कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
About this granth
The Kautiliya Arthashastra (कौटिलीय अर्थशास्त्रम्) is the most detailed ancient Indian treatise on government, administration, economy, law and war. Tradition ascribes it to Kautilya (Chanakya, Vishnugupta), minister of Chandragupta Maurya. It is divided into fifteen books, covering the training of the king, the duties of departmental superintendents, civil and criminal justice, secret operations, the circle of neighbouring states, the six measures of foreign policy, calamities of the state, campaigns, battle, dealings with confederacies, the weaker king, the capture of forts, occult practices and the methods of the treatise itself.
This is No. 75 of the Vidyabhawan Sanskrit Granthamala, Chowkhamba Vidyabhawan, Varanasi, third edition 1984. It was edited with introduction, Hindi translation and glossary by Vachaspati Gairola of the Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad, and also includes the Chanakya Sutras. The book is dedicated to the memory of Mahamahopadhyaya T. Ganapati Shastri. Gairola's long introduction surveys early Indian assemblies such as the sabha and samiti and the growth of the state.
४०० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
(१) शृङ्गिणा दंष्ट्रिणा वा हिंस्यमानममोक्षयतः स्वामिनः पूर्वः साहसदण्डः । प्रतिक्रुष्टस्य द्विगुणः ।
(२) शृङ्गिदंष्ट्रिभ्यामन्योन्यं घातयतस्तच्च तावच्च दण्डः ।
(३) देवपशुभृषभमुक्षाणं गोकुमारीं वा वाहयतः पञ्चशतो दण्डः । प्रवासयत उत्तमः । लोमदोहवाहनप्रजननोपकारिणां क्षुद्रपशूनामादाने तच्च तावच्च दण्डः । प्रवासने च, अन्यत्र देवपितृकार्येभ्यः ।
(४) छिन्ननस्यं भग्नयुगं तिर्यक्प्रतिमुखागतं च प्रत्यासरद्वा चक्रयुक्तं यानपशुमनुष्यसम्बाधे वा हिंसायामदण्ड्यः । अन्यथा यथोक्तं मानुषप्राणि-हिंसायां दण्डमभ्यावहेत् । अमानुषप्राणिवधे प्राणिदानं च ।
(५) बाले यातरि यानस्थः स्वामी दण्ड्यः । अस्वामिनि यानस्थः प्राप्तव्यवहारो वा याता । बालाधिष्ठितमपुरुषं वा यानं राजा हरेत् ।
जाने पर होता है; इसीलिए उक्त वस्तुओं द्वारा हाथी के पूजन का विधान बताया गया है । किन्तु यदि कोई व्यक्ति महावत की लापरवाही के कारण मारा जाय तो महावत को उत्तम साहस दण्ड दिया जाय ।
( १ ) यदि कोई स्वामी अपने सींग, खुर या दाँत वाले पशुओं द्वारा किसी व्यक्ति को मारते हुए देखकर न छुड़ाये तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । उस व्यक्ति के चिल्लाने पर भी यदि न छुड़ाये तो स्वामी को दुगुना दण्ड दिया जाय ।
( २ ) यदि सींग-दाँत वाले जानवर आपस में लड़कर एक-दूसरे को मार दें तो मारने वाले जानवर का मालिक मरे हुए जानवर की कीमत और उतना ही दण्ड भरे ।
( ३ ) जो कोई व्यक्ति देव निमित्त किसी पशु को, साँड़ को, बैल को या बछड़ी को हल या गाड़ी में जोते तो उस पर पाँच-सौ पण दण्ड किया जाय । यदि इन्हें कोई घर से निकाले या दूर छोड़ आवे तो उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । किन्तु उन्हें यदि किसी देवकार्य या पितृकार्य के लिए दूर छोड़ना पड़े तो कोई दोष नहीं है ।
( ४ ) यदि बैल की नाथ टूट जाय या जुआ टूट जाय अथवा जुता हुआ बैल ही तिरछा हो जाय या सामने की ओर उल्टा हो जाय या गाड़ियों एवं पशुओं की भारी भीड़ हो, ऐसे समय यदि किसी पशु को चोट पहुँच जाय तो गाड़ीवान को दोषी न समझा जाय । ऐसी स्थिति न हो और मनुष्य या पशु को कोई चोट पहुँचे तो, चोट पहुँचाने वाले को पूर्वोक्त यथोचित दण्ड दिया जाय । यदि कोई छोटा पशु दबकर मर जाय तो वही पशु लिया जाय ।
( ५ ) यदि गाड़ीवान नाबालिग हो तो उसका मालिक इन सब दण्डों को भुगते । यदि मालिक उपस्थित न हो सवारी अथवा दूसरा बालिग गाड़ीवान दण्डों को भुगते । यदि गाड़ी में बालक के अतिरिक्त कोई न हो तो राजपुरुष उसे जब्त कर लें ।
प्र० ८८ : अ० १३ ] अतिचार का दण्ड ४०१
(१) कृत्याभिचाराभ्यां यत्परमापादयेत्, तदापादयितव्यः ।
(२) कामं भार्यायामनिच्छन्त्यां कन्यायां वा दारार्थिनां भर्तरि भार्यायां वा संवननकरणम् । अन्यथा हिंसाया मध्यमः साहसदण्डः ।
(३) मातापित्रोर्भगिनीं मातुलानीमाचार्याणीं स्नुषां दुहितरं भगिनीं वाधिचरतस्त्रिलिङ्गच्छेदनं वधश्च । सकामा तदेव लभेत । दासपरिचारकाहितकभुक्ता च ।
(४) ब्राह्मण्यामगुप्तायां क्षत्रियस्योत्तमः, सर्वस्वं वैश्यस्य । शूद्रः कटाग्निना दह्येत । सर्वत्र राजभार्यागमने कुम्भीपाकः ।
(५) श्वपाकीगमने कृतकबन्धाङ्कः परविषयं गच्छेत् । श्वपाकत्वं वा शूद्रः ।
(६) श्वपाकस्यार्यागमने वधः । स्त्रियाः कर्णनासाच्छेदनम् ।
(७) प्रव्रजितागमने चतुर्विंशतिपणो दण्डः । सकामा तदेव लभेत ।
( १ ) जो व्यक्ति किसी को कृत्रिम उपायों (कृत्या) या तान्त्रिक प्रयोगों (अभिचार) द्वारा तंग करे उसे गिरफ्तार कर लिया जाय ।
( २ ) पति को न चाहने वाली स्त्री पर उसका पति, कन्या को पत्नी बनाने की इच्छा रखने वाला पुरुष और अपने पति पर उसकी पत्नी, यदि वशीकरण आदि प्रयोग करें तो अपराध न माना जाय । इनके अतिरिक्त तान्त्रिक प्रयोग करने वालों को मध्यम साहस दण्ड दिया जाय ।
