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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

अध्याय (पृष्ठ 1509)

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देवर्षि एवं देवराजको भगवती लक्ष्मीका दर्शन

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बलसूदन! संग्रामसे पीछे न हटनेवाले तथा विजयसे सुशोभित होनेवाले शूरवीर नरेशके शरीरमें भी मैं सदा ही मौजूद रहती हूँ ॥ २५ ॥
धर्मनित्ये महाबुद्धौ ब्रह्मण्ये सत्यवादिनि ।
प्रश्रिते दानशीले च सदैव निवसाम्यहम् ॥ २६ ॥
नित्य धर्माचरण करनेवाले, परम बुद्धिमान्, ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, विनयी तथा दानशील पुरुषमें भी मैं सदा ही निवास करती हूँ ॥ २६ ॥
असुरेष्ववसं पूर्वं सत्यधर्मनिबन्धना ।
विपरीतांस्तु तान् बुद्ध्वा त्वयि वासमरोचयम् ॥ २७ ॥
सत्य और धर्मसे बँधकर पहले मैं असुरोंके यहाँ रहती थी। अब उन्हें धर्मके विपरीत देखकर मैंने तुम्हारे यहाँ रहना पसंद किया है ॥ २७ ॥

शक्र उवाच

कथंवृत्तेषु दैत्येषु त्वमवात्सीर्वरानने ।
दृष्ट्वा च किमिहागास्त्वं हित्वा दैतेयदानवान् ॥ २८ ॥
**इन्द्रने कहा—**सुमुखि! दैत्योंका आचरण पहले कैसा था? जिससे तुम उनके पास रहती थी और अब क्या देखा है, जो उन दैत्यों और दानवोंको छोड़कर यहाँ चली आयी हो? ॥ २८ ॥

श्रीरुवाच

स्वधर्ममनुतिष्ठत्सु धैर्यादचलितेषु च ।
स्वर्गमार्गाभिरामेषु सत्त्वेषु निरता ह्यहम् ॥ २९ ॥
**लक्ष्मीने कहा—**इन्द्र! जो अपने धर्मका पालन करते, धैर्यसे कभी विचलित नहीं होते और स्वर्गप्राप्तिके साधनोंमें सानन्द लगे रहते हैं, उन प्राणियोंके भीतर मैं सदा निवास करती हूँ ॥ २९ ॥
दानाध्ययनयज्ञेज्यापितृदैवतपूजनम् ।
गुरूणामतिथीनां च तेषां सत्यमवर्तत ॥ ३० ॥
पहले दैत्यलोग दान, अध्ययन और यज्ञ-यागमें संलग्न रहते थे। देवता, गुरु, पितर और अतिथियोंकी पूजा करते थे। उनके यहाँ सत्यका भी पालन होता था ॥ ३० ॥
सुसम्पृष्टगृहाश्वासन् जितस्त्रीका हुताग्नयः ।
गुरुशुश्रूषका दान्ता ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः ॥ ३१ ॥
वे अपना घर-द्वार झाड़-बुहारकर साफ रखते थे। अपनी स्त्रीके मनको प्यारसे जीत लेते थे। प्रतिदिन अग्निहोत्र करते थे। वे गुरुसेवी, जितेन्द्रिय, ब्राह्मणभक्त तथा सत्यवादी थे ॥ ३१ ॥
श्रद्दधाना जितक्रोधा दानशीलानसूयवः ।

