महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
शक्तिशाली शत्रुके सामने बेंतकी भाँति नतमस्तक होनेका उपदेश—सरिताओं और समुद्रका संवाद
त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः
शक्तिशाली शत्रुके सामने बेंतकी भाँति नतमस्तक होनेका उपदेश—सरिताओं और समुद्रका संवाद
युधिष्ठिर उवाच
राजा राज्यमनुप्राप्य दुर्लभं भरतर्षभ ।
अमित्रस्यातिवृद्धस्य कथं तिष्ठेदसाधनः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भरतश्रेष्ठ! राजा एक दुर्लभ राज्यको पाकर भी सेना और खजाना आदि साधनोंसे रहित हो तो सभी दृष्टियोंसे अत्यन्त बढ़े-चढ़े हुए शत्रुके सामने कैसे टिक सकता है? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
सरितां चैव संवादं सागरस्य च भारत ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**भारत! इस विषयमें विज्ञ पुरुष सरिताओं तथा समुद्रके संवादरूप एक प्राचीन उपाख्यानका दृष्टान्त दिया करते हैं ॥ २ ॥
सुरारिनिलयः शश्वत्सागरः सरिताम्पतिः ।
पप्रच्छ सरितः सर्वाः संशयं जातमात्मनः ॥ ३ ॥
एक समयकी बात है, दैत्योंके निवासस्थान और सरिताओंके स्वामी समुद्रने सम्पूर्ण नदियोंसे अपने मनका एक संदेह पूछा ॥ ३ ॥
सागर उवाच
समूलशाखान् पश्यामि निहतान् कायिनो द्रुमान् ।
युष्माभिरिह पूर्णाभिर्नद्यस्तत्र न वेतसम् ॥ ४ ॥
**समुद्रने कहा—**नदियो! मैं देखता हूँ कि जब बाढ़ आनेके कारण तुमलोग लबालब भर जाती हो, तब विशालकाय वृक्षोंको जड़-मूल और शाखाओंसहित उखाड़कर अपने प्रवाहमें बहा लाती हो; परंतु उनमें बेंतका कोई पेड़ नहीं दिखायी देता ॥ ४ ॥
अकायश्चाल्पसारश्च वेतसः कूलजश्च वः ।
अवज्ञया वा नानीतः किं च वा तेन वः कृतम् ॥ ५ ॥
बेंतका शरीर तो नहींके बराबर बहुत पतला है। उसमें कुछ दम नहीं होता है और वह तुम्हारे खास किनारेपर जमता है; फिर भी तुम उसे न ला सकी, क्या कारण है? क्या तुम अवहेलनावश उसे कभी नहीं लायीं अथवा उसने तुम्हारा कोई उपकार किया है? ॥ ५ ॥
तदहं श्रोतुमिच्छामि सर्वासा मेव वो मतम् ।
यथा चेमानि कूलानि हित्वा नायाति वेतसः ॥ ६ ॥
इस विषयमें तुम सब लोगोंका विचार मैं सुनना चाहता हूँ, क्या कारण है कि बेंतका वृक्ष तुम्हारे इन तटोंको छोड़कर नहीं आता ? ॥ ६ ॥
तत्र प्राह नदी गङ्गा वाक्यमुत्तममर्थवत् ।
हेतुमद् ग्राहकं चैव सागरं सरिताम्पतिम् ॥ ७ ॥
इस प्रकार प्रश्न होनेपर गंगानदीने सरिताओंके स्वामी समुद्रसे यह उत्तम अर्थपूर्ण, युक्तियुक्त तथा मनको ग्रहण करनेवाली बात कही ॥ ७ ॥
गङ्गोवाच
तिष्ठन्त्येते यथास्थानं नगा ह्येकनिकेतनाः ।
ते त्यजन्ति ततः स्थानं प्रातिलोम्यान्न वेतसः ॥ ८ ॥
गंगा बोली— नदीश्वर! ये वृक्ष अपने-अपने स्थानपर अकड़कर खड़े रहते हैं, हमारे प्रवाहके सामने मस्तक नहीं झुकाते। इस प्रतिकूल बर्तावके कारण ही उन्हें नष्ट होकर अपना स्थान छोड़ना पड़ता है; परंतु बेंत ऐसा नहीं है ॥ ८ ॥
वेतसो वेगमायातं दृष्ट्वा नमति नापरे ।
सरिद्वेगेऽव्यतिक्रान्ते स्थानमासाद्य तिष्ठति ॥ ९ ॥
बेंत नदीके वेगको आते देख झुक जाता है, पर दूसरे वृक्ष ऐसा नहीं करते; अतः वह सरिताओंका वेग शान्त होनेपर पुनः अपने स्थानमें ही स्थित हो जाता है ॥ ९ ॥
कालज्ञः समयज्ञश्च सदा वश्यश्च नोद्धतः ।
अनुलोमस्तथास्तब्धस्तेन नाभ्येति वेतसः ॥ १० ॥
बेंत समयको पहचानता है, उसके अनुसार बर्ताव करना जानता है, सदा हमारे वशमें रहता है, कभी उद्दण्डता नहीं दिखाता और अनुकूल बना रहता है। उसमें कभी अकड़ नहीं आती; इसीलिये उसे स्थान छोड़कर यहाँ नहीं आना पड़ता है ॥ १० ॥
मारुतोदकवेगेन ये नमन्त्युन्नमन्ति च ।
ओषध्यः पादपा गुल्मा न ते यान्ति पराभवम् ॥ ११ ॥
जो पौधे, वृक्ष या लता-गुल्म हवा और पानीके वेगसे झुक जाते तथा वेग शान्त होनेपर सिर उठाते हैं, उनका कभी पराभव नहीं होता ॥ ११ ॥
भीष्म उवाच
यो हि शत्रोर्विवृद्धस्य प्रभोर्बन्धविनाशने ।
पूर्वं न सहते वेगं क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ १२ ॥