( ३ ) जो पुरुष अपनी मौसी, बूआ, मामी, गुरुपत्नी, पुत्रवधू, लड़की और बहिन के साथ व्यभिचार करे उसका लिंग और अंडकोश काटकर उसको प्राणदण्ड की सजा दी जाय । यदि मासी, बूआ आदि स्वयं ऐसा करायें तो उनके दोनों स्तन काटकर और उनका भग-छेदन कर उन्हें भी प्राणदण्ड की सजा दी जाय । दास और परिचारक यदि व्यभिचार करें तो उन्हें भी यही दण्ड दिया जाय ।
( ४ ) लोक-लाज से रहने वाली ब्राह्मणी के साथ यदि क्षत्रिय व्यभिचार करे तो उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय; यदि वैश्य करे तो उसकी सारी सम्पत्ति हड़प ली जाय, यदि शूद्र करे तो उसको तिनकों की आग में जला दिया जाय । राजा की स्त्री के साथ जो कोई भी व्यभिचार करे उसे तपे भाड़ में भून दिया जाय ।
( ५ ) चाण्डालिनी के साथ व्यभिचार करने वाले पुरुष के माथे पर योनि का निशान दाग कर उसे देश-निर्वासन का दण्ड दिया जाय, यदि ऐसा शूद्र करे तो उसे चाण्डाल बना दिया जाय ।
( ६ ) चांडाल यदि किसी आर्या स्त्री के साथ संभोग करे तो उसे प्राणदण्ड दिया जाय और उस पर स्त्री के नाक-कान काट दिये जाँय ।
( ७ ) संन्यासिनी के साथ संभोग करने वाले पर चौबीस पण दण्ड किया जाय,
२६ कौ०
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में अतिचारदण्ड नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त ।
| ४०२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ चौथा अधिकरण |
|---|
(१) रूपाजीवायाः प्रसह्योपभोगे द्वादशपणो दण्डः ।
(२) बहूनामेकामधिचरतां पृथक् पृथक् चतुर्विंशतिपणो दण्डः ।
(३) स्त्रियमयोनौ गच्छतः पूर्वः साहसद्ण्डः । पुरुषमधिमेहतश्च ।
(४) मैथने द्वादशपणः तिर्यग्योनिष्वनात्मनः ।
दैवतप्रतिमानां च गमने द्विगुणः स्मृतः ॥
(५) अदण्ड्यदण्डने राज्ञो दण्डस्त्रिंशद्गुणोऽम्भसि ।
वरुणाय प्रदातव्यो ब्राह्मणेभ्यस्ततः परम् ॥
(६) तेन तत्पूयते पापं राज्ञो दण्डापचारजम् ।
शास्ता हि वरुणो राज्ञां मिथ्या व्याचरतां नृषु ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे अतिचारदण्डो नाम त्रयोदशोऽध्यायः, आदित एकोननवतितमः ।
—: ० :—
यदि संन्यासिनी कामातुर होकर ऐसा कराये तो उस पर भी चौबीस पण दण्ड किया जाय ।
( १ ) वेश्या के साथ बालात् व्यभिचार करने पर बारह पण दण्ड दिया जाय ।
( २ ) यदि अनेक व्यक्ति एक स्त्री के साथ बारी-बारी से संभोग करें तो एक-एक को चौबीस-चौबीस पण दण्ड दिया जाय ।
( ३ ) यदि कोई पुरुष किसी स्त्री के गुदा या मुख में संभोग करें तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । लौंडेबाजी करने पर भी यही दण्ड किया जाय ।
( ४ ) गो आदि पशुओं से समागम करने वाले पातकी पर बारह पण और देव-प्रतिमाओं के साथ गमन करने वाले पर चौबीस पण दण्ड किया जाय ।
( ५ ) जो राजा अदण्डनीय व्यक्ति को दण्ड दे, प्रजा को चाहिए कि वह उस दण्ड का तीस गुना दण्ड राजा से वसूल करे । वह अर्थ दण्ड पहिले वरुण देवता के निमित्त पानी में छोड़ दिया जाय और बाद में ब्राह्मणों को बाँट दिया जाय ।
( ६ ) इस प्रकार अनुचित दण्ड के वसूलने से राजा को जो पाप लगा है वह छूट जाता है, क्योंकि मनुष्यों के ऊपर अनुचित व्यवहार करने वाले राजा पर वरुण-देव ही शासन करता है ।
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में अतिचारदण्ड नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
पाँचवाँ अधिकरण
पाँचवाँ अधिकरण
योगवृत्त
| प्रकरण ८९ | दाण्डकर्मिकम् |
|---|---|
| अध्याय १ |
(१) दुर्गराष्ट्रयोः कण्टकशोधनमुक्तम् । राजराज्ययोर्वक्ष्यामः ।
(२) राजानमवगृह्योपजीविनः शत्रुसाधारणा वा ये मुख्यास्तेषु गूढपुरुषप्रणिधिः कृत्यपक्षोपग्रहो वा सिद्धिः । यथोक्तं पुरस्तादुपजापोऽपसर्पो वा यथा च पारग्रामिके वक्ष्यामः ।
(३) राज्योपघातिनस्तु वल्लभाः संहता वा ये मुख्याः प्रकाशमशक्याः प्रतिषेद्धु दूष्याः, तेषु धर्मरुचिरुपांशुदण्डं प्रयुञ्जीत ।
(४) दूष्यमहामात्रभ्रातरं सत्कृतं सत्त्री प्रोत्साह्य राजानं दर्शयेत् । तं राजा दूष्यद्रव्योपभोगातिसर्गेण दूष्ये विक्रमयेत् । शस्त्रेण रसेन वा विक्रान्तं तत्रैव घातयेत् । भ्रातृघातकोऽयम् इति ।
राजद्रोही उच्चाधिकारियों के सम्बन्ध में दण्डव्यवस्था
(१) दुर्ग और राष्ट्र के अनिष्टकारियों (कंटकों) के दमन (शोधन) के उपाय चौथे अधिकरण में बताये जा चुके हैं। यही बात अब राजा और राज्य के सम्बन्ध में कही जायेगी।
(२) राजा से वेतन-भोजन पाकर भी उसको नीचा दिखाने वाले अथवा राजा के शत्रुओं से मिले हुए जो मन्त्री, पुरोहित आदि प्रधान राजकर्मचारी हों, उन पर सफलता प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि उनके पीछे राजा सुयोग्य गुप्त पुरुषों को तैनात कर दे; राज्यभर में जितने लोग राजा के शत्रुओं से खार खाये बैठे है उन्हें भी वह अपनी ओर मिला ले; ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति का ढंग पहिले बताया जा चुका है और उसी के सम्बन्ध में कुछ नई बातें आगे पारग्रामिक प्रकरण में बताई जायेंगी।
(३) धर्मप्राण राजा को चाहिए कि वह ऐसे मुख्य राज्यकर्मचारियों तथा संघ के मुखियों को चुपके से मरवा दे (उपांशुवध), जो राजा के खिलाफ बगावत फैलाते हों और जिन दुष्टों को खुले तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है।
(४) दूषित महामात्र (हस्त्यध्यक्ष) आदि के भाई को, जिसको कि दायभाग न मिला हो, संमानपूर्वक उभार कर सत्त्री नामक गुप्तचर उसे राजा के पास लाये। राजा उसको दूषणीय का निग्रह करने के लिए हथियार आदि देकर दोनों भाइयों के
