मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
by पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार)
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थे।७ सिंहविष्णुवर्मा का शासन-काल ५७५ ई० से ६०० ई० तक माना
जाता है। महेन्द्रविक्रमवर्मा अपने पिता के पश्चात् सातवीं शताब्दी के
प्रारम्भ में राजसिंहासन पर आरूढ़ हुए। अतः महेन्द्रविक्रमवर्मा का समय
६०० ई० से लेकर ६३० ई० तक मानना ही उचित है।
इस प्रकार बाह्य और अन्तः प्रमाणों के आधार पर महेन्द्रविक्रमवर्मा
का समय सातवीं शताब्दी का प्रारम्भ ही निर्धारित होता है।
जीवन-चरित
किम्बदन्ती के अनुसार महेन्द्रविक्रमवर्मा प्रारम्भ में जैन धर्मानुयायी
थे और बाद में उन्होंने शैव धर्म स्वीकार कर लिया था। 'पेरीयपुराणम्' में
उपलब्ध विवरण के अनुसार तिरुणावुक्करशु नामक एक अप्पार (साधु),
जो स्वयं जैन धर्म के अत्याचारों से पीड़ित होने के कारण शैव हो गया था,
उसने अपनी चमत्कारिणी शक्ति के द्वारा महेन्द्रविक्रमवर्मा को शैवधर्मानुयायी
बना दिया। इस बात की पुष्टि इस तथ्य से होती है कि इस राजा के द्वारा
निर्मित अनेक शिव मन्दिर बल्लम (चिंगलपेट), महेन्द्रवाड़ी (उत्तर अरकोट)
दड़वानूर (दक्षिण अरकोट), शिष्यमङ्गलम् और पल्लावरम् में हैं। सम्भवतः
इसी राजा ने जो विभिन्न मन्दिर बनवाए उनके स्तम्भों और दीवारों पर
तत्कालीन शासनरत राजाओं की विभिन्न उपाधियों को खुदवाने की प्रथा
प्रारम्भ की थी। उन उपाधियों में महेन्द्रविक्रमवर्मा के लिए प्रयुक्त ये उपनाम
भी मिलते हैं—गुणभर, पुरुषोत्तम, सत्यस्यन्द, अवनिभाजन, विचित्रचित्त,
नरेन्द्र, ललिताङ्ककुर, शत्रुमल्ल इत्यादि ।८ परन्तु शैव होने पर भी इस राजा
की अन्य धर्मों के प्रति पूर्ण श्रद्धा थी। इस तथ्य की पुष्टि महेन्द्रवाड़ी में
महेन्द्रतड़ाग के किनारे पर चट्टानों को काटकर महेन्द्रविक्रमवर्मा द्वारा
बनवाए गए महेन्द्रविष्णुगृह नाम के विष्णुमन्दिर से होती हैं।९ पुनः इस
राजा के विषय में प्राप्त मड्डगपट्टु (तमिलनाडु) अभिलेख इस ओर संकेत
७. पल्लवकुलधरणिमण्डलकुलपर्वतस्य सर्विनयविजितसमस्तसामन्तमण्डलस्य
आखण्डलसमपराक्रमश्रियः श्रीमहिमानुरूपदानविभूतिपरिभूतराजराजस्य
श्रीसिंहविष्णुवर्मणः पुत्रः शत्रुषद्वर्गनिग्रहपरः परहितपरतन्त्रतया महा-
भूतसधर्मा महाराजः श्रीविक्रमवर्मा नाम।
8. R. Gopalan, History of the Pallavas of Kanchi, p. 90.
9. Ibid., p, 90.