कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context| प्रकरण ८९ | दाण्डकर्मिकम् |
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| अध्याय १ |
(१) दुर्गराष्ट्रयोः कण्टकशोधनमुक्तम् । राजराज्ययोर्वक्ष्यामः ।
(२) राजानमवगृह्योपजीविनः शत्रुसाधारणा वा ये मुख्यास्तेषु गूढपुरुषप्रणिधिः कृत्यपक्षोपग्रहो वा सिद्धिः । यथोक्तं पुरस्तादुपजापोऽपसर्पो वा यथा च पारग्रामिके वक्ष्यामः ।
(३) राज्योपघातिनस्तु वल्लभाः संहता वा ये मुख्याः प्रकाशमशक्याः प्रतिषेद्धु दूष्याः, तेषु धर्मरुचिरुपांशुदण्डं प्रयुञ्जीत ।
(४) दूष्यमहामात्रभ्रातरं सत्कृतं सत्त्री प्रोत्साह्य राजानं दर्शयेत् । तं राजा दूष्यद्रव्योपभोगातिसर्गेण दूष्ये विक्रमयेत् । शस्त्रेण रसेन वा विक्रान्तं तत्रैव घातयेत् । भ्रातृघातकोऽयम् इति ।
राजद्रोही उच्चाधिकारियों के सम्बन्ध में दण्डव्यवस्था
(१) दुर्ग और राष्ट्र के अनिष्टकारियों (कंटकों) के दमन (शोधन) के उपाय चौथे अधिकरण में बताये जा चुके हैं। यही बात अब राजा और राज्य के सम्बन्ध में कही जायेगी।
(२) राजा से वेतन-भोजन पाकर भी उसको नीचा दिखाने वाले अथवा राजा के शत्रुओं से मिले हुए जो मन्त्री, पुरोहित आदि प्रधान राजकर्मचारी हों, उन पर सफलता प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि उनके पीछे राजा सुयोग्य गुप्त पुरुषों को तैनात कर दे; राज्यभर में जितने लोग राजा के शत्रुओं से खार खाये बैठे है उन्हें भी वह अपनी ओर मिला ले; ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति का ढंग पहिले बताया जा चुका है और उसी के सम्बन्ध में कुछ नई बातें आगे पारग्रामिक प्रकरण में बताई जायेंगी।
(३) धर्मप्राण राजा को चाहिए कि वह ऐसे मुख्य राज्यकर्मचारियों तथा संघ के मुखियों को चुपके से मरवा दे (उपांशुवध), जो राजा के खिलाफ बगावत फैलाते हों और जिन दुष्टों को खुले तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है।
(४) दूषित महामात्र (हस्त्यध्यक्ष) आदि के भाई को, जिसको कि दायभाग न मिला हो, संमानपूर्वक उभार कर सत्त्री नामक गुप्तचर उसे राजा के पास लाये। राजा उसको दूषणीय का निग्रह करने के लिए हथियार आदि देकर दोनों भाइयों के