मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
by पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार)
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हुए कहता है कि एक ओर तो ये जैन लोग यह कहते हैं कि कार्य अपने कारण
के सरूप होता है और दूसरी ओर ये दुःखरूप कारण से सुखरूपी कार्य की
उत्पत्ति होती है, यह कहते हैं ।२४ अर्थात् वे काम क्लेश पर जोर देते हैं
और मानते हैं कि तप आदि कष्टों से मोक्षरूपी सुख प्राप्त होता है ।
कापालिक का कथन है कि दुःख से सुख की उत्पत्ति असम्भव है क्योंकि दुःख
और सुख दोनों विरोधी तत्त्व हैं ।
जैन धर्मानुयायियों के लिए भी ये कुछ नियम निर्धारित हैं, जैसे कि
ब्रह्मचर्य का पालन, बालों को एक-एक करके उखाड़ना, मल धारण करना,
भोजन के समय का नियम (सूर्यास्त से पहले ही खाना), मलिन वस्त्र धारण
करना इत्यादि ।२५
इस प्रकार बौद्ध धर्म, जैन धर्म और कापालिक सम्प्रदाय के कुछ
दार्शनिक तत्त्वों का उल्लेख इस प्रहसन से प्राप्त होता है ।
कथा-वस्तु
'मत्तविलास' की कथा इस प्रकार है—सत्यसोम नाम का कापालिक
देवसोमा नाम की युवती के साथ मद्यपान करते हुए काञ्चीपुरी के मार्ग पर
घूमता है और देवसोमा के सौन्दर्य की प्रशंसा करता है। नशे की अवस्था
में वह देवसोमा के नाम का उच्चारण भी गलत करता है और इस कारण
से फिर से मद्यपान न करने का निर्णय करता है, परन्तु देवसोमा उसे ऐसा
करने से रोकती है। कापालिक प्रसन्न होता है और कापालिक धर्म के
प्रवर्तक शिव की स्तुति करता है जिन्होंने सुरापान और स्त्रीसहवास आदि
को मोक्ष प्राप्ति का साधन बताया है। परन्तु जब देवसोमा जैनों के मत
का पार्थक्य बताती है तो कापालिक उनके दर्शन को झूठा बताता है कि वे
दुःख रूपी कारण से सुख रूपी कार्य की उत्पत्ति होती है ऐसा कहते हैं जो
असंभव है। पुनः जैनों का नाम लेने से अपवित्र हुई जिह्वा के प्रक्षालन
के लिए पुनः मदिरा पीने के लिए मदिरा की दुकान पर जाते हैं लेकिन
२४. कार्यस्य निःसंशयमात्महेतोः सरूपतां हेतुभिरभ्युपेत्य ।
दुःखस्य कार्यं सुखमामनन्तः स्वेनैव वाक्येन हता वराकाः ॥८॥
२५. ये ब्रह्मचर्य-केशनिर्लोटन-मलधारण-भोजनवेलानियम-मलिनपट-परिधाना-
दिभिः प्राणिनः परिक्लेशयन्ति ।