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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 500 of 918

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Page 500

४१६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवाँ अधिकरण

पौरजानपदानां हिरण्येन प्रतिकुर्य्युः । सुरुङ्गायुक्ते वा कूपे नागमनियतशि-
रस्कं हिरण्योपहारेण दर्शयेद् नागप्रतिमायामन्तश्छिद्रायाम् । चैत्यच्छिद्रे
वल्मीकच्छिद्रे वा सर्पदर्शन आहारेण प्रतिबद्धसंज्ञं कृत्वा श्रद्दधानानादर्शयेत् ।
अश्रद्दधानानामाचमनप्रोक्षणेषु रसमवपाय्य देवताभिशपं ब्रूयात् । अभि-
त्यक्तं वा दंशयित्वा योगदर्शनप्रतीकारेण वा कोषाभिसंहरणं कुर्यात् ।

(१) वैदेहकव्यञ्जनो वा प्रभूतपण्यान्तेवासी व्यवहरेत् । स यदा पण्य-
मूल्ये निक्षेपप्रयोगैरुपचितः स्यात् तदैनं रात्रौ मोषयेत् । एतेन रूपदर्शकः
सुवर्णकारश्च व्याख्यातौ ।

(२) वैदेहकव्यञ्जनो वा प्रख्यातव्यवहारः प्रवहणनिमित्तं याचित-
कमवक्रीतकं वा रूप्यसुवर्णभाण्डमनेकं गृह्णीयात् । समाजे वा सर्वपण्य-


वाले गुप्तचर रात में किसी पेड़ पर बैठ कर 'मुझे प्रतिदिन एक-एक मनुष्य चाहिए। नहीं तो सबको एक ही साथ खा जाऊँगी' ऐसा राक्षस का वानिक बनाया जाय, उसके प्रतिकार के लिए जनता से धन-संग्रह किया जाय और वह धन राजकोष में रखा जाय। अथवा किसी सुरङ्ग वाले कुँएँ में तीन या पाँच शिर वाले बनावटी नाग को दिखाया जाय और उसको दिखाने के बदले में दर्शकों से धन लिया जाय, फिर उस धन को राजकोष में जमा कर दिया जाय। या किसी मन्दिर तथा वल्मीक में साँप को अचानक दिखा कर उसे मन्त्र या औषधि से वश में कर लिया जाय, और तब यह कहते हुए श्रद्धालु भक्तों को उसके दर्शन कराये जाँय कि 'देखो, देवता की कैसी महिमा है?'। जो व्यक्ति इस पर विश्वास न करें उन्हें चरणामृत के साथ इतना विष दिया जाय, जिससे वे बेहोश हो जायें, और फिर यह प्रसिद्धि की जाय कि 'यह नाग देवता का शाप है।' जो व्यक्ति देवता की निन्दा करे उन्हें साँप से कटवा दिया जाय और उसको भी देवता का ही शाप कहा जाय। फिर बाद में औपनिषदिक प्रकरण में निर्दिष्ट रीति से चिकित्सा कर उसके विष को दूर कर दिया जाय। इस प्रकार धन संचय करके राजा अपने खजाने को बढ़ाये।

(१) अथवा व्यापारी के वेष में वैदेहक नामक गुप्तचर प्रचुर वस्तुओं और अनेक सहायकों को लेकर व्यापार करना आरम्भ कर दें। लोगों के बीच जब उसकी साख बन जाय और अमानत के रूप में तथा ब्याज आदि के लिए लोग उसके पास जब काफी पूंजी जमा कर दें, तब अचानक ही वह चोरी हो जाने का ढिंढोरा कर सारा माल राजा के लिए हड़प ले।

(२) इसी प्रकार सरकार द्वारा नियुक्त सिक्कों का पारखी और सुनार भी छल-कपट से राजकोष के लिए धन एकत्र करें। अथवा व्यापारी के वेष में राजा के गुप्तचर जब लेन-देन में खूब प्रसिद्ध हो जायें तो एक दिन वे सहभोज के बहाने पास-