| ४०६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ पाँचवां अधिकरण |
|---|
(१) तेन पारशवः परिचारिकापुत्रश्च व्याख्यातौ ।
(२) दूष्यं महामात्रं वा सत्रिप्रोत्साहितो भ्राता दायं याचेत । तं दूष्य-गृहप्रतिद्वारि रात्रावुपशयानमन्यत्र वा वसन्तं तीक्ष्णो हत्वा ब्रूयात्—हतोऽयं दायकामुकः इति । ततो हतपक्षं परिगृह्येतरं निगृह्णीयात् ।
(३) दूष्यसमीपस्थां वा सत्रिणो भ्रातरं दायं याचमानं घातेन परि-भर्त्सयेयुः । तं रात्राविति समानम् ।
(४) दूष्यमहामात्रयोर्वा यः पुत्रः पितुः पिता वा पुत्रस्य दारानधि-चरति भ्राता वा भ्रातुस्तयोः कापटिकमुखः कलहः पूर्वेण व्याख्यातः ।
(५) दूष्यमहामात्रपुत्रमात्मसम्भावितं वा सत्त्री—‘राजपुत्रस्त्वं शत्रु-भयादिह न्यस्तोऽसि ।’ इत्युपचरेत् । प्रतिपन्नं राजा रहसि पूजयेत्—‘प्राप्त-
बीच झगड़ा करवा दे । जब वह शस्त्र या विष आदि से अपने भाई की हत्या कर डाले तो इस पर भ्रातृ-घात का अपराध लगा कर राजा उसको भी मरवा दे ।
( १ ) यही व्यवहार पारशव ( महामात्र द्वारा नीच वर्ण की स्त्री से पैदा हुआ पुत्र ) और परिचारिका पुत्र ( दासी पुत्र ) के साथ किया जाय ।
( २ ) या तो सत्री द्वारा उभड़ा हुआ भाई दूषणीय महामात्र से अपने दायभाग की मांग करे फिर तीक्ष्ण नामक गुप्तचर दूषणीय के घर के दरवाजे के बाहर सोते या अन्यत्र निवास करते हुए रात में उसको मार कर जनता में यह प्रचार करे कि ‘यह अपना दायभाग माँगता था इसलिए इसके महामात्र भाई ने इसको मरवा डाला’ । इसके बाद राजा उस मृतक के बन्धु-बांधव, लड़के, मामा आदि को बुलवा कर उनको उकसायें कि यह महामात्र ही भाई का घातक है । ऐसी युक्ति से राजा उसको मरवा डाले ।
( ३ ) अथवा राजद्रोही महामात्र के आसपास रहने वाले लोग दायभाग माँगने वाले उसके भाई को ‘हम तुझे मार डालेंगे’ कहकर धमकायें । फिर पूर्वोक्त रीति से तीक्ष्ण द्वारा उसको मरवा कर यह प्रचारित करवा कर उसको भी मरवा दे कि ‘यह महामात्र भाई का हत्यारा है ।’
( ४ ) यदि दूष्य और महामात्र का पुत्र अपने पिता की स्त्रियों के साथ; पिता, पुत्रों की स्त्रियों के साथ और भाई, भाई की स्त्री के साथ व्यभिचार करे तो कापटिक गुप्तचर द्वारा उनका आपस में झगड़ा करा दिया जाय और तदनन्तर पूर्वोक्त विधि से उनका काम-तमाम करा दिया जाय ।
( ५ ) अपने आप को बहादुर तथा उदार समझने वाले महामात्र के पुत्र के पास जाकर सत्री कहें कि ‘तुम तो युवराज हो सकते हो; व्यर्थ ही शत्रु के भय से यहाँ पड़े हो’ । सत्री के वचनों पर विश्वास करके जब वह राजा के पास आवे तो
प्र० ८६ : अ० १ ] राजद्रोही अधिकारियों हेतु दण्ड-विधि ४०७
यौवराज्यकालं त्वां महामात्रभयान्नाभिषिञ्चामि' इति । तं सत्री महामात्र-वधे योजयेत् । विक्रान्तं तत्रैव घातयेत्—'पितृघातकोऽयम्' इति ।
(१) भिक्षुकी वा दूष्यभार्यां सांवननिकीभिरोषधिभिः संवास्य रसेना-तिसन्दध्यात् । इत्याप्यप्रयोगः ।
(२) दूष्यमहामात्रमटवीं परग्रामं वा हन्तुं कान्तरव्यवहिते वा देशे राष्ट्रपालामन्तपालं वा स्थापयितुं नागरस्थानं वा कुपितमवग्रहीतुं सार्था-तिवाह्यं प्रत्यन्ते वा सप्रत्यादेयमादातुं फल्गुबलं तीक्ष्णयुक्तं प्रेषयेत् । रात्रौ दिवा वा युद्धे प्रवृत्ते तीक्ष्णाः प्रतिरोधकव्यञ्जना वा हन्युः—'अभियोगे हतः' इति ।
(३) यात्राविहारगतो वा दूष्यमहामात्रान् दर्शनायाह्वयेत् । ते गूढ-शस्त्रैस्तीक्ष्णैः सह प्रविष्टा मध्यमकक्ष्यायामात्मविचयमन्तःप्रवेशार्थं दद्युः । ततो दौवारिकाभिगृहीतास्तीक्ष्णा 'दूष्यप्रयुक्ताः स्म' इति ब्रूयुः । ते तदभि-विख्याप्य दूष्यान् हन्युः । तीक्ष्णस्थाने चान्ये वध्याः ।
एकान्त में ले जाकर राजा उसका अच्छा सत्कार करे और तदनन्तर कहे 'तुम्हें युवराज पद मिलने का समय आ गया है । महामात्र के भय से मैं तुम्हारा अभिषेक नहीं कर पा रहा हूँ ।' फिर सत्री उस लड़के को उसके पिता महामात्र की हत्या करने के लिए तैयार करें । जब वह महामात्र की हत्या कर डाले तो पितृघातक का लांछन लगाकर राजा उसको भी मरवा दे ।
( १ ) अथवा भिक्षुकी नामक गुप्तचर स्त्री दूष्य आदि की स्त्री से कहे कि 'मैं वशीकरण की औषधि को जानती हूँ । तुम इस औषधि को अपने पति को खिलाना' । इस प्रकार औषधि की जगह विष देकर राजद्रोहियों को मारा जाय । इस कार्य को आप्य-प्रयोग कहते हैं ।
( २ ) राजा को चाहिए कि वह दूष्य महामात्र, जङ्गल के निरीक्षक और बगा-वती गाँव को मारने के लिए तीक्ष्ण पुरुषों के साथ थोड़ी-सी सेना इस उद्देश्य या बहाने से भेज दे कि अमुक-अमुक्त स्थान-नगरों में अन्तपाल या राष्ट्रपाल की स्थापना करनी है; या अमुक नगर की प्रजा विरुद्ध हो गई है उसको वश में करना है; अथवा सेना भेजने का यह बहाना बताये कि अमुक राज्य की सीमा पर दूसरे राज्य के कृषकों ने हमारी भूमि अपने कब्जे में कर ली है । तदनन्तर रात या दिन में लड़ाई लगाकर चोर या डाकुओं के वेष में तीक्ष्ण पुरुष अभीष्ट लोगों को मार डालें, और मारने के बाद यह प्रचारित करें लड़ाई में मारा गया है ।
( ३ ) तीर्थयात्रा या बिहार के लिए प्रस्तुत राजा दूष्य महामात्रों को देखने के लिए अपने पास बुलाये । शस्त्र छिपाये तीक्ष्ण पुरुष भी उन महामात्रों के साथ-साथ राजा के पास भीतर जाय । राजभवन की दूसरी ड्योढ़ी पर तलाशी लेकर द्वारपाल
४०४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवां अधिकरण
(१) बहिर्विहारगतो वा दूष्यानासन्नावासान् पूजयेत् । तेषां देवीव्य-
ञ्जना वा दुःस्त्री रात्रावावासेषु गृह्येतेति समानं पूर्वेण ।