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भृतपुत्रा भृतामात्या भृतदारा ह्यनीर्षवः ॥ ३२ ॥
उनमें श्रद्धा थी। वे क्रोधको जीत चुके थे। वे दानी थे। दूसरोंके गुणोंमें दोषदृष्टि नहीं रखते थे और ईर्ष्यारहित थे। वे स्त्री, पुत्र और मन्त्री आदिका भरण-पोषण करते थे ॥ ३२ ॥
अमर्षेण न चान्योन्यं स्पृहयन्ते कदाचन ।
न च जातूपतप्यन्ति धीराः परसमृद्धिभिः ॥ ३३ ॥
अमर्षवश कभी एक-दूसरेके प्रति लाग-डाँट नहीं रखते थे। सभी धीर स्वभावके थे। दूसरोंकी समृद्धियोंसे उनके मनमें कभी संताप नहीं होता था ॥ ३३ ॥
दातारः संगृहीतार आर्याः करुणवेदिनः ।
महाप्रसादा ऋजवो दृढभक्ता जितेन्द्रियाः ॥ ३४ ॥
वे दान देते, कर आदिके द्वारा धन-संग्रह करते तथा आर्य-जनोचित आचार-विचारसे रहते थे। वे दया करना जानते थे। वे दूसरोंपर महान् अनुग्रह करनेवाले थे। वे सभी सरल स्वभावके और दृढ़तापूर्वक भक्ति रखनेवाले थे। उन सबने अपनी इन्द्रियोंपर विजय पायी थी ॥ ३४ ॥
संतुष्टभृत्यसचिवाः कृतज्ञाः प्रियवादिनः ।
यथार्हमानार्थकरा ह्रीनिषेवा यतव्रताः ॥ ३५ ॥
वे अपने भृत्यों और मन्त्रियोंको संतुष्ट रखते थे। कृतज्ञ और मधुरभाषी थे। सबका समुचित रूपसे सम्मान करते, सबको धन देते, लज्जाका सेवन करते और व्रत एवं नियमोंका पालन करते थे ॥ ३५ ॥
नित्यं पर्वसु सुस्नाताः स्वनुलिप्ताः स्वलंकृताः ।
उपवासतपःशीलाः प्रतीता ब्रह्मवादिनः ॥ ३६ ॥
सदा ही पर्वोंपर विशेष स्नान करते, अपने अंगोंमें चन्दन लगाते और सुन्दर अलंकार धारण करते थे। स्वभावसे ही उपवास और तपमें लगे रहते थे। सबके विश्वासपात्र थे और वेदोंका स्वाध्याय किया करते थे ॥
नैनानभ्युदियात् सूर्यो न चाप्यासन् प्रगेशयाः ।
रात्रौ दधि च सक्तूंश्च नित्यमेव व्यवर्जयन् ॥ ३७ ॥
दैत्य कभी प्रातःकाल सोये नहीं रहते थे। उनके सोते समय सूर्य नहीं उगते थे; अर्थात् वे सूर्योदयसे पहले ही जाग उठते थे। वे रातमें कभी दही और सत्तू नहीं खाते थे ॥ ३७ ॥
कल्यं घृतं चान्ववेक्षन् प्रयता ब्रह्मवादिनः ।
मङ्गल्यान्यपि चापश्यन् ब्राह्मणांश्चाप्यपूजयन् ॥ ३८ ॥
वे मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते, सबेरे उठकर घीका दर्शन करते, वेदोंका पाठ करते, अन्य मांगलिक वस्तुओंको देखते और ब्राह्मणोंकी पूजा करते थे ॥ ३८ ॥
सदा हि वदतां धर्मं सदा चाप्रतिगृह्णताम् ।

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अर्धं च रात्र्याः स्वपतां दिवा चास्वपतां तथा ॥ ३९ ॥
सदा धर्मकी ही चर्चामें लगे रहते और प्रतिग्रहसे दूर रहते थे। रातके आधे भागमें ही सोते थे और दिनमें नहीं सोते थे ॥ ३९ ॥
कृपणानाथवृद्धानां दुर्बलातुरयोषिताम् ।
दयां च संविभागं च नित्यमेवान्वमोदताम् ॥ ४० ॥
कृपण, अनाथ, वृद्ध, दुर्बल, रोगी और स्त्रियोंपर दया करते तथा उनके लिये अन्न और वस्त्र बाँटते थे। इस कार्यका वे सदा अनुमोदन किया करते थे ॥ ४० ॥
त्रस्तं विषण्णमुद्विग्नं भयार्तं व्याधितं कृशम् ।
हृतस्वं व्यसनार्तं च नित्यमाश्वासयन्ति ते ॥ ४१ ॥
त्रस्त, विषादग्रस्त, उद्विग्न, भयभीत, व्याधिग्रस्त, दुर्बल और पीड़ितको तथा जिसका सर्वस्व लुट गया हो, उस मनुष्यको वे सदा ढाढ़स बँधाया करते थे ॥ ४१ ॥
धर्ममेवान्ववर्तन्त न हिंसन्ति परस्परम् ।
अनुकूलाश्च कार्येषु गुरुवृद्धोपसेविनः ॥ ४२ ॥
वे धर्मका ही आचरण करते थे। एक-दूसरेकी हिंसा नहीं करते थे। सब कार्योंमें परस्पर अनुकूल रहते और गुरुजनों तथा बड़े-बूढ़ोंकी सेवामें दत्तचित्त थे ॥ ४२ ॥
पितॄन् देवातिथींश्चैव यथावत् तेऽभ्यपूजयन् ।
अवशेषाणि चाश्नन्ति नित्यं सत्यतपोधृताः ॥ ४३ ॥
पितरों, देवताओं और अतिथियोंकी विधिवत् पूजा करते थे तथा उन्हें अर्पण करनेके पश्चात् बचे हुए अन्नको ही प्रसादरूपमें पाते थे। वे सभी सत्यवादी और तपस्वी थे ॥ ४३ ॥
नैकेऽश्नन्ति सुसम्पन्नं न गच्छन्ति परस्त्रियम् ।
सर्वभूतेष्ववर्तन्त यथाऽऽत्मनि दयां प्रति ॥ ४४ ॥
वे अकेले बढ़िया भोजन नहीं करते थे। पहले दूसरोंको देकर पीछे अपने उपभोगमें लाते थे। परायी स्त्रीसे कभी संसर्ग नहीं रखते थे। सब प्राणियोंको अपने ही समान समझकर उनपर दया रखते थे ॥ ४४ ॥
नैवाकाशे न पशुषु वियोनौ च न पर्वसु ।
इन्द्रियस्य विसर्गं ते रोचयन्ति कदाचन ॥ ४५ ॥
वे आकाशमें, पशुओंमें, विपरीत योनिमें तथा पर्वके अवसरोंपर वीर्यत्याग करना कदापि अच्छा नहीं मानते थे ॥ ४५ ॥
नित्यं दानं तथा दाक्ष्यमार्जवं चैव नित्यदा ।
उत्साहोऽथानहंकारः परमं सौहृदं क्षमा ॥ ४६ ॥
सत्यं दानं तपः शौचं कारुण्यं वागनिष्ठुरा ।
मित्रेषु चानभिद्रोहः सर्वं तेष्वभवत् प्रभो ॥ ४७ ॥

