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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

by पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार)

DevanagariHindipublished100 pages

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Page 21

भूमिका ६
'रसस्तु भूयसा कार्यः षड्विधो हास्य एव च ।' (दश० ३ ५६)
काव्यशास्त्रियों द्वारा दी गई प्रहसन की विभिन्न परिभाषाओं के
आधार पर यह कहा जा सकता है कि संस्कृत में समय-समय पर प्रहसन
अवश्य लिखे गए होंगे । 'कन्दर्पकेलि', 'सागर-कौमुदी', 'केलिकेलि', 'हास्यार्णव',
'धूर्तचरितम्', 'सैरन्ध्रिका', 'लटकमेलकम्', 'भगवदज्जुकीयम्', 'मत्तविलास',
'धूर्तसमागम', 'कौतुकरत्नाकर', 'धूर्तनर्तक', 'डमरूक' और 'कौतुकसर्वस्व' आदि
प्रहसन संस्कृत साहित्य में लिखे गए परन्तु इनमें से कुछ प्रहसन ही अंशतः
या पूर्णरूप से उपलब्ध होते हैं ।
संस्कृत साहित्य के प्रहसनों में एक मार्मिक व्यंग्य होने के कारण
उनकी बड़ी ख्याति और लोकप्रियता भी रही है । उनमें यद्यपि अश्लीलता
भी कहीं-कहीं दिखाई देती है, किन्तु चार्वाक, जैन, बौद्ध, कापालिक आदि
वेद विरोधी धर्मानुयायियों के प्रति उनमें जो आक्षेप किए गए हैं, वे बड़े ही
मार्मिक हैं ।५
महेन्द्रविक्रमवर्मा और 'मत्तविलास'
महामहोपाध्याय टी० गणपति शास्त्री द्वारा १९१७ ई० में 'त्रिवेन्द्रम
संस्कृत सीरीज' में प्रकाशित पल्लववंशीय राजा महेन्द्रविक्रमवर्मा द्वारा रचित
'मत्तविलास' प्रहसन संस्कृत साहित्य का प्राचीनतम प्रहसन माना जाता है ।
बोधायनकृत 'भगवदज्जुकीय' प्रहसन का उल्लेख मामण्डूर शिलालेख में
मिलता है—
“ ......गवदज्जुकमत्तविलासादि .........”
इस कारण से कुछ विद्वान् इस प्रहसन को भी राजा की ही रचना
मानते हैं ।
कवि का समय
सातवीं शताब्दी के राजनैतिक इतिहास के विषय में जितनी अधिक
जानकारी उपलब्ध है, उतनी उसके पहले की शताब्दियों के इतिहास की नहीं
है। इस शताब्दी के पूर्वार्द्ध में उत्तरी भारत पर अधिकांशतः स्थाण्वीश्वर के
गौरवशाली राजा हर्षवर्धन का प्रभुत्व था (६०६ ई०-६४७ ई०) । नर्मदा के
५. वाचस्पति गैरोला, 'संस्कृत साहित्य का इतिहास', पृ० ८२२ ।