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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

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८ मत्तविलास-प्रहसन
पण्डितराज जगन्नाथ और धनञ्जय के अनुसार हास्य रस दो प्रकार
का होता है-
(१) आत्मस्थ, (२) परस्थ ।
आत्मस्थ 'अपने' विकृत वेष-भाषा आदि विभावों का आलम्बन करके
उत्पन्न होने वाला हास है, और 'परस्थ' (दूसरे) के विकृत वेष तथा भाषा
आदि विभावों का आलम्बन करके उत्पन्न होने वाला हास है —
'विकृताकृतिवाग्वेषैरात्मनोऽथ परस्य वा ।'
(दश० ४.७५)
यह हास उत्तम, मध्यम तथा अधम प्रकृति का होने से छः प्रकार का
हो जाता है- (१) आत्मस्थ उत्तम प्रकृति, (२) आत्मस्थ मध्यम प्रकृति, (३)
आत्मस्थ अधम प्रकृति, (४) परस्थ उत्तम प्रकृति, (५) परस्थ मध्यम प्रकृति,
(६) परस्थ अधम प्रकृति ।
इस हास के पुनः छः भेद और होते हैं - (१) स्मित, (२) हसित, (३)
विहसित, (४) उपहसित, (५) अपहसित, और (६) अतिहसित ।
'स्मित' हास में केवल नेत्र विकसित होते हैं । 'हसित' में दाँत कुछ-
कुछ दिखाई देते हैं । 'विहसित' में मधुर स्वर होता है । मधुर स्वर (विहसित)
जब सिर हिलाने के साथ होता है तो 'उपहसित' कहलाता है । 'अपहसित'
वह है जिसमें नेत्र अश्रुयुक्त हो जाते हैं और 'अतिहसित' में अङ्गों को इधर-
उधर पटका जाता है-
स्मितमिह विकासिनयनं किञ्चिल्लक्ष्यद्विजं तु हसितं स्यात् ।
मधुरस्वरं विहसितं सशिरःकम्पमिदमुपहसितम् ॥ ७६ ॥
अपहसितं सास्त्राक्षं विक्षिप्ताङ्गं भवत्यतिहसितम् ।
द्वे द्वे हसिते चैषां ज्येष्ठे मध्येऽधमे क्रमशः ॥ ७७ ॥
(दश० ४)
इनमें से दो दो उत्तम, मध्यम और अधम प्रकृति के हुआ करते हैं,
अर्थात् स्मित और हसित उत्तम जन को, विहसित और उपहसित मध्यम
जन को और अपहसित तथा अतिहसित अधम जन को हुआ करते हैं ।
इस प्रकार प्रहसन में हास्य के छः भेदों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग
किया जाना चाहिए-