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प्रभो! नित्य दान, चतुरता, सरलता, उत्साह, अहंकारशून्यता, परम सौहार्द, क्षमा, सत्य, दान, तप, शौच, करुणा, कोमल वचन, मित्रोंसे द्रोह न करनेका भाव—ये सभी सद्गुण उनमें सदा मौजूद रहते थे ।। ४६-४७ ।।

निद्रा तन्द्रीरसम्प्रीतिरसूयाथानवेक्षिता ।
अरतिश्च विषादश्च स्पृहा चाप्यविशन्न तान् ।। ४८ ।।
निद्रा, तन्द्रा (आलस्य), अप्रसन्नता, दोषदृष्टि, अविवेक, अप्रीति, विषाद और कामना आदि दोष उनके भीतर प्रवेश नहीं कर पाते थे ।। ४८ ।।

साहमेवंगुणेष्वेव दानवेष्ववसं पुरा ।
प्रजासर्गमुपादाय नैकं युगविपर्ययम् ।। ४९ ।।
इस प्रकार उत्तम गुणोंवाले दानवोंके पास सृष्टिकालसे लेकर अबतक मैं अनेक युगोंसे रहती आयी हूँ ।। ४९ ।।

ततः कालविपर्यासे तेषां गुणविपर्ययात् ।
अपश्यं निर्गतं धर्मं कामक्रोधवशात्मनाम् ।। ५० ।।
किंतु समयके उलट-फेरसे उनके गुणोंमें विपरीतता आ गयी। मैंने देखा, दैत्योंमें धर्म नहीं रह गया है। वे काम और क्रोधके वशीभूत हो गये हैं ।। ५० ।।

सभासदां च वृद्धानां सतां कथयतां कथाः ।
प्राहासन्नभ्यसूयंश्च सर्ववृद्धान् गुणावराः ।। ५१ ।।
जब बड़े-बूढ़े लोग उस सभामें बैठकर कोई बात कहते हैं, तब गुणहीन दैत्य उनमें दोष निकालते हुए उन सब वृद्ध पुरुषोंकी हँसी उड़ाया करते हैं ।। ५१ ।।

युवानश्च समासीना वृद्धानपि गतान् सतः ।
नाभ्युत्थानाभिवादाभ्यां यथापूर्वमपूजयन् ।। ५२ ।।
ऊँचे आसनोंपर बैठे हुए नवयुवक दैत्य बड़े-बूढ़ोंके आ जानेपर भी पहलेकी भाँति न तो उठकर खड़े होते हैं और न प्रणाम करके ही उनका आदर-सत्कार करते हैं ।। ५२ ।।

वर्तयत्येव पितरि पुत्रः प्रभवते तथा ।
अमित्रभृत्यतां प्राप्य ख्यापयन्त्यनपत्रपाः ।। ५३ ।।
बापके रहते ही बेटा मालिक बन बैठता है। वे शत्रुओंके सेवक बनकर अपने उस कर्मको निर्लज्जतापूर्वक दूसरोंके सामने कहते हैं ।। ५३ ।।

तथा धर्मादपेतेन कर्मणा गर्हितेन ये ।
महतः प्राप्नुवन्त्यर्थांस्तेषां तत्राभवत् स्पृहा ।। ५४ ।।
धर्मके विपरीत निन्दित कर्मद्वारा जिन्हें महान् धन प्राप्त हो गया है, उनकी उसी प्रकार धनोपार्जन करनेकी अभिलाषा बढ़ गयी है ।। ५४ ।।

