही छिपा दिया
होगा—
'अहो अवस्सं एदेहि दुट्ठबुद्धत्थविरेहि णिरुच्छाएहि अम्हाणं तरुणजणाणं
मच्छरेण पिडअपउत्थएसु इत्थिआसुरावाणविहाणाणि परामिट्ठाणित्ति
तक्केमि। कहि णु हु अविणट्ठ मूलपाठं समासादएं।' [अवश्यमेतै-
र्दुष्ट बुद्धस्थविरैर्निरुत्साहैरस्माकं तरुणजनानां मत्सरेण पिटकपुस्तकेषु स्त्री-
सुरापानविधानानि परामृष्टानीति तर्कयामि। कुतो नु खल्वविनष्ट-
मूलपाठं समासादयेयम् । ]
वस्त्र के भीतर अपने भिक्षा पात्र को छिपाकर ले जाते हुए शाक्य-
भिक्षु को कपाली और देवसोमा उसके पात्र को अपना समझकर पकड़ लेते
हैं। तब भिक्षु कहता है कि 'अरे कापालिकोपासक ! नहीं-नहीं ऐसी बात
नहीं है।' अर्थात् वह पात्र कपाली का नहीं है, दूसरी ओर देवसोमा को देखकर
मन ही मन कहता है—
'अहो ललिअरूवा उवासिआ।' [ अहो ललितरूपा उपासिका । ]
कपाली और शाक्यभिक्षु का कलह भी हास्य रस को ही उत्पन्न
करता है। भिक्षापात्र लेने के लिए जब कपाली शाक्यभिक्षु नागसेन के
चीवर का कोना पकड़कर खींचता है तो वह चिल्लाता है—'णमो बुद्धाय ।'
इस पर कपाली कहता है कि फिर तो 'नमः खरपटाय' ऐसा कहना चाहिए
या बुद्ध तो खरपट से भी बढ़कर चोर हैं क्योंकि उन्होंने वेदान्तों और
'महाभारत' से ही तत्त्वों को चुराकर अपने सिद्धान्तों की स्थापना की है।
वेदान्तेभ्यो गृहीत्वार्थान् यो महाभारतादपि ।
विप्राणां मिषतामेव कृतवान् कोशसञ्चयम् ॥
कपाली के इस कथन में श्लेष भी हास्य रस का कारण है। यहाँ 'अर्थ'
शब्द एक ओर वेदान्त के तत्त्वों की ओर संकेत करता है तो दूसरी ओर
'धन' की ओर।
२० मत्तविलास-प्रहसन
देवसोमा कपाली से कहती है कि वह थका हुआ सा लग रहा है।
अतः उसे मदिरा पीकर शक्ति अर्जित करके फिर नागसेन से कलह करनी
चाहिए। जब वह उसे मदिरा देती है तो कपाली कहता है कि वह भी
थकी सी है, उसे भी मदिरा पीनी चाहिए और बची हुई मदिरा नागसेन
को देने के लिए कहता है। देवसोमा जब उसे देने लगती है तो नागसेन मन
ही मन तो बहुत प्रसन्न होता है लेकिन उसे डर है कि कोई देख लेगा—
'अहो सुहोवणदो अब्भुदओ। एत्तओ दोसो—महाजणो पेक्खिस्सदि। [अहो
सुखोपगतोऽभ्युदयः। एतावान् दोषो महाजनो द्रक्ष्यति ।] लेकिन कपाली
भी उसके लड़खड़ाते स्वर से उसका आशय समझ जाता है—
'इयमस्य इच्छाविरोधिनी वाक् मुखप्रसेकेन स्खलति ।।
देवसोमा कपाली से कहती है कि वह नागसेन प्रेम से कपाल नहीं
देगा, अतः झगड़ा करके ही लेना चाहिए। दोनों में झगड़ा होता है और
नागसेन हाथ से कपाली को धकेलता हुआ पैर से मारता है और कपाली
गिर पड़ता है। देवसोमा नागसेन के बालों को खींचने के प्रयास में सिर पर
