कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
About this granth
The Kautiliya Arthashastra (कौटिलीय अर्थशास्त्रम्) is the most detailed ancient Indian treatise on government, administration, economy, law and war. Tradition ascribes it to Kautilya (Chanakya, Vishnugupta), minister of Chandragupta Maurya. It is divided into fifteen books, covering the training of the king, the duties of departmental superintendents, civil and criminal justice, secret operations, the circle of neighbouring states, the six measures of foreign policy, calamities of the state, campaigns, battle, dealings with confederacies, the weaker king, the capture of forts, occult practices and the methods of the treatise itself.
This is No. 75 of the Vidyabhawan Sanskrit Granthamala, Chowkhamba Vidyabhawan, Varanasi, third edition 1984. It was edited with introduction, Hindi translation and glossary by Vachaspati Gairola of the Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad, and also includes the Chanakya Sutras. The book is dedicated to the memory of Mahamahopadhyaya T. Ganapati Shastri. Gairola's long introduction surveys early Indian assemblies such as the sabha and samiti and the growth of the state.
प्र० ६० : अ० ४ ] विवाह सम्बन्ध ( ३ ) २७३
(१) कुटुम्बर्द्धिलोपे वा सुखावस्थैर्विमुक्ता यथेष्टं विन्देत जीवितार्थ-
मापद्गता वा ।
(२) धर्मविवाहात् कुमारी परिग्रहीतारमनाख्याय प्रोषितमश्रूयमाणं
सप्त तीर्थान्याकाङ्क्षेत, संवत्सरं श्रूयमाणम् । आख्याय प्रोषितमश्रूयमाणं
पञ्चतीर्थान्याकाङ्क्षेत, दश श्रूयमाणम् । एकदेशदत्तशुल्कं त्रीणि तीर्थान्या-
श्रूयमाणम्, श्रूयमाणं सप्त तीर्थान्याकाङ्क्षेत । दत्तशुल्कं पञ्च तीर्थान्य-
श्रूयमाणम्, दश श्रूयमाणम् । ततः परं धर्मस्थैर्विस्सृष्टा यथेष्टं विन्देत ।
तीर्थोपरोधो हि धर्मवधं इति कौटिल्यः ।
(३) दीर्घप्रवासिनः प्रव्रजितस्य प्रेतस्य वा भार्या सप्त तीर्थान्याका-
ङ्क्षेत, संवत्सरं प्रजाता । ततः पतिसोदर्य गच्छेत् । बहुषु प्रत्यासन्नं धार्मिकं
( १ ) कुटुम्बक्षय या समृद्ध बंधु-बांधवों के छोड़े जाने के कारण या विपत्ति की मारी हुई कोई भी प्रोषितपतिका जीवन-निर्वाह के लिए, अपनी इच्छा के अनुसार, दूसरा विवाह कर सकती है।
( २ ) चार प्रकार के धर्म-विवाहों के अनुसार जिस कुमारी का विवाह हुआ हो, और यदि उसका पति उससे बिना कहे ही परदेश चला जाय तो सात मासिक धर्म तक वह अपने पति की प्रतीक्षा करे। यदि उसकी कोई सूचना मिल गई हो तो एक वर्ष तक पत्नी उसकी प्रतीक्षा करे। यदि कहकर पति विदेश जाय और उसकी कोई खबर न मिले तो पाँच मासिक धर्म तक और मिल जाय तो दस मासिक धर्म तक उसकी इन्तजारी करे। विवाह के समय प्रतिज्ञात धन में से जिसने अपनी पत्नी को थोड़ा ही धन दिया हो और विदेश जाने पर उसकी कोई खबर न मिले तो तीन मासिक धर्म पर्यन्त; यदि खबर मिल जाय तो सात मासिक धर्म तक पत्नी उसकी प्रतीक्षा करे। जिस पति