उच्चैश्चाभ्यवदन् रात्रौ नीचैस्तत्राग्निरज्वलत् ।
पुत्राः पितॄनत्यचरन् नार्यश्चात्यचरन् पतीन् ।। ५५ ।।

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दैत्य रातमें जोर-जोरसे हल्ला मचाते हैं और उनके यहाँ अग्निहोत्रकी आग मन्दगतिसे जलने लगी है। पुत्रोंने पिताओंपर और स्त्रियोंने पतियोंपर अत्याचार आरम्भ कर दिया है ॥ ५५ ॥

मातरं पितरं वृद्धमाचार्यमतिथिं गुरुम् ।
गुरुत्वान्नाभ्यनन्दन्त कुमारान् नान्वपालयन् ॥ ५६ ॥
दैत्य और दानव गुरुत्व होते हुए भी माता-पिता, वृद्ध पुरुष, आचार्य, अतिथि और गुरुजनोंका अभिनन्दन नहीं करते हैं। संतानोंके लालन-पालनपर भी ध्यान नहीं देते हैं ॥ ५६ ॥

भिक्षां बलिमदत्त्वा च स्वयमन्नानि भुञ्जते ।
अनिष्ट्वाऽसंविभज्याथ पितृदेवातिथीन् गुरून् ॥ ५७ ॥
देवताओं, पितरों, गुरुजनों तथा अतिथियोंका यजन-पूजन और उन्हें अन्नदान किये बिना, भिक्षादान और बलिवैश्वदेव-कर्मका सम्पादन किये बिना ही दैत्यलोग स्वयं भोजन कर लेते हैं ॥ ५७ ॥

न शौचमनुरुद्ध्यन्त तेषां सूदजनास्तथा ।
मनसा कर्मणा वाचा भक्ष्यमासीदनावृतम् ॥ ५८ ॥
दैत्य तथा उनके रसोइये मन, वाणी और क्रियाद्वारा शौचाचारका पालन नहीं करते हैं। उनका भोजन बिना ढके ही छोड़ दिया जाता है ॥ ५८ ॥

विप्रकीर्णानि धान्यानि काकमूषिकभोजनम् ।
अपावृतं पयोऽतिष्ठदुच्छिष्टाश्चास्पृशन् घृतम् ॥ ५९ ॥
उनके घरोंमें अनाजके दाने बिखरे रहते हैं और उन्हें कौए तथा चूहे खाते हैं। वे दूधको बिना ढके छोड़ देते हैं और घीको जूठे हाथोंसे छू देते हैं ॥ ५९ ॥

कुद्दालं दात्रपिटकं प्रकीर्णं कांस्यभाजनम् ।
द्रव्योपकरणं सर्वं नान्ववैक्षत् कुटुम्बिनी ॥ ६० ॥
दैत्योंकी गृहस्वामिनियाँ घरमें इधर-उधर बिखरे हुए कुदाल, दराँती (या हँसुआ), पिटारी, काँसेके बर्तन तथा अन्य सब द्रव्यों और सामानोंकी देख-भाल नहीं करती हैं ॥ ६० ॥

प्राकारागारविध्वंसान्न स्म ते प्रतिकुर्वते ।
नाद्रियन्ते पशून् बद्ध्वा यवसेनोदकेन च ॥ ६१ ॥
उनके गाँवों और नगरोंकी चहारदिवारी तथा घर गिर जाते हैं; परंतु वे उसकी मरम्मत नहीं कराते हैं। दैत्यलोग पशुओंको घरमें बाँध देते हैं, किंतु चारा और पानी देकर उनकी सेवा नहीं करते हैं ॥ ६१ ॥

बालानां प्रेक्षमाणानां स्वयं भक्ष्यमभक्षयन् ।
तथा भृत्यजनं सर्वमसंतर्प्य च दानवाः ॥ ६२ ॥

