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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

DevanagariSanskritpublished404 pages

( २५४ ) माधवनिदान ।

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( २५४ ) माधवनिदान ।
ऋक्षजिह्वकुष्ठके लक्षण ।
कर्कशं रक्तपर्यन्तमन्तः श्यावं सवेदनम् ।
यहक्षजिह्वासंस्थानमृक्षजिह्वं तदुच्यते ॥ १४ ॥
ऋक्षजिह्वकुष्ठ कठोर, अन्तविषे लाल होय, बीचमें काला होय, पीडा करे तथा
रीछके जीभके समान होय ॥
पुण्डरीककुष्ठके लक्षण ।
सश्वेतं रक्तपर्यन्तं पुण्डरीकदलोपमम् ।
सोत्सेधं च सरागं च पुंडरीकं प्रचक्षते ॥ १५ ॥
पुण्डरीककुष्ठ पुण्डरीक ( श्वेतकमल ) पत्रके समान सफेद होय और उसके अन्त-
भाग लाल होयँ, यत्किञ्चित् ऊंचा निकल आवे और मध्यमें थोडा लाल होय है ॥
सिध्मकुष्ठके लक्षण ।
श्वेतं ताम्रं च तनु यद्रजो घृष्टं विमुंचति ।
प्रायेणोरसि तत्सिध्ममलाबुकुसुमोपमम् ॥ १६ ॥
सिध्मकुष्ठ सफेद, लाल, पतली, खुजानेसे भूसीसी उडे । यह विशेषकरके छातीमें
होता है ( छातीमें कफ प्रधान होनेसे ) । प्रायः इसके कहनेसे छातीके अतिरिक्त और
स्थानमें भी होय हैं और घीयाके फूलके आकार होय है ॥
काकणकुष्ठके लक्षण ।
यत्काकणंतिकावर्णं सपाकं तीव्रवेदनम् ।
त्रिदोषलिङ्गं तत्कुष्ठं काकणं नैव सिध्यति ॥ १७ ॥
काकणकुष्ठ चिरमिटीके समान लाल अर्थात् बीचमें काला होय और आसपास
लाल होय अथवा बीचमें लाल होय और आसपास काला होय, किञ्चित् पका
तीव्र, पीडायुक्त, जिसमें तीनों दोषोंके लक्षण मिलते हों यह कुष्ठ अच्छा नहीं होय ॥
ग्यारह क्षुद्रकुष्ठोंके लक्षण ।
अस्वेदनं महावास्तु यन्मत्स्यशकलोपमम् ।
तदेककुष्ठं चर्माख्यं बहलं हस्तिचर्मवत् ॥ १८ ॥
चर्मकुष्ठ पसीनारहित, बहुत जगह व्यापनेवाला, मछलीकी त्वचासमान और
जिसका चर्म हाथीके चर्म समान मोटा और कठोर होय उसको चर्मकुष्ठ कहते हैं ॥
किटिभकुष्ठके लक्षण ।
श्यावं किणखरस्पर्शं परुषं किटिभं स्मृतम् ।

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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भाषाटीकासमेत । (२५५)
किटिभकुष्ठ नीलवर्ण, व्रणकी चटके समान कठोर स्पर्श मालूम होय और परुष
कहिये रूक्ष होय ॥
वैपादिककुष्ठके लक्षण ।
वैपादिकं पाणिपादस्फोटनं तीव्रवेदनम् ॥ १९ ॥
वैपादिक जिसमें हाथ और पैर फटजायँ और पीडा बहुत होय, इस विपा-
दिकाको बिवाई नहीं जानना, क्योंकि बिवाई केवल पैरमें ही होती है और बिवा-
ईको शास्त्रमें पाददारी कहते हैं और विपादिकामें हाथ पैरोंमें फुन्सी श्यामरंगकी
होती हैं और वे फुन्सी चुचाती हैं तथा खुजाती हैं, इसीसे पाददारी भिन्न और
विपादिका भिन्न है ॥
अलसकुष्ठके लक्षण ।
कण्डूमद्भिः सरागैश्च गण्डैरलसकं चितम् ।
खुजलीयुक्त और लाल फफोलोंसे व्याप्त जो कुष्ठ हो उसको अलसककुष्ठ
कहते हैं ॥
दद्रुमण्डलकुष्ठके लक्षण ।
सकण्डूरागपिटिकं दद्रुमण्डलमुद्गतम् ॥ २० ॥
दद्रुमण्डलकुष्ठ इसमें खुजली होय, लाल होय और फोडा होय और ये ऊंचे उठ
आवें मंडलके आकार गोल उत्पन्न होय, इसीसे इसको दद्रुमंडल कहते हैं ॥
चर्मदलकुष्ठके लक्षण ।
रक्तं सशूलं कंडूमत्स्फोटं यद्दलत्यपि ।
तच्चर्मदलमाख्यातमस्पर्शसहमुच्यते ॥ २१ ॥
चर्मदलकुष्ठ यह लाल हो, शूलयुक्त, खुजलीयुक्त, फफोलोंसे व्याप्त होकर
फूटजाय, इसमें हाथ लगानेसे सहा न जाय, इसमें त्वचा फटजाय ॥
पामाकुष्ठके लक्षण ।
सूक्ष्मा बह्वयः पीडिकाः स्राववत्यः
पामेत्युक्ताः कण्डुमत्यः सदाहाः ।
पामाकुष्ठ पिडिका छोटी और बहुत होयँ उनमेंसे स्राव होय तथा खुजली चले
और दाह होय इस कुष्ठको पामा (खाज) कहते हैं ॥
कच्छुकुष्ठके लक्षण ।
सैव स्फोटैस्तीव्रदाहैरुपैता
ज्ञेया पाण्योः कच्छुरुग्रा स्फिचोश्च ॥ २२ ॥
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