महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंययातिरुवाच
ब्राह्मणप्रमुखा वर्णाः सर्वे शृण्वन्तु मे वचः ।
ज्येष्ठं प्रति यथा राज्यं न देयं मे कथंचन ॥ २३ ॥
ययातिने कहा— ब्राह्मण आदि सब वर्णके लोग मेरी बात सुनें, मुझे ज्येष्ठ पुत्रको किसी तरह राज्य नहीं देना है ॥ २३ ॥
मम ज्येष्ठेन यदुना नियोगो नानुपालितः ।
प्रतिकूलः पितुर्यश्च न स पुत्रः सतां मतः ॥ २४ ॥
मेरे ज्येष्ठ पुत्र यदुने मेरी आज्ञाका पालन नहीं किया है। जो पिताके प्रतिकूल हो, वह सत्पुरुषोंकी दृष्टिमें पुत्र नहीं माना गया है ॥ २४ ॥
मातापित्रोर्वचनकृद्धितः पथ्यश्च यः सुतः ।
स पुत्रः पुत्रवद् यश्च वर्तते पितृमातृषु ॥ २५ ॥
जो माता और पिताकी आज्ञा मानता है, उनका हित चाहता है, उनके अनुकूल चलता है तथा माता-पिताके प्रति पुत्रोचित बर्ताव करता है, वही वास्तवमें पुत्र है ॥ २५ ॥
(पुदिति नरकस्याख्या दुःखं हि नरकं विदुः ।
पुतस्त्राणात् ततः पुत्रमिहेच्छन्ति परत्र च ॥
आत्मनः सदृशः पुत्रः पितृदेवर्षिपूजने ।
यो बहूनां गुणकरः स पुत्रो ज्येष्ठ उच्यते ॥
ज्येष्ठांशभाक् स गुणकृदिह लोके परत्र च ।
श्रेयान् पुत्रो गुणोपेतः स पुत्रो नेतरो वृथा ॥
वदन्ति धर्मं धर्मज्ञाः पितॄणां पुत्रकारणात् ।)
‘पुत्’ यह नरकका नाम है। नरकको दुःखरूप ही मानते हैं पुत् नामक नरकसे त्राण (रक्षा) करनेके कारण ही लोग इहलोक और परलोकमें पुत्रकी इच्छा करते हैं। अपने अनुरूप पुत्र देवताओं, ऋषियों और पितरोंके पूजनका अधिकारी होता है। जो बहुत-से मनुष्योंके लिये गुणकारक (लाभदायक) हो, उसीको ज्येष्ठ पुत्र कहते हैं। वह गुणकारक पुत्र ही इहलोक और परलोकमें ज्येष्ठके अंशका भागी होता है। जो उत्तम गुणोंसे सम्पन्न है, वही पुत्र श्रेष्ठ माना गया है, दूसरा नहीं। गुणहीन पुत्र व्यर्थ कहा गया है। धर्मज्ञ पुरुष पुत्रके ही कारण पितरोंके धर्मका बखान करते हैं।
यदुनाहमवज्ञातस्तथा तुर्वसुनापि च ।
द्रुह्युना चानुना चैव मय्यवज्ञा कृता भृशम् ॥ २६ ॥
यदुने मेरी अवहेलना की है; तुर्वसु, द्रुह्यु तथा अनुने भी मेरा बड़ा तिरस्कार किया है ॥ २६ ॥
पूरुणा तु कृतं वाक्यं मानितं च विशेषतः ।
कनीयान् मम दायादो धृता येन जरा मम ॥ २७ ॥