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छोटे बच्चे आशा लगाये देखते रहते हैं और दानवलोग खानेकी चीजें स्वयं खा लेते हैं। सेवकों तथा अन्य सब कुटुम्बीजनोंको भूखे छोड़कर अपने खा लेते हैं ।। ६२ ।।
पायसं कृसरं मांसमपूपानथ शष्कुलीः ।
अपाचयन्नात्मनोऽर्थे वृथा मांसान्यभक्षयन् ।। ६३ ।।
खीर, खिचड़ी, मांस, पूआ और पूरी आदि भोजन वे सिर्फ अपने खानेके लिये बनवाते हैं तथा वे व्यर्थ ही मांस खाया करते हैं ।। ६३ ।।
उत्सूर्यशायिनश्चासन् सर्वे चासन् प्रगेनिशाः ।
अवर्तन् कलहाश्चात्र दिवारात्रं गृहे गृहे ।। ६४ ।।
अब वे सूर्योदय होनेतक सोने लगे हैं। प्रातःकालको भी रात ही समझते हैं। उनके घर-घरमें दिन-रात कलह मचा रहता है ।। ६४ ।।
अनार्याश्चार्यमासीनं पर्युपासन्न तत्र ह ।
आश्रमस्थान् विधर्मस्थाः प्राद्विषन्त परस्परम् ।। ६५ ।।
दानवोंके यहाँ अनार्य वहाँ बैठे हुए आर्य पुरुषकी सेवामें उपस्थित नहीं होते हैं। अधर्मपरायण दैत्य आश्रमवासी महात्माओंसे तथा आपसमें भी द्वेष रखते हैं ।। ६५ ।।
संकराश्चाभ्यवर्तन्त न च शौचमवर्तत ।
ये च वेदविदो विप्रा विस्पष्टमनृचश्च ये ।। ६६ ।।
निरन्तरविशेषास्ते बहुमानावमानयोः ।
अब उनके यहाँ वर्णसंकर संतानें होने लगी हैं। किसीमें पवित्रता नहीं रह गयी है। जो वेदोंके विद्वान् ब्राह्मण हैं और जो स्पष्ट ही वेदकी एक ऋचा भी नहीं जानते हैं, उन दोनोंमें वे दैत्यलोग कोई अन्तर या विशेषता नहीं समझते हैं और न उनका मान या अपमान करनेमें ही कोई अन्तर रखते हैं ।। ६६ १/२ ।।
हारमाभरणं वेषं गतं स्थितमवेक्षितम् ।। ६७ ।।
असेवन्त भुजिष्या वै दुर्जनाचरितं विधिम् ।
वहाँकी दासियाँ सुन्दर हार एवं अन्य आभूषण पहनकर मनोहर वेष धारण करतीं और दुराचारिणी स्त्रियोंकी भाँति चलती-फिरती, खड़ी होती और कटाक्ष करती हैं। साथ ही वे उस कुकृत्यको अपनाती हैं, जिसका आचरण दुराचारीजन करते हैं ।। ६७ १/२ ।।
स्त्रियः पुरुषवेषेण पुंसः स्त्रीवेषधारिणः ।। ६८ ।।
क्रीडारतिविहारेषु परां मुदमवाप्नुवन् ।
क्रीडा, रति और विहारके अवसरोंपर वहाँकी स्त्रियाँ पुरुषवेष धारण करके और पुरुष स्त्रियोंका वेष बनाकर एक-दूसरेसे मिलते और बड़े आनन्दका अनुभव करते हैं ।। ६८ १/२ ।।
प्रभवद्भिः पुरा दायानर्हेभ्यः प्रतिपादितान् ।। ६९ ।।
नाभ्यवर्तन्त नास्तिक्याद् वर्तन्तः सम्भवेष्वपि ।

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कितने ही दानव पूर्वकालमें अपने पूर्वजोंद्वारा सुयोग्य ब्राह्मणोंको दानके रूपमें दी हुई जागीरें नास्तिकताके कारण उनके पास रहने नहीं देते हैं यद्यपि वे अन्य सम्भव उपायोंसे जीवन-निर्वाह कर सकते हैं तथापि उस दिये हुए दानको छीन लेते हैं ।। ६९ १/३ ।।
मित्रेणाभ्यर्थितं मित्रमर्थसंशयिते क्वचित् ।। ७० ।।
वालकोट्यग्रमात्रेण स्वार्थेनाघ्नत तद् वसु ।
कहीं धनके विषयमें संशय उपस्थित होनेपर अर्थात् यह धन न्यायतः मेरा है या दूसरेका, यह प्रश्न खड़ा होनेपर यदि उस धनका अधिकारी व्यक्ति अपने किसी मित्रसे प्रार्थना करता है कि वह पंचायतद्वारा इस मामलेको निपटा दे तो वह मित्र अपने बालकी नोकके बराबर स्वार्थके लिये भी उसकी उस सम्पत्तिको चौपट कर देता है ।। ७० १/३ ।।
परस्वादानरुचयो विपणव्यवहारिणः ।। ७१ ।।
अदृश्यन्तार्यवर्णेषु शूद्राश्चापि तपोधनाः ।
दानवोंके यहाँ जो व्यापारी हैं, वे सदा दूसरोंका धन ठग लेनेका ही विचार रखते हैं तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंमें शूद्र भी मिलकर तपोधन बन बैठे हैं ।। ७१ १/३ ।।
अधीयतेऽव्रताः केचिद् वृथा व्रतमथापरे ।। ७२ ।।
कुछ लोग ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन किये बिना ही वेदोंका स्वाध्याय करते हैं, कुछ लोग व्यर्थ (अवैदिक) व्रतका आचरण करते हैं ।। ७२ ।।
अशुश्रूषुर्गुरोः शिष्यः कश्चिच्छिष्यसखो गुरुः ।
शिष्य गुरुकी सेवा करना नहीं चाहता। कोई-कोई गुरु भी ऐसा है जो शिष्योंको दोस्त बनाकर रखता है ।।
पिता चैव जनित्री च श्रान्तौ वृत्तोत्सवाविव ।। ७३ ।।
अप्रभुत्वे स्थितौ वृद्धावन्नं प्रार्थयतः सुतान् ।
जब पिता और माता उत्सवशून्यकी भाँति थक जाते हैं, तब घरमें उनकी कोई प्रभुता नहीं रह जाती। वे दोनों बूढ़े दम्पति बेटोंसे अन्नकी भीख माँगते हैं ।। ७३ १/३ ।।
तत्र वेदविदः प्राज्ञा गाम्भीर्ये सागरोपमाः ।। ७४ ।।
कृष्यादिष्वभवन् सक्ता मूर्खाः श्राद्धान्यभुञ्जत ।
वहाँ जो वेदवेत्ता ज्ञानी तथा गम्भीरतामें समुद्रके समान पुरुष हैं, वे तो खेती आदि कार्योंमें संलग्न हो गये हैं और मूर्खलोग श्राद्धान्न खाते फिरते हैं ।। ७४ १/३ ।।
प्रातः प्रातश्च सुप्रश्नं कल्पनं प्रेषणक्रियाः ।। ७५ ।।
शिष्यानप्रहितास्तेषामकुर्वन् गुरवः स्वयं ।

