मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
by पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार)
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Read in context४ मत्तविलास-प्रहसन
'नटैर्यत् प्रदर्श्यते तन्नाट्यम् । तत्र नृत्यगीतादीनां प्रवेशो नास्ति ।'¹
अर्थात् नटों के द्वारा जो प्रदर्शित किया जाता है तथा जिसमें नृत्त
गीतादि का समावेश नहीं होता है वह नाट्य कहलाता है। परन्तु महिमभट्ट
ने नाट्य में गीत का प्रयोग स्वीकार किया है। उनके मत में नाट्य 'वाक्या-
र्थाभिनयात्मक' तथा रसाश्रय होता है।² नन्दिकेश्वर के मतानुसार आदर्श
पूर्वकथा के अभिनय को नाट्य कहते हैं।³ वे नाट्य की प्रतिष्ठा सत्त्व में
मानते हैं—
'सत्त्वे नाट्यम् प्रतिष्ठितम् ।' (अभि० दर्पण, १५)
नाट्य का मुख्य धर्म है—कथनोपकथन; आचार्यों की मान्यता है कि
कथनोपकथन के बिना अनुकृति अधूरी होगी; इसलिए नाट्य में वाचिकाभिनय
का विशेष महत्त्व है।⁴
नाटक का उद्भव
नाटक की उत्पत्ति कब और कैसे हुई यह संस्कृत साहित्य का एक
विवादास्पद विषय है। आदि काल से ही मानव हृदय में अनुकरण की प्रवृत्ति
रही और उसका काल-क्रम से विकास होकर नाटक के रूप में उसकी परिणति
हुई यह पौराणिक मान्यता है। 'ऋग्वेद' में यम-यमी संवाद (१०.१०) पुरूरवा-
उर्वशी संवाद (१०.९५), अगस्त्य-लोपामुद्रा संवाद (१.१७९) और विश्वा-
मित्र-नदी संवाद (३.३३) आदि नाटक के बीज माने जाते हैं। 'रामायण'
में भी नट, नर्तक, नाटक, रङ्ग एवं कुशीलव आदि का प्रयोग और 'महाभारत'
में रङ्गशाला, नट आदि का उल्लेख इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि नाटकों
का विकास अवश्य होने लगा था। भारतीय परम्परा नाटक को पंचम वेद
ही मानती है और इसका साक्षात् प्रमाण है—भरतमुनि का 'नाट्यशास्त्र'।
१. उद्धृत—वाचस्पति गैरोला, 'भारतीय नाट्यपरम्परा और अभिनय-
दर्पण,' पृ० ७६
२. वही, पृ० ७७
३. अभि० दर्पण, १५
४. वाचस्पति गैरोला, 'भारतीय नाट्यपरम्परा और अभिनयदर्पण', पृ० ८०