मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
by पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार)
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Read in contextमत्तविलास-प्रहसन
श्री महेन्द्रविक्रमवर्मा द्वारा रचित
हिन्दी अनुवाद
(नान्दी के अन्त में सूत्रधार प्रवेश करता है।)
अकुण्ठित ज्ञान की महिमा वाले जो भाषा, वेष, शरीर, क्रिया (तथा)
गुण कृत (नाना प्रकार के) भेदों का आश्रय लेकर, भावावेश के वशीभूत
अनेक रसों को प्राप्त हुए, तीनों लोकों के व्यवहार रूप नृत्त को (करते हैं),
और जो स्वयं दर्शक हैं, वह दिव्य कपालधारी (शिव) भूमण्डलरूपी पात्र
में व्याप्त यश आपको प्रदान करें ॥१॥
अरे ! मैंने छोटी पत्नी के विषय में मिथ्याग्रह होने से रुष्ट (नाराज
हुई) बड़ी पत्नी को प्रसन्न करने का (मनाने का) और अधिक अच्छा उपाय
ढूंढ़ लिया है, क्योंकि आज हमें बहुत दिनों बाद सभा ने नाटक प्रदर्शन करने
को नियुक्त किया है। तो अब इसके पास जाता हूँ। [नेपथ्य की ओर
देखकर) आर्ये ! इधर आओ।
(प्रवेश करके)
नटी—(क्रोध सहित) आर्यपुत्र ! क्या तुम बहुत दिनों बाद जवानी
के गुणों से भरा हुआ शराबियों के विलासों का प्रहसन दिखाने आए हो ?
सूत्रधार—जैसा आपने कहा। (ठीक ही है)
नटी—तब उसी (स्त्री) को दिखाओ, जो तुम्हारे साथ रमण के
योग्य है।
सूत्रधार—तुम्हारे साथ दिखाऊँगा। (इस उद्देश्य से मैं तुम्हारे पास
आया हूँ।)
नटी—क्या उसी (औरत) ने तुम्हें भेजा है ?
सूत्रधार—हां ठीक ही है। और फिर वहाँ जाओगी तो बहुत
अनुग्रह मिलेगा।
नटी—यह केवल तुम्हारे लिए ही ठीक है।
सूत्रधार—आर्ये ! तुम्हारे लिए भी ठीक है। सभा तुम्हारे
अभिनय से संतुष्ट होकर (तुम्हारे ऊपर बहुत बड़ा) अनुग्रह करेगी। (तुम्हारा
बहुत आदर करेगी)।