ने विवाह में प्रतिज्ञात सभी धन पत्नी को चुकता कर दिया हो, विदेश जाने पर उसकी कोई खबर न मिले तो पाँच मासिक धर्म तक और खबर मिल जाय तो दस मासिक धर्म तक उसकी प्रतीक्षा की जाय। इन सभी अवस्थाओं के बीत जाने पर कोई भी स्त्री धर्माधिकारी से आज्ञा लेकर अपनी इच्छा से अपना दूसरा विवाह कर सकती है। इस सम्बन्ध में आचार्य कौटिल्य का कथन है 'क्योंकि ऋतुकाल में स्त्री को पुरुष का सहवास न मिलना, धर्म का नाश हो जाने के बराबर, अमङ्गलकारी है'।
( ३ ) जिस स्त्री का पति संन्यासी हो गया हो या मर गया हो, उसकी स्त्री सात मासिकधर्म तक दूसरा विवाह न करे। यदि उसकी कोई सन्तान हो तो वह एक वर्ष तक ठहर जाय। उसके बाद वह अपने पति के सगे भाई के साथ विवाह कर ले। यदि ऐसे सगे भाई बहुत हों तो वह, पति के पीठ पीछे पैदा हुए धार्मिक
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२७४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
भर्मसमर्थं कनिष्ठमभार्यं वा । तदभावेऽप्यसोदर्यं सपिण्डं कुल्यं वा । आसन्न-
मेतेषाम् । एष एव क्रमः ।
(१) एतानुत्क्रम्य दायादान् वेदने जातकर्मणि ।
जारस्त्रीदातृवेत्तारः सम्प्राप्ताः सङ्ग्रहात्ययम् ।।
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे विवाहसंयुक्ते निष्पतनं पथ्यनुसरणं
ह्रस्वप्रवासदीर्घप्रवासो नाम चतुर्थोऽध्यायः,
आदितः षष्टितमः ।
—: ० :—
एवं भरण-पोषण में समर्थ भाई के साथ विवाह कर ले; या जिस भाई की पत्नी न
हो उसके साथ विवाह कर ले । यदि पति का कोई सगा भाई न हो तो समान गोत्र
वाले उसके किसी पारिवारिक भाई साथ विवाह कर ले । कम से पति का जो नज-
दीक-से नजदीक का भाई हो, उसके साथ विवाह कर ले ।
( १ ) अपने पति की सम्पति के हकदार पुरुषों को छोड़कर यदि कोई स्त्री
किसी दूसरे पुरुष के साथ विवाह करे तो विवाह करने वाला पुरुष, वह स्त्री, उस
स्त्री को देने वाला, उस विवाह में शामिल होने वाले, ये सभी लोग, स्त्री को बह-
काने या अनुचित ढंग से उसको अपने काबू में करने के जुर्मदार समझे जाँय और
उनको यथोचित दण्ड दिया जाय ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में चौथा अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ६१ | # दायविभागे दायक्रमः |
|---|---|
| अध्याय ५ |
(१) अनीश्वराः पितृमन्तः स्थितपितृमातृकाः पुत्राः। तेषामूर्ध्वं पितृतो दायविभागः पितृद्रव्याणाम्। स्वयमर्जितमविभाज्यम् अन्यत्र पितृद्रव्यादुत्थितेभ्यः।
(२) पितृद्रव्यादविभक्तोपगतानां पुत्राः पौत्रा वा आ चतुर्थादित्यंशभाजः। तावदविच्छिन्नः पिण्डो भवति। विच्छिन्नपिण्डाः सर्वे समं विभजेरन्।
(३) अपितृद्रव्या विभक्तपितृद्रव्या वा सहजीवन्तः पुनर्विभजेरन्। यतश्चोत्तिष्ठेत स द्वयंशं लभेत।
(४) द्रव्यमपुत्रस्य सोदर्या भ्रातरः सहजीविनो वा हरेयुः कन्याश्च।
दाय विभाग
उत्तराधिकार का सामान्य नियम
(१) माता-पिता या केवल पिता के जीवित रहते लड़के संपत्ति के अधिकारी नहीं होते हैं। उनके न रहने पर लड़के आपस में संपत्ति का बँटवारा कर सकते हैं; जो संपत्ति किसी लड़के ने स्वयं अर्जित की है उसका बंटवारा नहीं होता है, यदि वह संपत्ति पिता का धन खर्च करके उपार्जित हो तो उसका बंटवारा हो सकता है।