(२) दूष्यमहामात्रं वा 'सूदो भक्षकारो वा ते शोभनः' इति स्तवेन
भक्ष्यभोज्यं याचेत । बहिर्वा क्वचिदध्वगतः पानीयं तदुभयं रसेन योज-
यित्वा प्रतिस्वादने तावेवोपयोजयेत् । तदभिविख्याप्य 'रसदाविति'
घातयेत् ।
(३) अभिचारशीलं वा सिद्धव्यञ्जनो गोधाकूर्मकर्कटकूटानां लक्षण्या-
नामन्यतमप्राशनेन मनोरथानवाप्स्यसीति ग्राहयेत् । प्रतिपन्नं कर्मणि रसेन
लोहमुसलैर्वा घातयेत् 'कर्मव्यापदा हत' इति ।
(४) चिकित्सकव्यञ्जनो वा दौरात्मिकमसाध्यं वा व्याधिं दूष्यस्य
स्थापयित्वा भैषज्याहारयोगेषु रसेनातिसंदध्यात् ।
उन शस्त्रधारी तीक्ष्ण पुरुषों को गिरफ्तार कर लें । वयान में वे कहें कि इन दूष्य लोगों ने राजा को मारने के लिए हमें हथियार लाने को कहा है । तदनन्तर नगर भर में यह बात फैला दी जाय कि वे महामात्र राजा को मारना चाहते थे । इस अपराध में उन्हें प्राण दण्ड दिया गया । उन गिरफ्तार तीक्ष्ण पुरुषों के स्थान पर दूसरों को ही मरवा दिया जाय ।
(१) अथवा प्रवास के लिए गया हुआ राजा अपने पास ठहरे हुए उन दूष्य लोगों का खूब आदर-सत्कार करे । फिर किसी व्यभिचारिणी स्त्री को महारानी के वेष में उनके पास भेज दे, फिर सिपाहियों से वहीं पर उन्हें गिरफ्तार करवा ले, और इसी अपराध से उनका वध करवा डाले ।
(२) अथवा राजा, दूष्य महामात्र से यह तारीफ करके 'तुम्हारे रसोइये और पकवान बनाने वाले बड़े ही निपुण हैं' कुछ खाने को माँगे । या इसी प्रकार का बहाना बनाकर पीने के लिए पानी माँगे; तदनन्तर उनमें विष मिला कर 'लीजिए, पहिले आपही ग्रहण कीजिए' ऐसा कहकर उनको मरवा दे; और तदनन्तर रसोइयों पर विष देने का अपराध लगाकर उन्हें प्राणदण्ड की सजा दी जाय ।
(३) अथवा सिद्ध पुरुष के वेष में गुप्तचर महामात्र से कहे 'अच्छी नस्ल के गोह, कछुआ, केंकड़ा और टूटे हुए सींग वाले हिरण आदि में से किसी एक को यदि अभिचारिक विधि से श्मशान में पकाकर खाया जाय तो सारे मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। जब महामात्र इसके लिए राजी हो जाय तो उसे जहर मिलाकर या लोहे के मूसल से कूटकर मार दिया जाय और यह प्रचार कराया जाय कि साधना में व्यति पात हो जाने के कारण उसकी मृत्यु हो गई ।
(४) अथवा चिकित्सक के वेष में गुप्तचर महामात्र के पास जाकर कहे कि
प्र० ८६ : अ० १ ] राजद्रोही अधिकारियों हेतु दण्ड-विधि ४०९
(१) सूदारालिकव्यञ्जना वा प्रणिहिता दूष्यं रसेनातिसन्दध्युः । इत्युपनिषत्प्रतिषेधः ।
(२) उभयदूष्यप्रतिषेधस्तु । यत्र दूष्यः प्रतिषेद्धव्यस्तत्र दूष्यमेव फल्गुबलतीक्ष्णयुक्तं प्रेषयेत्—‘गच्छामुष्मिन्दुर्गे राष्ट्रे वा सैन्यमुत्थापय हिरण्यं वा, वल्लभाद्वा हिरण्यमाहारय, वल्लभकन्यां वा प्रसह्यानय । दुर्गसेतुवणिक्पथशून्यनिवेशखनिद्रव्यहस्तिवनकर्मणामन्यतमं वा कारय, राष्ट्रपाल्यमन्तपाल्यं वा । यश्च त्वा प्रतिषेधयेन्न वा ते साहाय्यं दद्यात्, स बन्धव्यः स्यादिति । तथैवेतरेषां प्रेषयेत्—‘अमुष्याविनयः प्रतिषेद्धव्यः’ इति । तमेतेषु कलहस्थानेषु कर्मप्रतिघातेषु वा विवदमानं तीक्ष्णाः शस्त्रं पातयित्वा प्रच्छन्नं हन्युः । तेन दोषेणेतरे नियन्तव्याः ।
(३) पुराणां ग्रामाणां कुलानां वा दूष्याणां सीमाक्षेत्रखलवेश्ममर्यादासु द्रव्योपकरणसस्यवाहनहिंसासु प्रेक्षाकृत्योत्सवेषु वा समुत्पन्ने कलहे तीक्ष्णै-
उसको दुराचार से उत्पन्न या असाध्य रोग हो गया है और चिकित्सा करते समय औषधि या भोजन में विष मिलाकर उसको मार डाले ।
( १ ) अथवा रसोइया तथा हलवाई आदि पकी चीजों में विष मिलाकर उस महामात्र को मार डाले । यहाँ तक गुप्त रूप से दूष्यों के निग्रह के ढंग बताये गये ।
( २ ) दो दूष्य पुरुषों को किस प्रकार एक ही साथ विनष्ट किया जा सकता है, अब इसका उपाय बताया जाता है । जहाँ एक दूष्य को काबू में करना हो, वहाँ दूसरे दूष्य के साथ थोड़ी-सी सेना और कुछ तीक्ष्ण पुरुष भेजे । उस दूष्य से यह कहा जाय कि अमुक किले या प्रान्त में जाकर वह सेना के लिए योग्य व्यक्तियों की भर्ती करे । अथवा उसको आज्ञा दी जाय कि वह सुवर्ण या धन जमा करे या अमुक अध्यक्ष का धन चुराये, या अमुक अध्यक्ष की कन्या को बलात् चुरा ले, या अमुक स्थान पर मकान तथा दुर्ग बनाये, व्यापारियों के मार्ग को ठीक करे, या जंगल में मकान बनाये, अथवा अमुक खानों या लकड़ी-हाथी के जंगलों में ऐसा कार्य करे, या राष्ट्रपाल अथवा अंतपाल के कार्यों को करे । उसे यह भी ससभा दिया जाय कि यदि उसके इन कार्यों में कोई रुकावट डाले या सहयोग न दे तो उसे गिरफ्तार किया जाय । इसी प्रकार दूसरे दूष्यों को मौखिक सूचना भेजी जाय कि वे अमुक व्यक्ति की उद्दण्डता को रोकें । इस प्रकार उनमें परस्पर विवाद पैदा होने पर झगड़ैल दूष्य को तीक्ष्ण नामक गुप्तचर गुप्तरूप से मार डालें । तदनंतर राजा के पुरुष उस हत्या का दोष दूसरे दूष्य पर आरोपित करके उसे भी मरवा दें ।
( ३ ) राजद्रोही नगरों, गांवों, कुलों की सीमाओं, खेत, खलिहान, मकानों की सीमा, सुवर्ण, वस्त्र, अन्न तथा सवारी आदि का नाश कर देने से, तमाशों-उत्सवों में
४१० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पांचवां अधिकरण
४१० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पांचवां अधिकरण
रुत्पादिते वा तीक्ष्णाः शस्त्रं पातयित्वा ब्रूयुः—‘एवं क्रियन्ते येऽमुना कलहायन्ते’ इति। तेन दोषेणेतरे नियन्तव्याः।
(१) येषां वा दूष्याणां जातमूलाः कलहाः तेषां क्षेत्रखलवेश्मान्यादीपयित्वा बन्धुसम्बन्धिषु वाहनेषु वा तीक्ष्णाः शस्त्रं पातयित्वा तथैव ब्रूयुः—‘अमुना प्रयुक्ताः स्मः’ इति। तेन दोषेणेतरे नियन्तव्याः।
