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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

by पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार)

DevanagariHindipublished100 pages

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Page 30

१८ मत्तविलास-प्रहसन
'बहुत दिनों से जवानी के गुणों से भरे हुए मतवालों के विलास
को इस बुढ़ापे में दिखाने आए हो' ?
'अय्य किं चिरस्स कालस्स जोव्वणगुणभरमत्तविलासप्पहसणं दंसेदुं
आअदोऽसि' ।
नटी के इस कथन से सूत्रधार समझता है कि वह 'मत्तविलास' प्रहसन
के विषय में कह रही है। इस प्रकार यहाँ विचित्र प्रसङ्ग के आधार पर
हास्य-रस को प्रस्तुत किया गया है।
कपाली सत्यसोम और उसकी सहचरी देवसोमा मदिरा पीकर
काञ्चीपुरी में घूमते हैं। नशे में चूर देवसोमा को सारी पृथ्वी घूमती हुई सी
लगती है। अतः वह कपाली से सहारा देने के लिए कहती है। कपाली उसे
सहारा देने के लिए पकड़ना चाहता है परन्तु गिरने लगता है—
'प्रिये सोमदेवे! किं त्वं कुपितासि, यदवलम्बितुमुपसर्पंतो मे दूरी
भवसि ?'
ऐसा कहते हुए वह नशे के कारण नामोच्चार भी अशुद्ध करता है—सोमदेवे !
कपाली को मद्यशाला यज्ञस्थल की तरह लगती है—'अत्र हि ध्वज-
स्तम्भो यूपः, सुरा सोमः, शौण्डा ऋत्विजः, चषकाश्रमसाः, शूल्यमांसप्रभृतय
उपदंशा हविर्विशेषाः, मत्तवचनानि यजूंषि, गीतानि सामानि, उदङ्काः
स्रुवाः, तर्षोऽग्निः, सुरापणाधिपतिर्यजमानः।'
कपाली को मदिरा के नशे में सब वस्तुएँ मदिरामय ही
प्रतीत होती हैं। शिव ने अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म
कर दिया था—इस पौराणिक तथ्य को भी वह नहीं मानता। उसके विचार
में तो कामदेव का शरीर भस्म नहीं अपितु मदिरा ही बन गया—
मिथ्या त्रिलोचनविलोचनपावकेन
भस्मीकृतां मदनमूर्त्तिमुदाहरन्ति ।
स्नेहात्मिका तदभितापवशाद् विलीना
सेयं प्रिये ! मदयति प्रसभं मनांसि ॥
और उसकी सहचरी देवसोमा भी इस बात का समर्थन करती है—
'भअवं जुज्जइ एदं । णहि लोओवआरणिरदो लोअणाहो लोअं
विणासेदि ।' [भगवन् युज्यत एतद् । नहि लोकोपकारनिरतो लोकनाथो लोकं
विनाशयति । ]