(२) संयुक्त परिवार में रहने वाले पुत्रों के पुत्र-पौत्र आदि चौथी पीढ़ी तक अविभाजित पैतृक संपत्ति के बराबर के हकदार हैं। किन्तु यह जरूरी है कि उनकी वंशपरंपरा खंडित न हुई हो। यदि वंश-परंपरा खंडित हो गई हो तो उस दशा में सभी मौजूद भाई पैतृक संपत्ति का बराबर हिस्सा करें।
(३) जिन भाइयों को पिता की संपत्ति प्राप्त न हुई हो, अथवा जो भाई बँटवारा हो जाने के बाद भी एक साथ खाते-कमाते हों, वे फिर से संपत्ति का विभाग कर सकते हैं। जिस भाई के कारण संपत्ति की अधिक वृद्धि हुई हो वह बंटवारे के समय दो हिस्सा ले सकता है।
(४) जिसके कोई पुत्र न हों उसकी संपत्ति उसके सगे भाई या साथी ले सकते हैं, और विवाहादि के लिए जितने धन की अपेक्षा हो, कन्यायें उतना धन अपनी पैतृक संपत्ति में से ले लें।
२७६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
२७६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) रिक्थं पुत्रवतः पुत्रा दुहितरो वा धर्मिष्ठेषु विवाहेषु जाताः । तदभावे पिता धरमाणः, पित्रभावे भ्रातरो भ्रातृपुत्राश्च ।
(२) अपितृका बहवोऽपि च भ्रातरो भ्रातृपुत्राश्च पितुरेकमंशं हरेयुः ।
(३) सोदर्याणामनेकपितृकाणां पितृतो दायविभागः ।
(४) पितृभ्रातृपुत्राणां पूर्वे विद्यमाने नापरमवलम्बन्ते, ज्येष्ठे च कनिष्ठमर्थग्राहिणः ।
(५) जीवद्विभागे पिता नैकं विशेषयेत् । न चैकमकारणान्निर्विभजेत । पितुरसत्यर्थे ज्येष्ठाः कनिष्ठाननुगृह्णीयुः, अन्यत्र मिथ्यावृत्तेभ्यः ।
(६) प्राप्तव्यवहाराणां विभागः । अप्राप्तव्यवहाराणां देयविशुद्धं मातृबन्धुषु ग्रामवृद्धेषु वा स्थापयेयुर्व्यवहारप्रापणात्; प्रोषितस्य वा ।
( १ ) सुवर्ण, आभूषण एवं नकदी आदि जो भी रिक्थ धन है उसके अधिकारी लड़के हैं, लड़कों के अभाव में वे लड़कियाँ रिक्थ धन की अधिकारिणी हैं, जो धर्म-विवाहों से पैदा हुई हैं। लड़कियों के अभाव में मृतक पुरुष का जीवित पिता, पिता के अभाव में पिता के सगे भाई, और उनके अभाव में भी उनके पुत्र उस संपत्ति के हकदार हैं।
( २ ) मृतक पिता के यदि बहुत-से भाई और उन भाइयों के भी कई पुत्र हों तो वे पिता की संपत्ति का बराबर बँटवारा करें।
( ३ ) एक ही माता से अनेक पिताओं द्वारा पैदा हुए लड़कों का दाय-विभाग पिता के क्रम से होना चाहिए।
( ४ ) मृतक के भाइयों के पुत्रों में यदि उनका पिता जीवित हो और कुटुम्ब के भरण-पोषण के लिए कर्जा लिया हो तो उस कर्जे को वही चुकता करे, उसके अभाव में बड़ा पुत्र और उसके अभाव में छोटा पुत्र कर्जा अदा करे।
( ५ ) पिता अपने जीते-जी यदि अपनी संपत्ति का बँटवारा करना चाहे तो वह किसी एक पुत्र को अधिक हिस्सा न दे। उसे चाहिए कि अकारण ही किसी लड़के को वह हिस्सेदारी से वंचित न करे। पिता अपने पीछे यदि कुछ भी संपत्ति न छोड़ जाय तो बड़े भाई को चाहिए कि वह छोटे भाइयों का भरण-पोषण करे, किन्तु छोटे भाई यदि आचार-व्यवहार-भ्रष्ट हो जाँय तो उसकी रक्षा के दायित्व से अपने को वह बरी समझे।