(२) दुर्गराष्ट्रदूष्यान् वा सत्रिणः परस्परस्यावेशनिकान् कारयेयुः। तत्र रसदा रसं दद्युः। तेन दोषेणेतरे नियन्तव्याः।
(३) भिक्षुकी वा दूष्यराष्ट्रमुख्यं दूष्यराष्ट्रमुख्यस्य भार्या स्नुषा दुहिता वा कामयत इत्युपजपेत्। प्रतिपन्नस्याभरणमादाय स्वामिने दर्शयेत्—असौ ते मुख्यो यौवनोत्सिक्तो भार्यां स्नुषां दुहितरं वाभिमन्यते इति। तयोः कलहो रात्रौ इति समानम्।
(४) दूष्यदण्डोपनतेषु तु युवराजः सेनापतिर्वा किञ्चिदुपकृत्यापक्रान्तो
झगड़ा होने पर, दूष्य नगरों में झगड़ा होने पर; तीक्ष्ण गुप्तचर ही दूष्यों को मार डाले और उस हत्या का आरोप दूसरे दूष्यों पर थोप दें। जो भी लड़ाई-झगड़ा करेंगे, उन्हें इसी प्रकार मरवा दिया जायेगा, ऐसा कहकर दूसरे दूष्यों को भी मरवा दिया जाय।
(१) तीक्ष्ण गुप्तचरों को चाहिए कि वे ‘आपस में पुरानी दुश्मनी को लेकर आने वाले दूष्य पुरुषों के खेत, खलिहान, मकान आदि को जलाकर, उनके बंधु-बांधवों, साथियों और पशुओं को हथियार से मार करके यह प्रचारित करें कि ‘अमुक व्यक्ति ने हमें ऐसा कार्य करने के लिए कहा था।’ उसके बाद वे बताये गए लोग गिरफ्तार कर शूली पर चढ़ाये जांय।
(२) सभी गुप्तचर आपसी दुश्मनी रखने वाले दूष्यों को परस्पर मिलाकर एक-दूसरे के घर में उन्हें निमंत्रण दिलवायें और तीक्ष्ण गुप्तचर भोजन में विष डालकर उनमें से एक को मार दें, दूसरे को हत्या के अपराध में गिरफ्तार कर फाँसी दी जाय।
(३) अथवा गुप्तचर भिक्षुकी राष्ट्र के किसी उच्चपदस्थ दूष्य से कहे कि ‘अमुक दूष्य की पत्नी, पुत्रवधू या लड़की उस पर अनुरक्त है।’ यदि वह विश्वास कर ले तो उससे कोई आभूषण आदि लेकर दूष्य को दिखलाये और ‘वह अमुक महाधिकारी जवानी में मतवाला हो कर तुम्हारी पत्नी, पुत्रवधू आदि को चाहता है।’ इस प्रकार उनका आपस में झगड़ा हो जाने के बाद रात में तीक्ष्ण या चर एक को मार डाले और फैला दे कि उसको अमुक दूष्य ने मारा है, इसी अपराध में उस दूसरे दूष्य को भी गिरफ्तार किया जाय।
(४) दण्डोपरान्त (सेना द्वारा या में किये गये) दूष्यों के साथ युवराज या
योगवृत्त नामक पञ्चम अधिकरण में दण्डकर्मिक नामक
प्र० ८९ : अ० १ ] राजद्रोही अधिकारियों हेतु दण्ड-विधि ४११
विक्रमेत । ततो राजा दूष्यदण्डोपनतानेव प्रेषयेत् । फल्गुबलतीक्ष्णयुक्ता-
निति समानाः सर्व एव योगाः ।
(१) तेषां च पुत्रेष्वनुक्षिपत्सु यो निर्विकारः स पितृदायं लभेत । एव-
मस्य पुत्रपौत्राननुवर्तते राज्यमपास्तपुरुषदोषमिति ।
(२) स्वपक्षे परपक्षे वा तूष्णीं दण्डं प्रयोजयेत् ।
आयत्यां च तदात्वे च क्षमावानविशङ्कितः ॥
इति योगवृत्ते पञ्चमाधिकरणे दाण्डकार्मिकं नाम प्रथमोऽध्यायः,
आदितो नवतितमः ।
—: ० :—
सेनापति पहिले कुछ उपकार करे और बाद में उनसे अलग होकर उनसे झगड़ा करता रहे । तदनंतर राजा कुछ सेना के साथ उन्हें दूसरे द्रोहियों को शांत करने के लिए भेजे । तदनंतर उनके साथ पूर्ववत् व्यवहार किया जाय ।
( १ ) वध किये गये द्रोही महामात्रों में वही पुत्र उत्तराधिकारी हो सकता है जो राजा की निन्दा न करे और जो राजा से पिता की हत्या का बदला लेने का ख्याल न करे । यदि कोई पुरुष राजा के विरुद्ध कोई संकल्प मन में न करे तो उसके पुत्र-पौत्र आदि बेखटके अपनी पैतृक संपति को भोग सकते हैं ।
( २ ) इस प्रकार क्षमाशील राजा को चाहिए कि वह वर्तमान और भविष्य में बिना किसी शंका के उचित रूप से अपने तथा दूसरे के पक्ष में इस गूढ़ दण्ड का प्रयोग करे ।
योगवृत्त नामक पञ्चम अधिकरण में दण्डकर्मिक नामक
पहला अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ९० | ## कोशाभिसंहरणम् |
|---|---|
| अध्याय २ |
(१) कोशमकोशः प्रत्युत्पन्नार्थकृच्छ्रः संगृह्णीयात्।
(२) जनपदं महान्तमल्पप्रमाणं वा देवमातृकं प्रभूतधान्यं धान्यस्यांशं तृतीयं चतुर्थं वा याचेत। यथासारं मध्यमवरं वा।
(३) दुर्गसेतुकर्मवणिक्पथशून्यनिवेशखनिद्रव्यहस्तिवनकर्मोपकारिणं प्रत्यन्तमल्पप्रमाणं वा न याचेत।
(४) धान्यपशुहिरण्यादिनिविशमानाय दद्यात्। चतुर्थमंशं धान्यानां बीजभक्तशुद्धं च हिरण्येन क्रीणीयात्।
(५) अरण्यजातं श्रोत्रियस्वं च परिहरेत्। तदप्यनुग्रहणे क्रीणीयात्।
कोष का अधिकाधिक संग्रह
(१) खजाने के कम हो जाने या अकस्मात् ही अर्थसङ्कट उपस्थित हो जाने पर राजा को कोष-सञ्चय करना चाहिए।
(२) बड़े या छोटे ऐसे जनपदों से अन्न का तीसरा या चौथा हिस्सा राज्यकर प्रजा की अनुमति से वसूल किया जाय, जहाँ का जीवन वृष्टि पर निर्भर हो और जहाँ काफी अनाज पैदा होता हो। इसी प्रकार मध्यम श्रेणी के या छोटे जनपदों से भी अन्न संग्रह किया जाय।
(३) किन्तु जो जनपद मिलों, मकानों व्यापारिक मार्गों, खाली मैदानों, खानों और लकड़ी-हाथी के जंगलों द्वारा राजा तथा प्रजा का उपकार करते हों, जो प्रदेश राज्य की सीमा पर हों और जिनके पास अन्न आदि बहुत थोड़ा हो, उनसे यह राज्य-कर न लिया जाय।
(४) नये बसने वाले किसानों को अन्न, बैल, पशु और धन सरकार की ओर से सहायतार्थ दिया जाय। इस तरह के किसानों से राजा उनकी उपज का चौथा हिस्सा खरीद ले और फिर बीज तथा उनके गुजारे लायक छोड़कर बाकी भी खरीद ले।
(५) जंगल में पैदा हुए तथा श्रोत्रिय द्वारा पैदा किये अन्न में राजा हिस्सा न ले। बीज और खाने योग्य अन्न को छोड़कर उसमें से भी राजा खरीद सकता है।
प्र० १० : अ० २ ] कोष का अधिकाधिक संग्रह ४१३
