महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 639)
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः
राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना
वैशम्पायन उवाच
पौरवेणाथ वयसा ययातिर्नहुषात्मजः ।
प्रीतियुक्तो नृपश्रेष्ठश्चचार विषयान् प्रियान् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! नहुषके पुत्र नृपश्रेष्ठ ययातिने पूरुकी युवावस्थासे अत्यन्त प्रसन्न होकर अभीष्ट विषयभोगोंका सेवन आरम्भ किया ॥ १ ॥
यथाकामं यथोत्साहं यथाकालं यथासुखम् ।
धर्माविरुद्धं राजेन्द्र यथार्हति स एव हि ॥ २ ॥
राजेन्द्र! उनकी जैसी कामना होती, जैसा उत्साह होता और जैसा समय होता, उसके अनुसार वे सुखपूर्वक धर्मानुकूल भोगोंका उपभोग करते थे। वास्तवमें उसके योग्य वे ही थे ॥ २ ॥
देवानतर्पयद् यज्ञैः श्राद्धैस्तद्वत् पितॄनपि ।
दीनाननुग्रहैरिष्टैः कामैश्च द्विजसत्तमान् ॥ ३ ॥
उन्होंने यज्ञोंद्वारा देवताओंको, श्राद्धोंसे पितरोंको, इच्छाके अनुसार अनुग्रह करके दीन-दुःखियोंको और मुँहमाँगी भोग्य वस्तुएँ देकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तृप्त किया ॥ ३ ॥
अतिथीनन्नपानैश्च विशश्च परिपालनैः ।
आनृशंस्येन शूद्रांश्च दस्यून् संनिग्रहेण च ॥ ४ ॥
धर्मेण च प्रजाः सर्वा यथावदनुरञ्जयन् ।
ययातिः पालयामास साक्षादिन्द्र इवापरः ॥ ५ ॥
वे अतिथियोंको अन्न और जल देकर, वैश्योंको उनके धन-वैभवकी रक्षा करके, शूद्रोंको दयाभावसे, लुटेरोंको कैद करके तथा सम्पूर्ण प्रजाको धर्मपूर्वक संरक्षणद्वारा प्रसन्न रखते थे। इस प्रकार साक्षात् दूसरे इन्द्रके समान राजा ययातिने समस्त प्रजाका पालन किया ॥ ४-५ ॥
स राजा सिंहविक्रान्तो युवा विषयगोचरः ।
अविरोधेन धर्मस्य चचार सुखमुत्तमम् ॥ ६ ॥
वे राजा सिंहके समान पराक्रमी और नवयुवक थे। सम्पूर्ण विषय उनके अधीन थे और वे धर्मका विरोध न करते हुए उत्तम सुखका उपभोग करते थे ॥ ६ ॥
स सम्प्राप्य शुभान् कामांस्तृप्तः खिन्नश्च पार्थिवः ।
कालं वर्षसहस्रान्तं सस्मार मनुजाधिपः ॥ ७ ॥
परिसंख्याय कालज्ञः कलाः काष्ठाश्च वीर्यवान् ।
यौवनं प्राप्य राजर्षिः सहस्रपरिवत्सरान् ॥ ८ ॥
विश्वाच्या सहितो रेमे व्यभ्राजन्नन्दने वने ।
अलकायां स कालं तु मेरुशृङ्गे तथोत्तरे ॥ ९ ॥
यदा स पश्यते कालं धर्मात्मा तं महीपतिः ।
पूर्णं मत्वा ततः कालं पूरुं पुत्रमुवाच ह ॥ १० ॥
वे नरेश शुभ भोगोंको प्राप्त करके पहले तो तृप्त एवं आनन्दित होते थे; परंतु जब यह बात ध्यानमें आती कि ये हजार वर्ष भी पूरे हो जायँगे, तब उन्हें बड़ा खेद होता था। कालतत्त्वको जाननेवाले पराक्रमी राजा ययाति एक-एक कला और काष्ठाकी गिनती करके एक हजार वर्षके समयकी अवधिका स्मरण रखते थे। राजर्षि ययाति हजार वर्षोंकी जवानी पाकर नन्दनवनमें विश्वाची अप्सराके साथ रमण करते और प्रकाशित होते थे। वे अलकापुरीमें तथा उत्तर दिशावर्ती मेरुशिखरपर भी इच्छानुसार विहार करते थे। धर्मात्मा नरेशने जब देखा कि समय अब पूरा हो गया, तब वे अपने पुत्र पुरुके पास आकर बोले— ॥ ७—१० ॥