( ६ ) पुत्रों के बालिग (प्राप्तव्यवहार) हो जाने पर ही संपत्ति का बँटवारा करना चाहिए। नाबालिग (अप्राप्तव्यवहार) पुत्र जब तक बालिग न हो जाँय और विदेश गए पुत्र जब तक वापिस न लौट आएँ तब तक उनके हिस्से की सम्पत्ति को उनके माता या गाँव के किसी वृद्ध विश्वासी पुरुष के पास सुरक्षित रख देना चाहिए।
प्र० ६१ : अ० ५ ] दायभाग ( १ ) २७७
(१) सन्निविष्टसममसन्निविष्टेभ्यो नैवेशनिकं दद्युः । कन्याभ्यश्च प्रादानिकम् ।
(२) ऋणरिक्थयोः समो विभागः ।
(३) उदपात्राण्यपि निष्किञ्चना विभजेरन्, इत्याचार्याः । छलमेतदिति कौटिल्यः । सतोऽर्थस्य विभागो नासतः ।
(४) एतावानर्थः सामान्यस्तस्यैतावान् प्रत्यंशः, इत्यनुभाष्य ब्रुवन् साक्षिषु विभागं कारयेत् । दुर्विभक्तमन्योन्यापहृतमन्तर्हितमविज्ञातोत्पन्नं वा पुनर्विभजेरन् ।
(५) अदायादकं राजा हरेत् स्त्रीवृत्तिप्रेतकार्यवर्जम्, अन्यत्र श्रोत्रियद्रव्यात् । तत् त्रैविद्येभ्यः प्रयच्छेत् ।
(६) पतितः पतिताज्जातः क्लीबश्चानंशः, जडोन्मत्तान्धकुष्ठिनश्च । सति भार्यार्थे तेषामपत्यमतद्विधं भागं हरेत् । ग्रासाच्छादनमितरे पतितवर्जाः ।
( १ ) विवाहित बड़े भाइयों का कर्तव्य है कि वे अपने छोटे अविवाहित भाइयों के विवाह के लिए खर्च दें और अपनी छोटी बहिनों के विवाह में दहेज आदि के लिए यथोचित धन दें ।
( २ ) सभी भाइयों को चाहिए कि वे ऋण और आभूषण तथा नगदी आदि रिक्थ धन को आपस में बराबर बांट लें ।
( ३ ) प्राचीन आचार्यों का मत है कि 'दरिद्र लोग अपने पानी पीने आदि के बर्तनों को भी आपस में बांट लें', किंतु आचार्य कौटिल्य के मत से 'ऐसा करना छल-कपट है,' क्योंकि उनके मत से, 'विद्यमान संपत्ति ही बँटवारे के योग्य होती है अविद्यमान संपत्ति नहीं ।'
( ४ ) 'सारी संपत्ति इतनी है और प्रत्येक भाई का इतना-इतना हिस्सा है', यह बात साक्षियों के सामने स्पष्ट करके बँटवारा कराया जाय । यदि बँटवारा ठीक न हुआ हो, या उस संपत्ति में से किसी हिस्सेदार ने कुछ चुरा लिया हो, या बँटवारे के समय कोई चीज रह गई हो, अथवा बँटवारे के बाद अकस्मात् ही कोई चीजें अधिक आ गई हों, तो उस संपत्ति का फिर से बँटवारा किया जाना चाहिए ।
( ५ ) जिस संपत्ति का कोई उत्तराधिकारी न हो उसे राजा ले ले, उस संपत्ति में से वह मृतक की विधवा के भरण-पोषण योग्य तथा मृतक के श्राद्धकर्म आदि के योग्य धन छोड़ दे । श्रोत्रिय के धन को राजा कदापि न ले, बल्कि उस संपत्ति को वह वेदविद् ब्राह्मणों में वितरित कर दे ।
( ६ ) पतित को, पतित से पैदा हुई संपति को और नपुंसक को दाय-भाग नहीं मिलता है । मूर्ख, उन्मत्त, अंधा और कोढ़ी आदि भी दाय भाग के अधिकारी नहीं हैं । मूर्ख, कोढ़ी आदि की भली संतान को उनकी माता की संपत्ति का उत्तराधिकार
२७८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
२७८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१). तेषां च कृतदाराणां लुप्ते प्रजनने सति ।
सृजेयुर्बान्धवाः पुत्रांस्तेषामंशान् प्रकल्पयेत् ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे दायविभागे दायक्रमो नाम पञ्चमोऽध्यायः, आदित एकषष्टितमः ।
—: ० :—
दिया जाना चाहिए । पतितों को छोड़ कर दूसरे सभी मूर्ख आदि को केवल भोजन-वस्त्र के लिए उस संपत्ति में से दिया जाना चाहिए ।