(१) तस्याकरणे वा समाहर्तृपुरुषा ग्रीष्मे कर्षकाणामुद्ध्वापं कारयेयुः । प्रमादावस्कन्नस्यात्ययं द्विगुणमुताहरन्तो बीजकाले बीजलेख्यं कुर्युः । निष्पन्ने हरितपक्वादानं वारयेयुः । अन्यत्र शाककटभङ्गमुष्टिभ्यां देवपितृ-पूजादानार्थं गवार्थं वा भिक्षुकग्रामभृतकार्थं च राशिमूलं परिहरेयुः ।
(२) स्वसस्यापहारिणः प्रतिपातोऽष्टगुणः । परसस्यापहारिणः पञ्चा-शद्गुणः सीतात्ययः स्ववर्गस्य बाह्यस्य तु वधः ।
(३) चतुर्थमंशं धान्यानां षष्ठं वन्यानां तूललाक्षाक्षौमवल्ककार्पास-रोमकौशेयकौषधगन्धपुष्पफलशाकपण्यानां काष्ठवेणुमांसवल्लूराणां च गृह्णीयुः । दन्ताजिनस्यार्धम् । अनिसृष्टं विक्रीणानस्य पूर्वः साहसदण्डः ।
(४) इति कर्षकेषु प्रणयः ।
(५) सुवर्णरजतवज्रमणिमुक्ताप्रवालाश्वहस्तिपण्याः पञ्चाशत्कराः ।
(१) यदि श्रोत्रिय खेती न करे तो समाहर्ता आदि अधिकारियों को चाहिए कि उस जमीन को वे गरमी की जुताई-बुआई के लिये दूसरे किसानों को दे दें । यदि किसान की लापरवाही से बीज नष्ट हो जाय तो समाहर्ता उस पर दुगुना जुर्माना करे और दूसरी फसल पर उस सारी कार्यवाही को रजिस्टर में दर्ज कर दे । फसल की तैयारी होने पर किसानों को कच्चा-पक्का अन्न लाने के लिए रोक दिया जाय । किन्तु वे देवपूजा, पितृपूजा या गाय के लिये मुट्ठी भर अनाज या मुट्ठी भर पुआल ला सकते हैं । किसानों को चाहिए कि वे भिखारी तथा गाँव के नाई, धोबी, कुम्हार आदि के लिए खलिहान में अन्न-राशि के नीचे का हिस्सा छोड़ दे ।
(२) सरकार को पैदावार की कमी दिखाने के लिए यदि किसान अपने ही खेत में चोरी करे तो उससे, चोरी किए हुए अन्न का, अठगुना दण्ड वसूल किया जाय । यदि कोई व्यक्ति अपने ही गाँव में खड़ी फसल की चोरी करे तो उसे चोरी के माल का पचास गुना दण्ड दिया जाय । यदि वह दूसरे गाँव का हो तो उसे प्राण दण्ड की सजा दी जाय ।
(३) धान्यों का चौथा हिस्सा और वन में होने वाले अन्न का तथा रूई, लाख, जूट, छाल, कपास, ऊन, रेशम, औषधि, गन्ध, पुष्प, फल, शाक, लकड़ी, बाँस, सूखा, मांस, आदि का छठा हिस्सा राजकर के रूप में लिया जाय । हाथी दाँत और गाय आदि के चमड़े का आधा हिस्सा राजकर में लिया जाय । जो व्यक्ति इन वस्तुओं को छिपाकर बेचे, उन्हें प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।
(४) यहाँ तक किसानों के प्रति राजा की ओर से कर की याचना के सम्बन्ध में विधान किया गया ।
(५) राजकर : सोना, चाँदी, हीरा, मणि, मोती, मूंगा, घोड़े और हाथी
४१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पांचवां अधिकरण
सूत्रवस्त्रताम्रवृत्तकंसगन्धभैषज्यशीधुपण्याश्चत्वारिंशत्कराः । धान्यरसलोहपण्याः शकटव्यवहारिणश्च त्रिंशत्कराः । काचव्यवहारिणो महाकारवश्च विंशतिकराः । क्षुद्रकारवो बन्धकीपोषकाश्च दशकराः । काष्ठवेणुपाषाणमृद्भाण्डपक्वान्नहरितपण्याः पञ्चकराः ।
(१) कुशीलवा रूपाजीवाश्च वेतनार्धं दद्युः ।
(२) हिरण्यकरभकर्मण्यानाहारयेयुः । न चैषां कञ्चिदपराधं परिहरेयुः ते ह्यपरगृहीतमभानीय विक्रीणीरन् ।
(३) इति व्यवहारिषु प्रणयः ।
(४) कुक्कुटसूकरमर्धं दद्यात् । क्षुद्रपशवः षड्भागम् । गोमहिषाश्वतरखरोष्ट्राश्च दशभागम् । बन्धकीपोषका राजप्रेष्याभिः परमरूपयौवनाभिः कोशं संहरेयुः ।
(५) इति योनिपोषकेषु प्रणयः ।
आदि व्यापारिक वस्तुओं पर उनकी लागत का पचासवाँ हिस्सा टैक्स लिया जाय । इसी प्रकार सूत, कपड़ा; ताँबा, पीतल, काँसा, गन्ध, जड़ी-बूटी और शराब पर चालीसवाँ हिस्सा, गेहूं, धान आदि अन्न, तेल, घी, लोहा और बैलगाड़ियों पर तीसवाँ हिस्सा, काँच के व्यापारी तथा बड़े-बड़े कारीगरों पर बीसवाँ हिस्सा छोटे-छोटे कारीगरों तथा कुलटा स्त्रियों को घर में रखने वालों से दसवाँ हिस्सा, और लकड़ी, बांस, पत्थर, मिट्टी के वर्तन, पकवान तथा हरे शाक आदि पर पांचवाँ हिस्सा सरकारी टैक्स लिया जाय ।
(१) नट, नर्तक, गायक तथा वेश्यायें अपनी कमाई का आधा हिस्सा राजकर दें ।
(२) व्यापारियों से प्रति पुरुष के हिसाब से कुछ नकदी कर रूप में ली जाय और इस भय से व्यापार छोड़ देने पर भी उसका कर वसूला जाय । क्योंकि ऐसे लोगों से यह भी सम्भव हो सकता है कि वे अपनी वस्तु को दूसरे की कहकर बेचें, जिससे कि टैक्स से बच जाँय ।
(३) यहाँ तक व्यापारियों से राज्यकर लेने के सम्बन्ध में कहा गया ।
(४) मुर्गे और सूअर पालने वाले, उनकी आमद का आधा हिस्सा टैक्स दें । इसी प्रकार भेड़-बकरी पालने वाले छठा हिस्सा, गाय, भैंसे, खच्चर, गधा तथा ऊँट पालने वाले दसवाँ हिस्सा राजकर दें । वेश्याओं के जमादारों को चाहिए कि वे राज-अनुमत रूपवती वेश्याओं द्वारा राजकोष के लिए धन जमा करें ।
(५) यहाँ तक जानवर पालने वालों से राज्यकर लेने के सम्बन्ध में कहाँ गया ।
प्र० ९० : अ० २ ] कोष का अधिकाधिक संग्रह ४१५
(१) सकृदेव न द्विः प्रयोज्यः । तस्याकरणे वा समाहर्ता कार्यमपदिश्य पौरजानपदान् भिक्षेत । योगपुरुषाश्चात्र पूर्वमतिमात्रं दद्युः । एतेन प्रदेशेन राजा पौरजानपदान् भिक्षेत । कापटिकाश्चैनानल्पं प्रयच्छतः कुत्सयेयुः । सारतो वा हिरण्यमाढ्यान् याचेत ।
(२) यथोपकारं वा स्ववशा वा यदुपहरेयुः । स्थानच्छत्रवेष्टनविभूषाश्चैषां हिरण्येन प्रयच्छेत् । पाषण्डसंघद्रव्यमश्रोत्रियभोग्यं देवद्रव्यं वा कृत्यकराः प्रेतस्य दग्धगृहस्य वा हस्ते न्यस्तमित्युपहरेयुः ।
(३) देवताध्यक्षो दुर्गराष्ट्रदेवतानां यथास्वमेकस्थं कोशं कुर्यात् । तथैव चाहरेत् । दैवतचैत्यं, सिद्धपुण्यस्थानभौमवादिकं वा रात्रावुत्थाप्य यात्रासमाजाभ्यामाजीवेत् । चैत्योपवनवृक्षेण वा देवताभिगमनमनातर्वपुष्पफलयुक्तेन ख्यापयेत् । मनुष्यकरं वा वृक्षे रक्षोभयं रूपयित्वा सिद्धव्यञ्जनाः