यथाकामं यथोत्साहं यथाकालमरिंदम ।
सेविता विषयाः पुत्र यौवनेन मया तव ॥ ११ ॥
‘शत्रुदमन पुत्र! मैंने तुम्हारी जवानीके द्वारा अपनी रुचि, उत्साह और समयके अनुसार विषयोंका सेवन किया है ॥ ११ ॥
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ १२ ॥
‘परंतु विषयोंकी कामना उन विषयोंके उपभोगसे कभी शान्त नहीं होती; अपितु घीकी आहुति पड़नेसे अग्निकी भाँति वह अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है ॥ १२ ॥
यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।
एकस्यापि न पर्याप्तं तस्मात् तृष्णां परित्यजेत् ॥ १३ ॥
‘इस पृथ्वीपर जितने भी धान, जौ, स्वर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब एक मनुष्यके लिये भी पर्याप्त नहीं हैं। अतः तृष्णाका त्याग कर देना चाहिये ॥ १३ ॥
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः ।
योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ॥ १४ ॥
‘खोटी बुद्धिवाले लोगोंके लिये जिसका त्याग करना अत्यन्त कठिन है, जो मनुष्यके बूढ़े होनेपर भी स्वयं बूढ़ी नहीं होती तथा जो एक प्राणान्तक रोग है, उस तृष्णाको त्याग देनेवाले पुरुषको ही सुख मिलता है ॥ १४ ॥
पूर्णं वर्षसहस्रं मे विषयासक्तचेतसः ।
तथाप्यनुदिनं तृष्णा ममैतेष्वभिजायते ॥ १५ ॥
‘देखो, विषयभोगमें आसक्तचित्त हुए मेरे एक हजार वर्ष बीत गये, तो भी प्रतिदिन उन विषयोंके लिये ही तृष्णा पैदा होती है ॥ १५ ॥
तस्मादेनामहं त्यक्त्वा ब्रह्मण्याधाय मानसम् ।
निर्द्वन्द्वो निर्ममो भूत्वा चरिष्यामि मृगैः सह ॥ १६ ॥
‘अतः मैं इस तृष्णाको छोड़कर परब्रह्म परमात्मामें मन लगा द्वन्द्व और ममतासे रहित हो वनमें मृगोंके साथ विचरूँगा ॥ १६ ॥
पूरो प्रीतोऽस्मि भद्रं ते गृहाणेदं स्वयौवनम् ।
राज्यं चेदं गृहाण त्वं त्वं हि मे प्रियकृत् सुतः ॥ १७ ॥
‘पूरो! तुम्हारा भला हो, मैं प्रसन्न हूँ। अपनी यह जवानी ले लो। साथ ही यह राज्य भी अपने अधिकारमें कर लो; क्योंकि तुम मेरा प्रिय करनेवाले पुत्र हो’ ॥ १७ ॥
वैशम्पायन उवाच
प्रतिपेदे जरां राजा ययातिर्नाहुषस्तदा ।
यौवनं प्रतिपेदे च पूरुः स्वं पुनरात्मनः ॥ १८ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय नहुषनन्दन राजा ययातिने अपनी वृद्धावस्था वापस ले ली और पूरुने पुनः अपनी युवावस्था प्राप्त कर ली ॥ १८ ॥
अभिषेक्तुकामं नृपतिं पूरुं पुत्रं कनीयसम् ।
ब्राह्मणप्रमुखा वर्णा इदं वचनमब्रुवन् ॥ १९ ॥
जब ब्राह्मण आदि वर्णोंने देखा कि महाराज ययाति अपने छोटे पुत्र पूरुको राजाके पदपर अभिषिक्त करना चाहते हैं, तब उनके पास आकर इस प्रकार बोले— ॥ १९ ॥