बाल न होने के कारण गिर पड़ती है। नागसेन प्रसन्न होकर मन ही मन कहता
है—'अघं बुद्धस्स विण्णाणं जेण मुण्डणं दिट्ठं ।' [अहं बुद्धस्य विज्ञानं, येन
मुण्डन दृष्टम् ।] फिर वह गिरी हुई देवसोमा को हाथ पकड़कर उठाने लगता
है तो कपाली चिल्लाता है, अरे माहेश्वरो ! देखो—'अनेनभिक्षुनामधारकेण
नागसेनेन मम प्रियतमा पाणिग्रहणं क्रियमाणम् ।'
नागसेन कहता है कि 'ऐसी बात नहीं है, विपत्ति में गिरे हुए पर
दया करना हमारा धर्म है', इस पर कपाली कहता हैं कि अगर ऐसी बात है
तो पहले वह (कपाली) गिरा था उसे उठाना चाहिए था—'किमयमपि सर्वज्ञः
धर्मः । नन्वहं पूर्वपतितोऽस्मि ।'
उन्मत्तक का चरित्र भी हास्य रस की ही सृष्टि करता है। उसी को
कपाली का भिक्षा पात्र शूल्यमाँस से युक्त होने के कारण कुत्ता ले भागा था
और उस पागल ने उसी से वह कपाल प्राप्त किया था। वह झगड़ते हुए इन
लोगों के पास जाता है और पाशुपत को, जो समझौता कराने आया था, वह
कपाल देना चाहता है। फिर नागसेन के कहने पर वह कपाली को देता है
परन्तु दूसरे ही क्षण छीन कर जाने लगता है। उसे वह सोने का पात्र ही
भूमिका २१
समझता है—‘मूढ ! किं णं पेक्खशि, शुवण्णभाजणं खु एदं ।’ [मूढ ! किं न
पश्यसि, सुवर्णभाजनं खल्वेतत् ।]
नागसेन कहता है ‘सोने का पात्र ! क्या यह पागल है’ ? इस पर
पागल कहता है कि 'पागल यह शब्द बार-बार सुनता हूँ, तो कपाल को लेकर
उस पागल को तो दिखाओ’—'उम्मत्तओत्ति बहुशो एदं शद्दं शुणोमि । एदं
गण्हिअ दलिशेहि उम्मत्तअं ।’ [उन्मत्तक इति बहुश एतं शब्दं शृणोमि ।
एतद् गृहीत्वा दर्शयोन्मत्तकम् ।]
कपाल की प्राप्ति होने पर शाक्यभिक्षु और कपाली प्रसन्न होते हैं
और पाशुपत बभ्रुकल्प मन ही मन कहता है कि यह भिक्षु आज सिंह के
मुँह से बच गया—‘सत्यमेतत्-नास्त्यदोषवतां भममिति, यदयमद्य भिक्षु-
र्व्याघ्रमुखात् परिभ्रष्ट:’ और उन लोगों से कहता है कि तुम दोनों का
विरोध किरात और अर्जुन के समान परस्पर प्रेम को बढ़ाने वाला बने ।
नागसेन और कपाली सत्यसोम आपस में क्षमा याचना करते हैं और प्रहसन
समाप्त होता है ।
इस प्रकार प्रारम्भ से अन्त तक यह प्रहसन हास्य रस से परिपूर्ण है ।
श्री श्री सरस्वत्यै नमः
मत्तविलासप्रहसनम्
श्रीमहेन्द्रविक्रमवर्मप्रणीतम्
(नान्द्यन्ते ततः प्रविशति सूत्रधारः)
सूत्रधारः—
भाषावेषवपुःक्रियागुणकृतानाश्रित्य भेदान् गतं
भावावेशवशादनेकरसतां त्रैलोक्ययात्रामयम् ।
नृत्तं निष्प्रतिबद्धबोधमहिमा यः १ प्रेक्षकश्च स्वयं
स व्याप्तावनिभाजनं दिशतु वो दिव्यः कपाली यशः ॥१॥
भोः ! समासादितः खलु मया यवीयसीं भार्यामधिकृत्य