( १ ) राज्यकर एक बार ही लेना चाहिए, दुबारा नहीं । यदि एक वार कर लेने में खजाने को न बढ़ाया जा सके तो समाहर्त्ता को चाहिए कि किसी कार्य का बहाना बनाकर वह नगरवासियों और प्रदेशवासियों से धन की याचना करे । इस योजना में मिले हुए लोग जनता को दिखाने के लिए ज्यादा-से-ज्यादा धन दें । इसी बहाने से राजा अपनी प्रजा से धन की याचना करे । यदि कोई थोड़ा धन दे तो राजा के गुप्तचर उसकी निंदा समाज में फैलायें । धनी व्यक्तियों से उनकी हैसियत के अनुसार धन लिया जाय ।
( २ ) राज्य की ओर से उपकृत लोगों पर उपकार के अनुपात से या जितना धन मिले हुए लोग दें, उतनी ही रकम देने को धनवानों से आग्रह किया जाय । और इस प्रकार उन सहायता देने वाले धनी पुरुषों को अधिकार, उच्चासन, छत्र, वेष्टन ( पगड़ी ) तथा आभूषण आदि देकर संमानित किया जाय । किसी पाखंडी या पाखंडी समूह की सम्पत्ति को तथा उस मन्दिर की सम्पति को जिसका कोई भी अंश श्रोत्रिय के पास नहीं जाता है तथा मरे हुए एवं घर जले हुए की सम्पत्ति को, उनका कर्म कराने के बहाने, राजकोष में जमा कर लिया जाय ।
( ३ ) देवताध्यक्ष ( देव मन्दिरों का अधिकारी ) को चाहिए कि वह दुर्ग तथा राष्ट्र के देवमन्दिरों की आमदनी को एक स्थान पर जमा करके रखे । उसको फिर राजा को दे दे । किसी प्रसिद्ध पवित्र स्थान में 'भूमि को फाड़ कर देवता प्रकट हुआ है' ऐसी अफवाह फैलाकर रात में वहाँ देवता की एक वेदी बनवा दी जाय और मेला लगवा कर यात्रियों तथा दर्शकों से वहाँ खूब भेंट चढ़वाई जाय, उसको राजा ले ले । बिना मौसम किसी मन्दिर या उपवन में किसी पेड़ पर फल या फूल पैदा कराके यह प्रसिद्धि करवा दी जाय कि वह तो देव-महिमा है । अथवा सिद्धों के वेष में घूमने
४१६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवाँ अधिकरण
पौरजानपदानां हिरण्येन प्रतिकुर्य्युः । सुरुङ्गायुक्ते वा कूपे नागमनियतशि-
रस्कं हिरण्योपहारेण दर्शयेद् नागप्रतिमायामन्तश्छिद्रायाम् । चैत्यच्छिद्रे
वल्मीकच्छिद्रे वा सर्पदर्शन आहारेण प्रतिबद्धसंज्ञं कृत्वा श्रद्दधानानादर्शयेत् ।
अश्रद्दधानानामाचमनप्रोक्षणेषु रसमवपाय्य देवताभिशपं ब्रूयात् । अभि-
त्यक्तं वा दंशयित्वा योगदर्शनप्रतीकारेण वा कोषाभिसंहरणं कुर्यात् ।(१) वैदेहकव्यञ्जनो वा प्रभूतपण्यान्तेवासी व्यवहरेत् । स यदा पण्य-
मूल्ये निक्षेपप्रयोगैरुपचितः स्यात् तदैनं रात्रौ मोषयेत् । एतेन रूपदर्शकः
सुवर्णकारश्च व्याख्यातौ ।(२) वैदेहकव्यञ्जनो वा प्रख्यातव्यवहारः प्रवहणनिमित्तं याचित-
कमवक्रीतकं वा रूप्यसुवर्णभाण्डमनेकं गृह्णीयात् । समाजे वा सर्वपण्य-
वाले गुप्तचर रात में किसी पेड़ पर बैठ कर 'मुझे प्रतिदिन एक-एक मनुष्य चाहिए। नहीं तो सबको एक ही साथ खा जाऊँगी' ऐसा राक्षस का वानिक बनाया जाय, उसके प्रतिकार के लिए जनता से धन-संग्रह किया जाय और वह धन राजकोष में रखा जाय। अथवा किसी सुरङ्ग वाले कुँएँ में तीन या पाँच शिर वाले बनावटी नाग को दिखाया जाय और उसको दिखाने के बदले में दर्शकों से धन लिया जाय, फिर उस धन को राजकोष में जमा कर दिया जाय। या किसी मन्दिर तथा वल्मीक में साँप को अचानक दिखा कर उसे मन्त्र या औषधि से वश में कर लिया जाय, और तब यह कहते हुए श्रद्धालु भक्तों को उसके दर्शन कराये जाँय कि 'देखो, देवता की कैसी महिमा है?'। जो व्यक्ति इस पर विश्वास न करें उन्हें चरणामृत के साथ इतना विष दिया जाय, जिससे वे बेहोश हो जायें, और फिर यह प्रसिद्धि की जाय कि 'यह नाग देवता का शाप है।' जो व्यक्ति देवता की निन्दा करे उन्हें साँप से कटवा दिया जाय और उसको भी देवता का ही शाप कहा जाय। फिर बाद में औपनिषदिक प्रकरण में निर्दिष्ट रीति से चिकित्सा कर उसके विष को दूर कर दिया जाय। इस प्रकार धन संचय करके राजा अपने खजाने को बढ़ाये।
(१) अथवा व्यापारी के वेष में वैदेहक नामक गुप्तचर प्रचुर वस्तुओं और अनेक सहायकों को लेकर व्यापार करना आरम्भ कर दें। लोगों के बीच जब उसकी साख बन जाय और अमानत के रूप में तथा ब्याज आदि के लिए लोग उसके पास जब काफी पूंजी जमा कर दें, तब अचानक ही वह चोरी हो जाने का ढिंढोरा कर सारा माल राजा के लिए हड़प ले।
(२) इसी प्रकार सरकार द्वारा नियुक्त सिक्कों का पारखी और सुनार भी छल-कपट से राजकोष के लिए धन एकत्र करें। अथवा व्यापारी के वेष में राजा के गुप्तचर जब लेन-देन में खूब प्रसिद्ध हो जायें तो एक दिन वे सहभोज के बहाने पास-
प्र० ९० : अ० २ ] कोष का अधिकाधिक संग्रह ४१७
सन्दोहेन प्रभूतं हिरण्यसुवर्णमृणं गृह्णीयात् । प्रतिभाण्डमूल्यं च । तदुभयं रात्रौ मोषयेत् ।
(१) साध्वीव्यञ्जनाभिः स्त्रीभिर्दूष्यानुन्मादयित्वा तासामेव वेश्म-स्वभिगृह्य सर्वस्वान्याहरेयुः ।
(२) दूष्यकुल्यानां वा विवादे प्रत्युत्पन्ने रसदाः प्रणिहिता रसं दद्युः । तेन दोषणेतरे पर्यादातव्याः ।
(३) दूष्यमभित्यक्तो वा श्रद्धेयापदेशं पण्यं हिरण्यनिक्षेपमृणप्रयोगं दायं वा याचेत । दासशब्देन वा दूष्यमालम्बेत । भार्यामस्य स्नुषां दुहितरं वा दासीशब्देन वा भार्याशब्देन । तं दूष्यगृहप्रतिद्वारि रात्रावुपशयानमन्यत्र वा वसन्तं तीक्ष्णो हत्वा ब्रूयात्—'हतोऽयमित्थं कामुक' इति । तेन दोषेणेतरे पर्यादातव्याः ।
(४) सिद्धव्यञ्जनो वा दूष्यं जम्भकविद्याभिः प्रलोभयित्वा ब्रूयात्—'अक्षयं हिरण्यं राजद्वारिकं स्त्रीहृदयमरिव्याधिकरमायुष्यं पुत्रीयं वा कर्म