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गुरुलोग प्रतिदिन प्रातःकाल जाकर शिष्योंसे पूछते हैं कि आपकी रात सुखसे बीती है न? इसके सिवा वे उन शिष्योंके वस्त्र आदि ठीकसे पहनाते और उनकी वेश-भूषा सँवारते हैं तथा उनकी ओरसे कोई प्रेरणा न होनेपर भी स्वयं ही उनके संदेशवाहक दूत आदिका कार्य करते हैं ।। ७५ १/२ ।।

श्वश्रूश्वशुरयोरग्रे वधूः प्रेष्यानशासत ।। ७६ ।।
अन्वशासच्च भर्तारं समाहूयाभिजल्पति ।
सास-ससुरके सामने ही बहू सेवकोंपर शासन करने लगी है। वह पतिको भी आदेश देती है और सबके सामने पतिको बुलाकर उससे बात करती है ।। ७६ १/२ ।।

प्रयत्नेनापि चारक्षच्चित्तं पुत्रस्य वै पिता ।। ७७ ।।
व्यभजच्चापि संरम्भाद् दुःखवासं तथावसत् ।
पिता विशेष प्रयत्नपूर्वक पुत्रका मन रखते हैं। वे उनके क्रोधसे डरकर सारा धन पुत्रोंको बाँट देते हैं और स्वयं बड़े कष्टसे जीवन बिताते हैं ।। ७७ १/२ ।।

अग्निदाहेन चौरैर्वा राजभिर्वा हृतं धनम् ।। ७८ ।।
दृष्ट्वा द्वेषात् प्राहसन्त सुहृत्सम्भाविता ह्यपि ।
जिन्हें हितैषी और मित्र समझा जाता था, वे ही लोग जब अपने सम्बन्धीके धनको आग लगने, चोरी हो जाने अथवा राजाके द्वारा छिन जानेसे नष्ट हुआ देखते हैं, तब द्वेषवश उसकी हँसी उड़ाते हैं ।। ७८ १/२ ।।

कृतघ्ना नास्तिकाः पापा गुरुदाराभिमर्शिनः ।। ७९ ।।
अभक्ष्यभक्षणरता निर्मर्यादा हतत्विषः ।
दैत्यगण कृतघ्न, नास्तिक, पापाचारी तथा गुरुपत्नीगामी हो गये हैं। जो चीज नहीं खानी चाहिये, वे भी खाते और धर्मकी मर्यादा तोड़कर मनमाने आचरण करते हैं। इसीलिये वे कान्तिहीन हो गये हैं ।। ७९ १/२ ।।

तेष्वेवमादीनाचारानाचरत्सु विपर्यये ।। ८० ।।
नाहं देवेन्द्र वत्स्यामि दानवेष्विति मे मतिः ।
देवेन्द्र! जबसे इन दैत्योंने ये धर्मके विपरीत आचरण अपनाये हैं, तबसे मैंने यह निश्चय कर लिया है कि अब इन दानवोंके घरमें नहीं रहूँगी ।। ८० १/२ ।।