(१) यदि उक्त पतित, मूर्ख आदि पुरुषों की स्त्रियाँ हों, किन्तु अशक्त होने से उनसे वे संतान पैदा न कर सकें, तो उनके बंधु-बांधव उनकी ( मूर्ख आदि की ) पत्नियों से संतान पैदा करें । वे संतान अपनी परंपरागत संपत्ति के उत्तराधिकारी माने जाने चाहिएँ ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में दायविभाग-दायक्रम नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ६२ |
|---|
| अध्याय ६ |
दायविभागे अंशविभागः
(१) एकस्त्रीपुत्राणां ज्येष्ठांशः ब्राह्मणानामजाः, क्षत्रियाणामश्वाः, वैश्यानां गावः, शूद्राणामवयः ।
(२) काणलिङ्गास्तेषां मध्यमांशः, भिन्नवर्णाः कनिष्ठांशः ।
(३) चतुष्पदाभावे रत्नवर्जनां दशानां भागं द्रव्याणामेकं ज्येष्ठो हरेत् । प्रतिमुक्तस्वधापाशो हि भवति इत्यौशनसो विभागः ।
(४) पितुः परिवापाद्यानमाभरणं च ज्येष्ठांशः, शयनासनं भुक्तकांस्यं च मध्यमांशः, कृष्णधान्यायसं गृहपरिवापो गोशकटं च कनिष्ठांशः । शेषद्रव्याणामेकद्रव्यस्य वा समो विभागः ।
(५) अदायादा भगिन्यः मातुः परिवापादभुक्तकांस्याभरणभागिन्यः ।
दाय विभाग
पैतृक क्रम से विशेषाधिकार
( १ ) यदि एक स्त्री के कई पुत्र हों तो उनमें से सबसे बड़े पुत्र को वर्ण क्रम से इस प्रकार हिस्सा मिलना चाहिए : ब्राह्मणपुत्र को बकरियाँ, क्षत्रिय पुत्र को घोड़े, वैश्यपुत्र को गायें और शूद्रपुत्र को भेड़ें ।
( २ ) उन पशुओं में जो काणे हों वे मंझले पुत्र को और जो रङ्ग-बिरङ्गे पशु हों वे सबसे छोटे पुत्र को दिए जाँय ।
( ३ ) 'यदि पशु न हों तो, हीरे-जवाहरात को छोड़ कर बाकी सारी सम्पत्ति का दसवाँ हिस्सा बड़े लड़के को अधिक दिया जाय; क्योंकि बड़ा लड़का ही पितरों का पिंडदान एवं श्राद्ध करता है ।' अंश-विभाग के सम्बन्ध में यह उशना (शुक्राचार्य) के अनुयायियों का मत है ।
( ४ ) मृतक पिता की सम्पत्ति में से सवारी और आभूषण बड़े लड़के को, सोने बिछाने और पुराने बर्त्तन मझले लड़के को और काला अन्न, लोहा तथा बैलगाड़ी आदि अन्य घरेलू सामान छोटे लड़के को मिलना चाहिए। बाकी सभी द्रव्यों या एक द्रव्य की बराबर बाँट होनी चाहिए ।
( ५ ) दाय भाग की अनधिकारिणी बहिनें, माता की सम्पत्ति में से पुराने बर्तन तथा जेवरात ले लें ।
| २८० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ तीसरा अधिकरण |
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(१) मानुषहीनो ज्येष्ठस्तृतीमंशं ज्येष्ठांशाल्लभेत, चतुर्थमन्यायवृत्तिनिवृत्तधर्मकार्यो वा। कामचारः सर्वं जीयेत।
(२) तेन मध्यमकनिष्ठौ व्याख्यातौ। तयोर्मानुषोपेतो ज्येष्ठांशादधं लभेत।
(३) नानास्त्रीपुत्राणां तु संस्कृतासंस्कृतयोः कन्याकृतक्रिययोरभावे च, एकस्याः पुत्रयोर्यमयोर्वा पूर्वजन्मना ज्येष्ठभावः।
(४) सूतमागधव्रात्यरथकाराणामैश्वर्यतो विभागः, शेषास्तमुपजीवेयुः। अनीश्वराः समविभागा इति।
(५) चातुर्वर्ण्यपुत्राणां ब्राह्मणीपुत्रश्चतुरोंऽशान् हरेत्, क्षत्रियापुत्र-स्त्रीनंशान्, वैश्यापुत्रो द्वावंशौ, एकं शूद्रापुत्रः।
(६) तेन त्रिवर्णद्विवर्णपुत्रविभागः क्षत्रियवैश्ययोर्व्याख्यातः।