पड़ोस के लोगों से माँगकर या भाड़े पर सोने-चाँदी आदि के बर्तन ले आवें या अपना माल रखकर उसके बदले में अनेक व्यक्तियों की उपस्थिति में किसी से रुपया या सोना ऋण ले आवें, और दूसरे दिन जिनसे अपनी वस्तुएँ बेचनी है उनसे प्रतिवस्तु का दाम ले आवें । इन दोनों प्रकार के लाये हुए मालों की वह रात्रि में चोरी करवा दे; इस प्रकार राजकोष को भरने का यत्न करे ।
( १ ) कुलीन वेष में रहने वाली गुप्तचर स्त्रियों के द्वारा दूष्य पुरुषों को उत्साही बनाकर उन स्त्रियों के घरों में ही उनको गिरफ्तार किया जाय और तब उनका सर्वस्व छीन लिया जाय ।
( २ ) दूष्य पुरुषों के आपसी झगड़े के समय गुप्तचरों को चाहिए कि उनके पास रहते हुए किसी एक को वे विष देकर मार दें । दूसरे दूष्य का धन अपराध में अपहरण किया जाय ।
( ३ ) कोई पदच्युत या जातिच्युत व्यक्ति माल, सोने का अमानत, ऋण अथवा दायभाग आदि को दूष्य से इस प्रकार माँगे जिससे कि लोगों को विश्वास हो जाय कि इनका आपस में घनिष्ठ संबन्ध है । अथवा वह दूष्य को दास कह कर तथा उसकी स्त्री, पुत्री आदि को दासी या पत्नी आदि कह कर गाली दे । उस रात वह उसके ही द्वार पर या अन्यत्र कहीं सो जाय; फिर तीक्ष्ण पुरुष जाकर उसको मार दें और यह अफवाह फैला दें कि 'यह कामी पुरुष दूष्य के साथ इस प्रकार झगड़ा करते हुए मारा गया ।' इसी अपराध में राजा, दूष्य का सर्वस्व हर ले ।
( ४ ) अथवा सिद्ध के वेष में गुप्तचर दूष्य को ऐसा कह कर प्रलोभन दे कि
२७ कौ०
४१८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवाँ अधिकरण
जानामि' इति । प्रतिपन्नं चैत्यस्थाने रात्रौ प्रभूतसुरामांसगन्धमुपहारं कारयेत् । एकरूपं चात्र हिरण्यं पूर्वनिखातम् । प्रेताङ्गं प्रेतशिशुर्वा यत्र निहितः स्यात् । ततो हिरण्यस्य दर्शयेदत्यल्पमिति च ब्रूयात्—'प्रभूतहिरण्यहेतोः पुनरुपहारः कर्तव्यः' इति । स्वयमेवैतेन हिरण्येन श्वोभूते प्रभूतमौपहारिकं क्रीणीहि' इति । तेन हिरण्येनौपहारिकक्रये गृह्येत् ।
(१) मातृव्यञ्जनया वा 'पुत्रो मे त्वया हतः' इत्यवरूपितः स्यात् । संसिद्धमेवास्य रात्रियागे वनयागे वनक्रीडायां वा प्रवृत्तायां तीक्ष्णा विशस्याभित्यक्तमतिनयेयुः ।
(२) दूष्यस्य वा भृतकव्यञ्जनो वेतनहिरण्ये कूटरूपं प्रक्षिप्य प्ररूपयेत् ।
(३) कर्मकारव्यञ्जनो वा गृहे कर्म कुर्वाणः स्तेनकूटरूपकारकोपकरणमपनिदध्यात् । चिकित्सकव्यञ्जनो वा गरमगरापदेशेन ।
'मैं अपार हिरण्य के खजाने को देखना, राजा को वश में करना, स्त्री को वश में करना, दुश्मन को बीमार करना, आयु को बढ़ाना और सन्तान को पैदा करना आदि चमत्कार जानता हूँ।' जब दूष्य राजी हो जाय तो रात में किसी देवस्थान के पास ले जाकर गुप्तचर उसको खूब मदिरा, मांस, गन्ध आदि देवता को चढ़ाने के लिए कहे; तदनन्तर जहाँ मुर्दे का कोई अङ्ग या मरा हुआ बच्चा गड़ा हो वहाँ से, पहिले गाड़ा हुआ, पुराना सिक्का निकाल कर उससे कहे कि 'यह बहुत कम है, क्योंकि तुमने कम भेंट चढ़ाई थी । यदि तुम अधिक भेंट चढ़ाना चाहते हो तो यह सोना लो और कल अधिक सामग्री लाकर देवता को अधिक से अधिक भेंट चढ़ाना । जब दूसरे दिन दूष्य उस सुवर्ण का सामान खरीदने लगे तभी उसको गिरफ्तार करके उसका सर्वस्व अपहरण किया जाय ।
( १ ) अथवा माता-पिता के भेष में कोई गुप्तचर स्त्री दूष्य पर यह दोषारोपण करे कि 'तूने मेरा लड़का मारा है' । जब दूष्य पुरुष रात्रिहवन, वनयज्ञ और वनक्रीड़ा को प्रस्थान करे तो तीक्ष्ण लोग किसी नियुक्त किए पुरुष को मारकर दूष्य के रात्रि-हवन आदि के पास उसको गाड़ दें; और इसी अपराध में दूष्य को गिरफ्तार कर उसका सर्वस्व अपहरण किया जाय ।
( २ ) अथवा दूष्य के पास नौकर के रूप में रहने वाला कोई खुफिया वेतन में जाली सिक्का मिलाकर उसकी सूचना राजा को कर दे ।
( ३ ) अथवा चारक के वेष में दूष्य के घर कार्य करता हुआ कोई खुफिया छिपे तौर पर जाली सिक्का बनाने के सब साधन वहाँ रख दे । अथवा कोई खुफिया वैद्य दूष्य को औषधि की जगह विष दे दे ।
प्र० ९० : अ० २ ] कोष का अधिकाधिक संग्रह ४१९
(१) प्रत्यासन्नो वा दूष्यस्य सत्त्री प्रणिहितमभिषेकभाण्डममित्रशासनं च । कापटिकमुखेन आचक्षीत, कारणं च ब्रूयात् ।
(२) एवं दूष्येष्वधार्मिकेषु च वर्तेत । नेतरेषु ।
(३) पक्वं पक्वमिवारामात् फलं राज्यादवाप्नुयात् ।
आत्मच्छेदभयादामं वर्जयेत् कोपकारकम् ॥इति योगवृत्ते पञ्चमेऽधिकरणे कोषाभिसंहरणं नाम द्वितीयोऽध्यायः,
आदित एकनवतितमः ।
—: ० :—
( १ ) अथवा दूष्य के पास रहता हुआ सत्त्री नामक गुप्तचर दूष्य के घर में रखे राज्याभिषेक तथा शत्रु के लेख की सूचना कापटिक गुप्तचर के द्वारा राजा तक पहुँचा दे । उसका कारण यह सिद्ध किया जाय कि वह दूष्य राजा को मारकर उसकी जगह अपना अभिषेक कराना चाहता है । इसी अपराध में उसका सब कुछ ले लिया जाय ।
( २ ) अपने कोष की वृद्धि के लिए राजा इस प्रकार के उपायों का प्रयोग दूष्यों और अधार्मिक व्यक्ति पर ही करे, दूसरों पर नहीं ।
( ३ ) राजा को चाहिए कि वह दुष्ट पुरुषों का धन उसी प्रकार ले ले जिस प्रकार वाटिका से पके हुए फल को लिया जाता है; किन्तु धर्मात्मा पुरुषों का धन वह उसी प्रकार छोड़ दे जैसे कच्चे फल को छोड़ दिया जाता है । कच्चे फल के समान धर्मात्मा पुरुषों से वसूला गया धन प्रजा के कोप का कारण बन जाता है ।
योगवृत्त नामक पंचम अधिकरण में कोषाभिसंहरण नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।
—: ० :—