मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
by पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार)
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समझता है—‘मूढ ! किं णं पेक्खशि, शुवण्णभाजणं खु एदं ।’ [मूढ ! किं न
पश्यसि, सुवर्णभाजनं खल्वेतत् ।]
नागसेन कहता है ‘सोने का पात्र ! क्या यह पागल है’ ? इस पर
पागल कहता है कि 'पागल यह शब्द बार-बार सुनता हूँ, तो कपाल को लेकर
उस पागल को तो दिखाओ’—'उम्मत्तओत्ति बहुशो एदं शद्दं शुणोमि । एदं
गण्हिअ दलिशेहि उम्मत्तअं ।’ [उन्मत्तक इति बहुश एतं शब्दं शृणोमि ।
एतद् गृहीत्वा दर्शयोन्मत्तकम् ।]
कपाल की प्राप्ति होने पर शाक्यभिक्षु और कपाली प्रसन्न होते हैं
और पाशुपत बभ्रुकल्प मन ही मन कहता है कि यह भिक्षु आज सिंह के
मुँह से बच गया—‘सत्यमेतत्-नास्त्यदोषवतां भममिति, यदयमद्य भिक्षु-
र्व्याघ्रमुखात् परिभ्रष्ट:’ और उन लोगों से कहता है कि तुम दोनों का
विरोध किरात और अर्जुन के समान परस्पर प्रेम को बढ़ाने वाला बने ।
नागसेन और कपाली सत्यसोम आपस में क्षमा याचना करते हैं और प्रहसन
समाप्त होता है ।
इस प्रकार प्रारम्भ से अन्त तक यह प्रहसन हास्य रस से परिपूर्ण है ।