मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ७
'तद्द्वत्प्रहसनम् त्रेधा शुद्धवैकृतसङ्करैः' ।
शुद्ध प्रहसन पाखण्डी, विप्र, चेट, चेटी और विट आदि पात्रों से युक्त होता है
उनके आचरण, वेष तथा भाषा से युक्त होता है तथा इनमें कथनोपकथन
हास्य-युक्त होता है—
पाखण्डिविप्रप्रभृति चेटचेटीविटाकुलम् ।
चेष्टितं वेषभाषाभिः शुद्धं हास्यवचोन्वितम् ॥ (दश० ३.५४)
विश्वनाथ के अनुसार जहाँ नायक धृष्ट होता है वह हास्य-विषयक
प्रहसन शुद्ध कहलाता है—
'एको यत्र भवेद् धृष्टो हास्यं तच्छुद्धमुच्यते ।' (सा०द० ६.२६६)
जैसे—'कन्दर्पकेलि' ।
शुद्ध प्रहसन में तपस्वी, संन्यासी और ब्राह्मण श्रेणी के व्यक्तियों में से
किसी एक श्रेणी के व्यक्ति को धृष्ट नायक के रूप में चित्रित किया जाता है
और जिसमें हास्य रस प्रमुख होता है ।
विकृत प्रहसन कामुक आदि की भाषा और वेष को धारण करने
वाले नपुंसक, कञ्चुकी तथा तपस्त्री आदि पात्रों से युक्त होता है—
'कामुकादिवचोवेषैः षण्डकञ्चुकितापसैः विकृतम् ।' (दश०३.५५)
संकीर्ण प्रहसन वीथी के अङ्गों से मिश्रित तथा धूर्तों से भरा हुआ
होता है—
'सङ्कराद् वीथ्या सङ्कीर्णं धूर्तसङ्कुलम् ।' (दश० ३.५६)
परन्तु जहाँ एक ओर कुछ आचार्य प्रहसन के तीन भेद मानते हैं,
दूसरी ओर भरतमुनि, नाट्यदर्पणकार अभिनवगुप्त आदि प्रहसन के शुद्ध और
सङ्कीर्ण ये दो.ही भेद मानते हैं । भरतमुनि के अनुसार विकृत नामक प्रहसन
का सङ्कीर्ण में ही अन्तर्भाव हो जाता है —
'इदं (विकृतं) तु सङ्कीर्णेनैव गतार्थमिति मुनिना पृथङ् नोक्तम् ।'
(सा० द० ६०)
हास्य के भेद
प्रहसन हास्य-रस प्रधान होता है । अतः प्रहसन के भेदों का निरूपण
करने के पश्चात् हास्य के भेदों को भी स्पष्ट करना युक्तिसङ्गत होगा ।