कथं शुक्रस्य नप्तारं देवयान्याः सुतं प्रभो ।
ज्येष्ठं यदुमतिक्रम्य राज्यं पूरोः प्रयच्छसि ॥ २० ॥
‘प्रभो! शुक्राचार्यके नाती और देवयानीके ज्येष्ठ पुत्र यदुके होते हुए उन्हें लाँघकर आप पूरुको राज्य क्यों देते हैं? ॥ २० ॥
यदुर्ज्येष्ठस्तव सुतो जातस्तमनु तुर्वसुः ।
शर्मिष्ठायाः सुतो द्रुह्युस्ततोऽनुः पूरुरेव च ॥ २१ ॥
‘यदु आपके ज्येष्ठ पुत्र हैं। उनके बाद तुर्वसु उत्पन्न हुए हैं। तदनन्तर शर्मिष्ठाके पुत्र क्रमशः द्रुह्यु, अनु और पूरु हैं ॥ २१ ॥
कथं ज्येष्ठानतिक्रम्य कनीयान् राज्यमर्हति ।
एतत् संबोधयामस्त्वां धर्मं त्वं प्रतिपालय ॥ २२ ॥
‘ज्येष्ठ पुत्रोंका उल्लंघन करके छोटा पुत्र राज्यका अधिकारी कैसे हो सकता है? हम आपको इस बातका स्मरण दिला रहे हैं। आप धर्मका पालन कीजिये’ ॥ २२ ॥
ययातिरुवाच
ब्राह्मणप्रमुखा वर्णाः सर्वे शृण्वन्तु मे वचः ।
ज्येष्ठं प्रति यथा राज्यं न देयं मे कथंचन ॥ २३ ॥
ययातिने कहा— ब्राह्मण आदि सब वर्णके लोग मेरी बात सुनें, मुझे ज्येष्ठ पुत्रको किसी तरह राज्य नहीं देना है ॥ २३ ॥
मम ज्येष्ठेन यदुना नियोगो नानुपालितः ।
प्रतिकूलः पितुर्यश्च न स पुत्रः सतां मतः ॥ २४ ॥
मेरे ज्येष्ठ पुत्र यदुने मेरी आज्ञाका पालन नहीं किया है। जो पिताके प्रतिकूल हो, वह सत्पुरुषोंकी दृष्टिमें पुत्र नहीं माना गया है ॥ २४ ॥
मातापित्रोर्वचनकृद्धितः पथ्यश्च यः सुतः ।
स पुत्रः पुत्रवद् यश्च वर्तते पितृमातृषु ॥ २५ ॥
जो माता और पिताकी आज्ञा मानता है, उनका हित चाहता है, उनके अनुकूल चलता है तथा माता-पिताके प्रति पुत्रोचित बर्ताव करता है, वही वास्तवमें पुत्र है ॥ २५ ॥
(पुदिति नरकस्याख्या दुःखं हि नरकं विदुः ।
पुतस्त्राणात् ततः पुत्रमिहेच्छन्ति परत्र च ॥
आत्मनः सदृशः पुत्रः पितृदेवर्षिपूजने ।
यो बहूनां गुणकरः स पुत्रो ज्येष्ठ उच्यते ॥
ज्येष्ठांशभाक् स गुणकृदिह लोके परत्र च ।
श्रेयान् पुत्रो गुणोपेतः स पुत्रो नेतरो वृथा ॥
वदन्ति धर्मं धर्मज्ञाः पितॄणां पुत्रकारणात् ।)
‘पुत्’ यह नरकका नाम है। नरकको दुःखरूप ही मानते हैं पुत् नामक नरकसे त्राण (रक्षा) करनेके कारण ही लोग इहलोक और परलोकमें पुत्रकी इच्छा करते हैं। अपने अनुरूप पुत्र देवताओं, ऋषियों और पितरोंके पूजनका अधिकारी होता है। जो बहुत-से मनुष्योंके लिये गुणकारक (लाभदायक) हो, उसीको ज्येष्ठ पुत्र कहते हैं। वह गुणकारक पुत्र ही इहलोक और परलोकमें ज्येष्ठके अंशका भागी होता है। जो उत्तम गुणोंसे सम्पन्न है, वही पुत्र श्रेष्ठ माना गया है, दूसरा नहीं। गुणहीन पुत्र व्यर्थ कहा गया है। धर्मज्ञ पुरुष पुत्रके ही कारण पितरोंके धर्मका बखान करते हैं।
यदुनाहमवज्ञातस्तथा तुर्वसुनापि च ।
द्रुह्युना चानुना चैव मय्यवज्ञा कृता भृशम् ॥ २६ ॥
यदुने मेरी अवहेलना की है; तुर्वसु, द्रुह्यु तथा अनुने भी मेरा बड़ा तिरस्कार किया है ॥ २६ ॥