समुत्पन्नव्यलीकायां ज्येष्ठायां मे कुटुम्बिन्यां युक्ततरः प्रसादनोपायः,
यच्चिरस्याद्य वयं प्रेक्षाधिकारे परिषदा नियुक्ताः स्म । तद् याव-
देनामुपसर्पामि ।२ (नेपथ्याभिमुखमवलोक्य) आर्ये ! इतस्तावत् ।
(प्रविश्य)
नटी—(सरोषम्) अय्य किं चिरस्स कालस्स जोव्वणगुणभर-
मत्तविलासप्पहसणं दंसेदुं आअदोसि । [आर्य ! किं चिरस्य कालस्य
यौवनगुणभरमत्तविलासप्रहसनं दर्शयितुमागतोसि ।]
सूत्रधारः—यथाह भवती ।
नटी—ताए एव दाव ३ दंसेहि, जा तुए रमइदव्वा । [तस्यैव
तावद् दर्शय, या त्वया रमयितव्या]
सूत्रधारः—त्वया सह दर्शयिष्यामीति ।
नटी—किं ताए एव्व णिउत्तोसि । [किं तयैव नियुक्तोऽसि ।]
सूत्रधारः—एवमेतत् । अपि च तत्र गता महान्तमनुग्रहं
लप्स्यसे ।
नटी—तव एव्व खु एदं जुज्जइ । [तवैव४ खलु एतद् युज्यते]
सूत्रधारः—भवति ! किमिव न युज्यते । त्वत्प्रयोगपरितोषिता
परिषदनुग्रहीष्यतीति ।
१. करोतीत्याध्याहर्तव्यम् । २. परिक्रम्य ने—।
३. दाणिं । ४. तथैव ।
मत्तविलास-प्रहसन
श्री महेन्द्रविक्रमवर्मा द्वारा रचित
हिन्दी अनुवाद
(नान्दी के अन्त में सूत्रधार प्रवेश करता है।)
अकुण्ठित ज्ञान की महिमा वाले जो भाषा, वेष, शरीर, क्रिया (तथा)
गुण कृत (नाना प्रकार के) भेदों का आश्रय लेकर, भावावेश के वशीभूत
अनेक रसों को प्राप्त हुए, तीनों लोकों के व्यवहार रूप नृत्त को (करते हैं),
और जो स्वयं दर्शक हैं, वह दिव्य कपालधारी (शिव) भूमण्डलरूपी पात्र
में व्याप्त यश आपको प्रदान करें ॥१॥
अरे ! मैंने छोटी पत्नी के विषय में मिथ्याग्रह होने से रुष्ट (नाराज
हुई) बड़ी पत्नी को प्रसन्न करने का (मनाने का) और अधिक अच्छा उपाय
ढूंढ़ लिया है, क्योंकि आज हमें बहुत दिनों बाद सभा ने नाटक प्रदर्शन करने
को नियुक्त किया है। तो अब इसके पास जाता हूँ। [नेपथ्य की ओर
देखकर) आर्ये ! इधर आओ।
(प्रवेश करके)
नटी—(क्रोध सहित) आर्यपुत्र ! क्या तुम बहुत दिनों बाद जवानी
के गुणों से भरा हुआ शराबियों के विलासों का प्रहसन दिखाने आए हो ?
सूत्रधार—जैसा आपने कहा। (ठीक ही है)
नटी—तब उसी (स्त्री) को दिखाओ, जो तुम्हारे साथ रमण के
योग्य है।
सूत्रधार—तुम्हारे साथ दिखाऊँगा। (इस उद्देश्य से मैं तुम्हारे पास
आया हूँ।)
नटी—क्या उसी (औरत) ने तुम्हें भेजा है ?
सूत्रधार—हां ठीक ही है। और फिर वहाँ जाओगी तो बहुत
अनुग्रह मिलेगा।
नटी—यह केवल तुम्हारे लिए ही ठीक है।
सूत्रधार—आर्ये ! तुम्हारे लिए भी ठीक है। सभा तुम्हारे
अभिनय से संतुष्ट होकर (तुम्हारे ऊपर बहुत बड़ा) अनुग्रह करेगी। (तुम्हारा
बहुत आदर करेगी)।