मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
पृष्ठ 18, कुल 100 में से
संदर्भ में पढ़ें६ मत्तविलास-प्रहसन
धनञ्जय रूपकों के भेद को एक और स्वरूप देते हैं—(१) शुद्ध रूपक
और (२) संकीर्ण रूपक ।
वस्तु, नेता और रस के आधार पर एक दूसरे से भिन्न स्वरूप वाले
दस रूपक ही शुद्ध रूपक हैं। इनमें से दो या तीन रूपकों के कतिपय लक्षणों
का मिश्रण जिस रूपक में पाया जाता है वह रूपक का संकीर्ण भेद है जैसे
नाटक और प्रकरण के लक्षणों का संकर होने के कारण नाटिका संकीर्ण
रूपक है। कुछ व्याख्याकारों ने नाटिका और प्रकरणिका दोनों को पृथक्
पृथक् संकीर्ण रूपक माना है (ना०द० १.३) । लेकिन धनिक ने इस मत
का खण्डन करके नाटिका और प्रकरणिका को रूपकों में जोड़कर बारह रूप
मान लिये हैं।
'दशरूपक' में शुद्ध रूपकों का वर्णन इस प्रकार है—
नाटकं सप्रकरणं भाणः प्रहसनं डिमः ।
व्यायोगसमवकारौ वीथ्यङ्केहामृगा इति ॥ (१.८)
अर्थात् नाटक, प्रकरण, भाण, प्रहसन, डिम, व्यायोग, समवकार, वीथी,
अङ्क और ईहामृग ।
संस्कृत साहित्य में प्रहसन
जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, प्रहसन का विषय मुख्य रूप से
हास्य ही होता है—'प्रकृष्टं हसत्यनेनेति प्रहसनम् ।' संस्कृत साहित्य के इतिहास
में प्रहसन का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है । संस्कृत के विभिन्न आचार्यों ने समय-
समय पर प्रहसन की भिन्न-भिन्न परिभाषाएँ प्रस्तुत की हैं। धनञ्जय के
मतानुसार प्रहसन नामक रूपक भेद वस्तु, सन्धि, सन्ध्यङ्ग, अङ्क तथा
लास्यादि में भाण की तरह होता है—
'भाणवद्वस्तुसन्धिसन्ध्यङ्गलास्यादीनामतिदेशः ।' (दश० ३)
प्रहसन की कथावस्तु कल्पित होती है, एक या दो अङ्क होते हैं, धूर्त, पाखण्डी
विप्र तथा कामुक आदि पात्र होते हैं; इसमें विष्कम्भक और प्रवेशक नहीं
होते हैं; इसमें अधिकतर भारती वृत्ति होती है; इसका अङ्गी रस हास्य होता
है और लास्य के दस अङ्गों का प्रयोग होता है ।
यह प्रहसन तीन प्रकार का होता है—(१) शुद्ध, (२) विकृत और
(३) सङ्कर