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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

by पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार)

DevanagariHindipublished100 pages

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Page 28

१६ मत्तविलास-प्रहसन
वहाँ कापालिक को उसका भिक्षापात्र (कपाल) नहीं मिलता। वह संदेह
करता है कि शायद माँसपिंड से युक्त होने के कारण उसके कपाल को किसी
कुत्ते अथवा शाक्यभिक्षु ने ले लिया होगा। अतः कपाली आपद्धर्म को प्रमाण
मानकर गोशृङ्ग से मदिरा ले लेता है। फिर वे दोनों कपाल ढूँढ़ने काञ्ची-
पुरी में घूमते हैं।
इसी समय नागसेन नामक शाक्यभिक्षु अपना भिक्षापात्र लेकर वस्त्रों
के भीतर छिपाकर प्रवेश करता है। वह एक दयालु उपासक सेठ धनदास
के घर से मत्स्य-मांस से युक्त अत्युत्तम भोजन लेकर राजविहार की ओर जाता
है। तभी देवसोमा उसकी ओर संकेत करती है कि वह अंगों को सिकोड़ कर
भयभीत-सा जारहा है। नागसेन कापालिक को पहचान कर बचना चाहता
है परन्तु वह पकड़ा जाता है। कापालिक उसके भिक्षापात्र को देखना चाहता
है। नागसेन देवसोमा को ललचाई दृष्टि से देखता है। कापालिक के पूछने
पर नागसेन कहता है कि बुद्ध के उपदेशानुसार भिक्षापात्र ढक कर ही ले
जाना चाहिए। देवसोमा कापालिक से कहती है कि उसे मदिरा पीकर शक्ति
अर्जित करके शाक्यभिक्षु से विवाद करना चाहिए। कापालिक मदिरा
पीता है और नागसेन को भी मदिरा देने के लिए देवसोमा से कहता है। फिर
दोनों में झगड़ा होता है। कापालिक बलपूर्वक नागसेन से भिक्षापात्र छीनता
है पर नागसेन के धक्का दिये जाने पर गिर जाता है। नागसेन के बालों
को खींचने पर (सिर पर बाल न होने के कारण) देवसोमा भी गिर जाती
है। नागसेन उसे पकड़ कर उठाता है तो कापालिक चिल्लाता है कि वह
उसकी प्रिया का हाथ पकड़ रहा है।
इसी अवसर पर बभ्रुकल्प नामक पाशुपत प्रवेश करता है और
पूछने पर कापालिक घटना बताता है। बभ्रुकल्प देवसोमा को देखता है
जो कि उसकी कुटनी थी और जिसको कापालिक ले गया था। अतः बदला
लेने के लिए वह शत्रुपक्ष को उत्तेजित करने का निश्चय करता है। तभी
नागसेन बौद्ध धर्म के उपदेशों को बताता है। अन्ततोगत्वा, उसे अपना
भिक्षापात्र दिखाना ही पड़ता है। कापालिक उसे देखकर प्रसन्न होता है।
परन्तु पात्र को काले वर्ण का देखकर कापालिक कहता हैं कि रंग बदलने
में तो वह सिद्धहस्त है ही जैसे कि उसने अपने सफेद कपड़े लाल रंग (गेरुआ)
में रंग दिये हैं। अन्त में कोई निर्णय न होने पर बभ्रुकल्प उन दोनों को