तन्मां स्वयमनुप्राप्तामभिनन्द शचीपते ।। ८१ ।।
त्वयार्चितां मां देवेश पुरो धास्यन्ति देवताः ।
शचीपते! देवेश्वर! इसीलिये मैं स्वयं तुम्हारे यहाँ आयी हूँ। तुम मेरा अभिनन्दन करो। तुमसे पूजित होनेपर मुझे अन्य देवता भी अपने सम्मुख स्थापित (एवं सम्मानित) करेंगे ।। ८१ १/२ ।।

यत्राहं तत्र मत्कान्ता मद्विशिष्टा मदर्पणाः ।। ८२ ।।

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सप्त देव्यो जयाष्टम्यो वासमेष्यन्ति तेऽष्टधा ।
जहाँ मैं रहूँगी, वहाँ सात देवियाँ और निवास करेंगी, उन सबके आगे आठवीं जया देवी भी रहेंगी। ये आठों देवियाँ मुझे बहुत प्रिय हैं, मुझसे भी श्रेष्ठ हैं और मुझे आत्मसमर्पण कर चुकी हैं ॥ ८२ १/२ ॥

आशा श्रद्धा धृतिः शान्तिर्विजितिः संनतिः क्षमा ॥ ८३ ॥
अष्टमी वृत्तिरेतासां पुरोगा पाकशासन ।
पाकशासन! उन देवियोंके नाम इस प्रकार हैं—आशा, श्रद्धा, धृति, शान्ति, विजिति, संनति, क्षमा और आठवीं वृत्ति (जया)। ये आठवीं देवी उन सातोंकी अग्रगामिनी हैं ॥ ८३ १/२ ॥

ताश्चाहं चासुरांस्त्यक्त्वा युष्मद्विषयमागताः ॥ ८४ ॥
त्रिदशेषु निवत्स्यामो धर्मनिष्ठान्तरात्मसु ।
वे देवियाँ और मैं सब-के-सब उन असुरोंको त्यागकर तुम्हारे राज्यमें आयी हैं। देवताओंकी अन्तरात्मा धर्ममें निष्ठा रखनेवाली है; इसलिये अब हमलोग इन्हींके यहाँ निवास करेंगी ॥ ८४ १/२ ॥

इत्युक्तवचनां देवीं प्रीत्यर्थं च ननन्दतुः ॥ ८५ ॥
नारदश्चात्र देवर्षिर्वृत्रहन्ता च वासवः ।
(भीष्मजी कहते हैं—) लक्ष्मीदेवीके इस प्रकार कहनेपर देवर्षि नारद तथा वृत्रहन्ता इन्द्रने उनकी प्रसन्नताके लिये उनका अभिनन्दन किया ॥ ८५ १/२ ॥

ततोऽनलसखो वायुः प्रववौ देववर्त्मसु ॥ ८६ ॥
इष्टगन्धः सुखस्पर्शः सर्वेन्द्रियसुखावहः ।
उस समय देवमार्गोंपर मनोरम गन्ध और सुखद स्पर्शसे युक्त तथा सम्पूर्ण इन्द्रियोंको आनन्द प्रदान करनेवाले वायुदेव, जो अग्निदेवताके मित्र हैं, मन्दगतिसे बहने लगे ॥ ८६ १/२ ॥

शुचौ वाभ्यर्थिते देशे त्रिदशाः प्रायशः स्थिताः ॥ ८७ ॥
लक्ष्मीसहितमासीनं मघवन्तं दिदृक्षवः ॥ ८८ ॥
उस परम पवित्र एवं मनोवाञ्छित प्रदेशमें राजलक्ष्मीसहित इन्द्रदेवका दर्शन करनेके लिये प्रायः सभी देवता उपस्थित हो गये ॥ ८७-८८ ॥

ततो दिवं प्राप्य सहस्रलोचनः
श्रीयोपपन्नः सुहृदा महर्षिणा ।
रथेन हर्यश्वयुजा सुरर्षभः
सदः सुराणामभिसत्कृतो ययौ ॥ ८९ ॥

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तत्पश्चात् सहस्रनेत्रधारी सुरश्रेष्ठ इन्द्र लक्ष्मीदेवी तथा अपने सुहृद् महर्षि नारदके साथ हरे रंगके घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर स्वर्गलोककी राजधानी अमरावतीमें आये और देवताओंसे सत्कृत हो उनकी सभामें गये ॥ ८९ ॥