पूरुणा तु कृतं वाक्यं मानितं च विशेषतः ।
कनीयान् मम दायादो धृता येन जरा मम ॥ २७ ॥
पूरुने मेरी आज्ञाका पालन किया; मेरी बातको अधिक आदर दिया है, इसीने मेरा बुढ़ापा ले रखा था। अतः मेरा यह छोटा पुत्र ही वास्तवमें मेरे राज्य और धनको पानेका अधिकारी है ।। २७ ।।
मम कामः स च कृतः पूरुणा मित्ररूपिणा ।
शुक्रेण च वरो दत्तः काव्येनोशनसा स्वयम् ।। २८ ।।
पुत्रो यस्त्वानुवर्तेत स राजा पृथिवीपतिः ।
भवतोऽनुनयाम्येवं पूरु राज्येऽभिषिच्यताम् ।। २९ ।।
पूरुने मित्ररूप होकर मेरी कामनाएँ पूर्ण की हैं। स्वयं शुक्राचार्यने मुझे वर दिया है कि ‘जो पुत्र तुम्हारा अनुसरण करे, वही राजा एवं समस्त भूमण्डलका पालक हो’। अतः मैं आपलोगोंसे विनयपूर्ण आग्रह करता हूँ कि पूरुको ही राज्यपर अभिषिक्त करें ।। २८-२९ ।।
प्रकृतय ऊचुः
यः पुत्रो गुणसम्पन्नो मातापित्रोर्हितः सदा ।
सर्वमर्हति कल्याणं कनीयानपि सत्तमः ।। ३० ।।
प्रजावर्गके लोग बोले— जो पुत्र गुणवान् और सदा माता-पिताका हितैषी हो, वह छोटा होनेपर भी श्रेष्ठतम है। वही सम्पूर्ण कल्याणका भागी होनेयोग्य है ।। ३० ।।
अर्हः पूरुरिदं राज्यं यः सुतः प्रियकृत् तव ।
वरदानेन शुक्रस्य न शक्यं वक्तुमुत्तरम् ।। ३१ ।।
पूरु आपका प्रिय करनेवाले पुत्र हैं, अतः शुक्राचार्यके वरदानके अनुसार ये ही इस राज्यको पानेके अधिकारी हैं। इस निश्चयके विरुद्ध कुछ भी उत्तर नहीं दिया जा सकता ।। ३१ ।।
वैशम्पायन उवाच
पौरजानपदैस्तुष्टैरित्युक्तो नाहुषस्तदा ।
अभ्यषिञ्चत् ततः पूरुं राज्ये स्वे सुतमात्मनः ।। ३२ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— नगर और राज्यके लोगोंने संतुष्ट होकर जब इस प्रकार कहा, तब नहुषनन्दन ययातिने अपने पुत्र पूरुको ही अपने राज्यपर अभिषिक्त किया ।। ३२ ।।
दत्त्वा च पूरवे राज्यं वनवासाय दीक्षितः ।
पुरात् स निर्ययौ राजा ब्राह्मणैस्तापसैः सह ।। ३३ ।।
इस प्रकार पूरुको राज्य दे वनवासकी दीक्षा लेकर राजा ययाति तपस्वी ब्राह्मणोंके साथ नगरसे बाहर निकल गये ।। ३३ ।।
यदोस्तु यादवा जातास्तुर्वसोर्यवनाः स्मृताः ।
द्रुह्योः सुतास्तु वै भोजा अनोस्तु म्लेच्छजातयः ॥ ३४ ॥
यदुसे यादव क्षत्रिय उत्पन्न हुए, तुर्वसुकी संतान यवन कहलायी, द्रुह्युके पुत्र भोज नामसे प्रसिद्ध हुए और अनुसे म्लेच्छजातियाँ उत्पन्न हुईं ॥ ३४ ॥
पूरोस्तु पौरवो वंशो यत्र जातोऽसि पार्थिव ।
इदं वर्षसहस्राणि राज्यं कारयितुं वशी ॥ ३५ ॥
राजा जनमेजय! पूरुसे पौरव वंश चला; जिसमें तुम उत्पन्न हुए हो। तुम्हें इन्द्रिय-संयमपूर्वक एक हजार वर्षोंतक यह राज्य करना है ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्याने पूर्वयायातसमाप्तौ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानके प्रसंगमें पूर्वयायातसमाप्तिविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३८ १/२ श्लोक हैं)