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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

by पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार)

DevanagariHindipublished100 pages

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१२ मत्तविलास-प्रहसन
करता है कि राजा विचित्रचित्त ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश का भी एक
मन्दिर बनवाया था ।$^{१०}$ यह मन्दिर ईंट, काष्ठ, लोहा, चूने आदि के बिना
ही बना था। स्पष्ट रूप से यह चट्टानों को काटकर बनाए गए मन्दिरों का
संकेत करता है जिनका कि महाबलिपुरम् में महेन्द्रविक्रमवर्मा के उत्तरवर्ती
राजाओं नृसिंह व महामल्ल के समय तक पूर्ण विकास हो चुका था।
महेन्द्रविक्रमवर्मा एक प्रतिभाशाली और सुयोग्य शासक था। वह उच्च-
कोटि का विद्वान् और संस्कृत साहित्य का एक मर्मज्ञ कवि भी था। सङ्गीत
के प्रति उसकी विशेष रुचि थी। 'मत्तविलास' प्रहसन में आए विभिन्न सन्दर्भ
उसके नाना प्रकार के गुणों का संकेत करते हैं;$^{११}$ प्रज्ञा, दान, दया, अनुभाव,
धृति, कान्ति, कलाकौशल, सत्य, पराक्रम, निष्कपटता, विनय इत्यादि गुण
महेन्द्रविक्रमवर्मा की शरण में वैसे ही चले गये जैसे कि प्रलयकाल में सभी
सृष्टियाँ जगत् के आदि-पुरुष की शरण में चली जाती हैं।$^{१२}$ वह अपने राज्य
में सभी प्रकार की कविताओं का आदर किया करता था। सज्जनों की
अल्पसार वाली कविताओं का भी वह सम्मान करता था।$^{१३}$ इन्हीं गुणों के
कारण वह 'गुणभर' अर्थात् गुणियों का भरण करने वाला था। माना जाता
है कि वह संगीतज्ञ भी था और 'दक्षिणचित्र' नामक संगीत विषयक ग्रन्थ की भी
रचना उसने की थी,$^{१४}$ परन्तु वह उपलब्ध नहीं है। उसके राज्य-काल में
काञ्चीपुरी पूर्ण रूप से समृद्धि और भोग-विलास से परिपूर्ण थी।$^{१५}$
१०. एतदनिष्टकमद्रुममलोहमसुधं विचित्रचित्तेन ।
निर्मापितं नृपेण ब्रह्मेश्वरविष्णुलक्षितायतनम् ॥
११. ----शत्रुषड्वर्गनिग्रहपरः परहितपरतन्त्रतया महाभूतसधर्मा...... ।
१२. प्रज्ञादानदयानुभावधृतयः कान्तिकलाकौशलं
सत्यं शौर्यममायताविनय इत्येवम्प्रकारा गुणाः ।
अप्राप्तस्थितयः समेत्य शरणं याता यमेकं कलौ
कल्पान्ते जगदादिमादिपुरुषं सगंप्रभेदा इव ।।३।।
१३. आकरे सूक्तिरत्नानां यस्मिन् गुणगरीयसाम् ।
अर्घन्ति बहुसूक्तानि सतां सारलघून्यपि ॥४॥
14. R. Gopalan, History of the Pallavas of South India, p. 93.
१५ अहो नु खलु विमानशिखरविश्रान्तघनरसितसन्दिग्धमृदङ्गशब्दस्य
मधुसमयनिर्माणमातृकायमानमाल्यापणस्य कुसुमशरविजयघोषणायमानवर-
युवतिकाञ्चीरवस्य काञ्चीपुरस्य परा विभूतिः ।