अथेङ्गितं वज्रधरस्य नारदः
श्रियश्च देव्या मनसा विचारयन् ।
श्रियै शशंसामरदृष्टपौरुषः
शिवेन तत्रागमनं महर्षिभिः ॥ ९० ॥
उस समय अमरोंके पौरुषको प्रत्यक्ष देखनेवाले देवर्षि नारदजीने अन्य महर्षियोंके साथ मिलकर वज्रधारी इन्द्र और लक्ष्मीदेवीके संकेतपर मन-ही-मन विचार करके वहाँ लक्ष्मीजीके शुभागमनकी प्रशंसा की और उनका पदार्पण सम्पूर्ण लोकोंके लिये मंगलकारी बताया ॥ ९० ॥

ततोऽमृतं द्यौः प्रववर्ष भास्वती
पितामहस्यायतने स्वयम्भुवः ।
अनाहता दुन्दुभयोऽथ नेदिरे
तथा प्रसन्नाश्च दिशश्चकाशिरे ॥ ९१ ॥
तदनन्तर निर्मल एवं प्रकाशपूर्ण आकाशमण्डल स्वयम्भू ब्रह्माजीके भवनमें अमृतकी वर्षा करने लगा। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बिना बजाये ही बज उठीं तथा सम्पूर्ण दिशाएँ स्वच्छ एवं प्रकाशित दिखायी देने लगीं ॥ ९१ ॥

यथर्तु सस्येषु ववर्ष वासवो
न धर्ममार्गाद् विचचाल कश्चन ।
अनेकरत्नाकरभूषणा च भूः
सुघोषघोषा भूवनौकसां जये ॥ ९२ ॥
लक्ष्मीजीके स्वर्गमें पधारनेपर इन्द्रदेव ऋतुके अनुसार संसारमें लगी हुई खेतीको सींचनेके लिये समयपर वर्षा करने लगे। कोई भी धर्मके मार्गसे विचलित नहीं होता था तथा अनेक समुद्रोंसे विभूषित हुई पृथ्वी उन समुद्रोंकी गर्जनाके रूपमें त्रिभुवनवासियोंकी विजयके लिये मानो सुन्दर जयघोष करने लगी ॥ ९२ ॥

क्रियाभिरामा मनुजा मनस्विनो
बभुः शुभे पुण्यकृतां पथि स्थिताः ।
नरामराः किन्नरयक्षराक्षसाः
समृद्धिमन्तः सुमनस्विनोऽभवन् ॥ ९३ ॥
उस समय मनस्वी मानव पुण्यवानोंके मंगलमय पथपर स्थित हो सत्कर्मोंसे परम सुन्दर शोभा पाने लगे तथा देवता, किन्नर, यक्ष, राक्षस और मनुष्य समृद्धिशाली एवं उदारचेता हो गये ॥ ९३ ॥

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न जात्वकाले कुसुमं कुतः फलं
पपात वृक्षात् पवनेरितादपि ।
रसप्रदाः कामदुघाश्च धेनवो
न दारुणा वाग् विचचार कस्यचित् ॥ ९४ ॥
उन दिनों अकाल मृत्युकी तो बात ही क्या है, प्रचण्ड पवनके वेगपूर्वक हिलानेसे भी किसी वृक्षसे असमयमें फूलतक नहीं गिरता था; फिर फल कहाँसे गिरेगा? सभी धेनुएँ दुग्ध आदि रस देती थीं। वे इच्छानुसार दुग्ध दिया करती थीं। किसीके मुखसे कभी कोई कठोर वचन नहीं निकलता था ॥ ९४ ॥

इमां सपर्यां सह सर्वकामैः
श्रियश्च शक्रप्रमुखैश्च देवतैः ।
पठन्ति ये विप्रसदःसमागताः
समृद्धकामाः श्रियमाप्नुवन्ति ते ॥ ९५ ॥
सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले इन्द्र आदि देवताओंद्वारा की हुई लक्ष्मीजीकी इस पूजा-अर्चाके प्रसंगको जो लोग ब्राह्मणोंकी सभामें आकर पढ़ते हैं, उनकी सारी कामनाएँ सम्पन्न होती हैं और वे लक्ष्मी भी प्राप्त कर लेते हैं ॥ ९५ ॥

त्वया कुरूणां वर यत् प्रचोदितं
भवाभवस्येह परं निदर्शनम् ।
तदद्य सर्वं परिकीर्तितं मया
परीक्ष्य तत्त्वं परिगन्तुमर्हसि ॥ ९६ ॥
कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर! तुमने जो अभ्युदय-पराभवका लक्षण पूछा था, वह सब मैंने आज यह उत्तम दृष्टान्त देकर बता दिया। तुम्हें स्वयं सोच-विचारकर उसकी यथार्थताका निश्चय करना चाहिये ॥ ९६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि श्री-वासवसंवादो नाम
अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें लक्ष्मी और इन्द्रका संवादात्मक दो सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२८ ॥