मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
by पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार)
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Read in context१० मत्तविलास-प्रहसन
दक्षिण में महाराष्ट्र और कर्नाटक के प्रान्तों पर शक्तिशाली चालुक्यवंशीय
राजाओं का और सुदूर दक्षिण में कावेरी तट तक उतने ही प्रभावशाली
पल्लववंश के राजाओं का अधिकार था । चालुक्यवंशीय राजा पुलकेशी द्वितीय
ने अपनी शक्तिशाली सेना की सहायता से नर्मदा नदी के पश्चिमी तट से पूर्वी
तट तक अपना राज्य फैला लिया था । उसने अपने प्रतिद्वन्द्वी हर्षवर्धन की
सेना को दक्षिण की ओर बढ़ने से रोक दिया था, जैसा कि ऐहोल शिलालेख
में उल्लेख मिलता है—
'भयविगलितहर्षो येन चाकारि हर्षः ।' २३
और दक्षिण में, पुलकेशी द्वितीय ने ही अपने दूसरे प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी पल्लव-
वंशीय राजा महेन्द्रविक्रमवर्मा को परास्त करके उसे उसकी राजधानी
काञ्चीपुरी की चारदीवारी के भीतर कर दिया —
उद्भूतामलचामरध्वजशतच्छत्रान्धकारैर्बलैः
शौर्योत्साहरसोद्धतारिमथनैमौलादिभिः षड्विधैः ।
आक्रान्तात्मबलोन्नतिं बलरजः सञ्छन्नकाञ्चीपुर-
प्राकारान्तरितप्रतापमकरोद्यः पल्लवानां पतिम्⁶॥ २६
आकर्षक बात यह है कि इन तीनों ही राजाओं की साहित्य की ओर
विशेष रुचि रही । हर्षवर्धन तीन रूपकों—'प्रियदर्शिका', 'रत्नावली' और
'नागानन्द' के रचयिता हैं, यह सभी को ज्ञात है; महेन्द्रविक्रमवर्मा ने 'मत्त-
विलास' प्रहसन और सम्भवतः 'भगवदज्जुककीय' प्रहसनों की रचना की । पुल-
केशी द्वितीय की लिखी कोई रचना उपलब्ध नहीं है परन्तु उसकी विकट-
नितम्बा नामक पुत्रवधू ने कई रमणीय सुभाषित लिखे ।
इस प्रकार पुलकेशी द्वितीय के ऐहोल शिलालेख के आधार पर महेन्द्र-
विक्रमवर्मा का समय सातवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध निर्धारित होता है । पुलकेशी
द्वितीय का समय ६०९ ई० से लेकर ६४२ ई० के लगभग माना गया है । पुनः
महेन्द्रविक्रमवर्मा की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र नरसिंहवर्मा प्रथम राज्य का
उत्तराधिकारी बना और उसने ६३० ई० से ६६८ ईं० तक राज्य किया ।
'मत्तविलास' प्रहसन की प्रस्तावना में सूत्रधार के कथनानुसार
महेन्द्रविक्रमवर्मा, पल्लववंशीय राजा सिंहविष्णुवर्मा के पुत्र
6. Aihole Stone Inscription of Pulakesin II.