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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

by पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार)

DevanagariHindipublished100 pages

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Page 25

भूमिका १३
'मत्तविलास' में दार्शनिक सम्बन्ध
महेन्द्रविक्रमवर्मा ने 'मत्तविलास' में तत्कालीन धार्मिक परिस्थितियों का
सजीव चित्रण किया है। गुप्तकालीन धार्मिक सहिष्णुता के स्थान पर
धार्मिक ईर्ष्या द्वेष जन्म ले रहा था। शैव धर्म के सम्प्रदायों में कापालिक
तथा पाशुपत जैसे सम्प्रदाय हो गए थे। बौद्ध धर्म प्रमुख रूप से ह्रासोन्मुख
हो चुका था। सभी वेदान्तियों और नैयायिकों ने दृढ़ रूप से बौद्धों के मत का
खण्डन किया। बौद्ध धर्म व जैन धर्म में जो कुरीतियाँ थीं उनको हास्य के
माध्यम से कवि ने इस प्रहसन में प्रस्तुत किया है। इस प्रहसन में शाक्य-
भिक्षु नागसेन है। इस पात्र का नाम नागसेन सम्भवतः व्यंग्य को प्रदर्शित
करने के लिए ही रखा गया है। नागसेन 'मिलिन्दपञ्हो' (राजा मिलिन्द
के प्रश्न) का एक बहुत बड़ा बुद्धिमान् दार्शनिक है। प्रस्तुत प्रहसन में
नागसेन के चरित्र को भ्रष्ट रूप में दिखाते हुए कवि ने 'मिलिन्दपञ्हो' के
नागसेन का अनादर कर दिया है।
बौद्ध धर्म में अनेक कुरीतियां आ गईं थीं। बौद्ध मठ और राज-
विहार भोग-विलास के स्थल बन गए थे। बुद्ध ने संघ के लिए महलों में
रहना, सुन्दर गद्दे वाले पलँगों पर सोना, दिन के पहले पहर खाना, दूसरे
पहर मधुर पेय पीना, पाँच सुगन्धों से युक्त पान खाना, महीन वस्त्र पहनना
आदि१६—इन सब की अनुमति दी थी। अतः नागसेन कहता है कि जब बुद्ध
ने इन सबका अनुमोदन किया तो स्त्री-सहवास और मद्यपान की अनुमति
ही क्यों नहीं दी ? उसके विचार से बुद्ध ने अवश्य ही इन दोनों का भी
विधान किया होगा, लेकिन वृद्ध लोगों ने इन युवकों के प्रति ईर्ष्या के कारण
कहीं छिपा दिया होगा। कापालिक के साथ कलह में जब देवसोमा नागसेन
को मदिरा देती है तो वह उसे परम सौभाग्य मानता है; परन्तु उसे बड़े लोगों
के द्वारा देखने का डर है ।१७ इससे स्पष्ट होता है कि बौद्ध भिक्षु लोगों की
१६. भोः ! परमकारुणिण भअवदा तहागएण पासादेसु वासो, सुविहि-
असय्येसु पज्जङ्केसु सअणं, पुव्वण्हे भोअणं, अवरण्हे सुरसाणि पाण-
आणि, पञ्चसुगन्धव्वोहिअं तम्बोल्लं, सण्हवसणपरिधाणं ति एदेहि
उवदेसेहि भिक्खुसङ्घस्स अणुग्गहं करन्तेण किण्णुहु इत्थि आपारिग्गहो
सुरावाणविहाणं च ण दिट्ठं ।
१७. अहो सुहोवण दो अन्भुदओ। एत्तओ दोसो-महाजणो पेक्खिस्सदि ।