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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

by पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार)

DevanagariHindipublished100 pages

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Page 26

१४ मत्तविलास-प्रहसन
दृष्टि से बचकर मदिरा पान भी कर लेते थे । शाक्य भिक्षु नागसेन ने बुद्ध
के कुछ शिक्षा पद जैसे न दी गई वस्तु को न लेना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचर्य
का पालन करना, जीवहिंसा न करना, असमय में भोजन न करना आदि १८
कण्ठस्थ कर लिए हैं और कापालिक व पाशुपत आदि के समक्ष स्वयं को
निर्दोष प्रमाणित करने के लिए बुद्ध के इन उपदेशों की पुनरावृत्ति करता
है । कापालिक बौद्ध धर्म पर कटाक्ष करते हुये कहता है कि बुद्ध तो
चोरशास्त्र के प्रणेता खरपट से भी बढ़कर हैं १९ क्योंकि उन्होंने वेदान्तों और
'महाभारत' से ही तत्त्वों को चुराकर अपने सिद्धान्तों की स्थापना की है । २०
कापालिक नागसेन को 'माया की सन्तान' २१ कहकर बुद्ध के मायावाद की
ओर भी संकेत करता है । बौद्ध धर्म के अनुसार इस जगत् की सत्ता
सांवृतिक है, परमार्थिक नहीं । इस संसार में स्थित सभी वस्तुएँ जैसे, पृथ्वी,
समुद्र, पर्वत इत्यादि माया के कारण ही दिखाई देती हैं, २२ वास्तव में इनका
अस्तित्व नहीं है । सब कुछ शून्य है ।
कपाली सत्यसोम कापालिक सम्प्रदाय का है । कापालिक के लिए
कपाल का रखना, अपने शरीर को भस्म-रज से मलना आदि आवश्यक था ।
कापालिक सम्प्रदाय के अनुसार मदिरापान करना, प्रिया का सहवास और
विकृत वेष धारण करना—ये सब मोक्ष की ओर ले जाते हैं क्योंकि ऐसे मार्ग
के प्रवर्तक भगवान् शिव ही हैं; अर्थात् भगवान् शिव ने ही मोक्ष के मार्ग का
यह उपाय बताया है । २३ लेकिन जैन लोग मोक्ष के मार्ग का अन्य प्रकार से
वर्णन करते हैं । उनके अनुसार तपश्चर्या आदि शारीरिक कष्टों से ही मोक्ष
की प्राप्ति हो सकती है । लेकिन कापालिक उनके इस मत का खण्डन करते
१८. अदिण्णादाणा वेरमणं सिक्खापदं । मुधावादा वेरमणं सिक्खापदं । अब्बह्म-
चय्या वेरमणं पाणादिपादा वेरमणं सिक्खापदं । अकालभोअणा वेरमणं
सिक्खापदं ।
१९. खरपटादप्यस्मिन्नधिकारे बुद्ध एवाधिकः ।
२०. वेदान्तेभ्यो गृहीत्वार्थान् यो महाभारतादपि ।
विप्राणां मिषतामेव कृतवान् कोशसञ्चयम् ॥१२॥
२१. ननु मायासन्तानसम्भवाः खलु भवन्तः ।
२२. दृष्टानि वस्तूनि महीसमुद्रमहीधरादीनि महान्ति मोहात् ।
अपह्नुवानस्य सुतः कथं त्वमल्पं न निह्नोतुमलं कपालम् ॥१३॥
२३. पेया सुरा प्रियतमामुखमीक्षितव्यं ग्राह्यः स्वभावललितो विकृतश्च वेषः ।
येनेदमीदृशमदृश्यत मोक्षवत्मं दीर्घायुरस्तु भगवान् स पिनाकपाणिः ॥७॥