मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
पृष्ठ 17, कुल 100 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ५
इसके प्रथम अध्याय में ही नाटक की उत्पत्ति के विषय में लिखा है कि त्रेता
युग में ब्रह्मा द्वारा नाटक की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा ने 'ऋग्वेद' से पाठ्य 'सामवेद'
से गान, 'यजुर्वेद' से अभिनय और 'अथर्ववेद' से रस इन चार तत्त्वों को ग्रहण
किया-
जग्राह पाठ्यमृग्वेदात्सामभ्यो गीतमेव च ।
यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादपि ॥
ब्रह्मा की प्रेरणा से विश्वकर्मा ने नाट्यगृह की रचना की और
भरतमुनि ने अभिनय की व्यवस्था की। भरत ने अपने सौ शिष्यों और
अप्सराओं को नाट्य कला की शिक्षा दी। इस नाट्य कला को पूर्ण करने
के लिए शिव ने नाट्य के साथ ताण्डव, पार्वती ने लास्य नृत्य और विष्णु ने
नाट्य रीति प्रदान की। इस प्रकार भरत ने नाट्यशास्त्र का प्रणयन कर
नर लोक में नाट्य का प्रचार किया।
शुभङ्करकृत 'सङ्गीतदामोदर' में नाटक की उत्पत्ति के विषय में लिखा
है कि—प्राचीन काल में इन्द्र के द्वारा प्रार्थना किए जाने पर ब्रह्मा ने वेदों
से आकर्षण कर पञ्चम नाट्य वेद को बनाया ऐसा सुना जाता है। स्मृति
में चार वेद और एक उपवेद कहे गये हैं। उनमें शिव ने ब्रह्मा को गन्धर्व-
वेद (नाट्यवेद) उपवेद बताया। ब्रह्मा ने भरत को बताया और भरत के
द्वारा उसका मर्त्यलोक में प्रचार किया गया। अतः शिव, ब्रह्मा और भरत
इस नाट्यवेद के प्रयोजक माने गये हैं—
इहानुश्रूयते ब्रह्मा शक्रेणाभ्यर्थितः पुरा।
चकाराऽकृष्य वेदेभ्यो नाट्यवेदं तु पञ्चमम् ॥
उपवेदोऽथ वेदाश्च चत्वारः कथिताः स्मृतौ ।
तत्रोपवेदो गान्धर्वः शिवेनोक्तः स्वयम्भुवे ॥
तेनाऽपि भरतायोक्तस्तेन मर्त्ये प्रचारितः।
शिवाऽब्जयोनिभरतास्तस्मादस्य प्रयोजकाः ॥
इस प्रकार अत्यन्त प्राचीन समय से लेकर वेद-शास्त्र और 'रामायण'
'महाभारत' आदि से नाटक की स्वतन्त्र रूप से उत्पत्ति प्रमाणित होती है।
रूपक के भेद
धनंजय के अनुसार रसों पर आश्रित रूपक दस प्रकार के होते हैं—
'दशधैव रसाश्रयम्' ।