( १ ) बड़ा लड़का यदि नपुंसक हो तो उसे अपने हिस्से में से तीसरा हिस्सा, यदि वह चरित्रहीन हो तो चौथा हिस्सा और यदि धर्मकार्यों से दूर रहता हो तथा स्वेच्छाचारी हो तो पैतृक सम्पत्ति का उसे कुछ भी उत्तराधिकार नहीं मिलना चाहिए।
( २ ) ऐसी अवस्था में मझले और छोटे लड़कों के सम्बन्ध में यही नियम समझना चाहिए। इन दोनों में यदि एक नपुंसक न हो तो वह बड़े भाई के हिस्से में से आधी बाँट ले ले।
( ३ ) अनेक स्त्रियों से उत्पन्न पुत्रों में उसी के पुत्रको बड़ा समझा जाय, जो अविवाहित स्त्री के मुकाबले में, विधिपूर्वक व्याहं करके लाई गई है, भले ही उसका पुत्र पीछे पैदा हुआ हो; यदि एक स्त्री कन्या की अवस्था में ही पत्नी बनी और दूसरी स्त्री दूसरों द्वारा भोगी जाने पर पत्नी बनी, तो उनमें से पहिली का लड़का ही बड़ा समझा जाय। इसी प्रकार यदि किसी स्त्री के जुड़वाँ बच्चे पैदा हो जायें, तो उनमें वही बड़ा माना जाय जो पहिले पैदा हुआ है।
( ४ ) सूत, मागध, व्रात्य और रथकारों की सम्पत्ति का विभाग उनके ऐश्वर्य के अनुसार होना चाहिए, अर्थात् जो लड़का उनमें अधिक प्रभावशाली है वह पैतृक सम्पत्ति को ले ले और उसके बाकी भाई उस पर आश्रित रहकर जीवित रहें। यदि उनमें से कोई एक अधिक प्रभावशाली न हो तो वे सम्पत्ति का बराबर-बराबर बाँट करें।
( ५ ) यदि किसी ब्राह्मण की चारों वर्णों की पत्नियां हों तो ब्राह्मणी से पैदा हुए पुत्र को चार भाग, क्षत्रिया स्त्री के पुत्र को तीन भाग, वैश्या पत्नी के लड़के को दो भाग और शूद्रा में उत्पन्न हुए पुत्र को एक भाग मिलना चाहिए।
( ६ ) इसी प्रकार यदि किसी क्षत्रिय की क्षत्रिया, वैश्या और शूद्रा, तीन पत्नियां
प्र० ६२ : अ० ६ ] दायविभाग ( २ ) २८१
(१) ब्राह्मणस्यानन्तरापुत्रस्तुल्यांशः । क्षत्रियवैश्ययोरर्धांशः । तुल्यांशो वा मानुषोपेतः ।
(२) तुल्यातुल्ययोरेकपुत्रः सर्वं हरेद् बन्धूंश्च बिभृयात् ।
(३) ब्राह्मणानां तु पारशवस्तृतीयमंशं लभेत । द्वावंशौ सपिण्डः कुल्यो वासन्नः स्वधावानहेतोः । तदभावे पितुराचार्योऽन्तेवासी वा ।
(४) क्षेत्रे वा जनयेदस्य नियुक्तः क्षेत्रजं सुतम् ।
मातृबन्धुः सगोत्रो वा तस्मै तत् प्रदिशेद् धनम् ॥इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे दायविभागे अंशविभागो नाम षष्ठोऽध्यायः, आदितो द्विषष्टितमः ।
—: ० :—
हों, तथा वैश्य की वैश्या और शूद्रा, दो ही पत्नियां हों तो उनके पुत्रों का दायविभाग भी उक्त विधि से ही समझ लेना चाहिए ।
( १ ) यदि किसी के ब्राह्मणी और क्षत्रिया से दो ही पुत्र पैदा हुए हों तो तो वे दोनों सम्पत्ति को बराबर बांट लें । इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य के घर में नीच जाति की स्त्री से उत्पन्न हुए लड़के, समान वर्ण की स्त्री से उत्पन्न हुए लड़के के हिस्से में से आधी बांट ले ले । जिसमें पौरुष हो वह बराबर का ही हिस्सा ले ।
( २ ) समान या असमान, किसी भी वर्ण की स्त्री से यदि लड़का पैदा हुआ हो तो वही पिता की सारी सम्पत्ति को ले ले; और अपने बन्धु-बांधवों का भरण-पोषण करे ।
( ३ ) ब्राह्मण से शूद्रा में उत्पन्न हुआ पुत्र ब्राह्मण की सम्पत्ति के तीसरे हिस्से को प्राप्त करे । यदि किसी मातृकुल की या निकट के खानदान की स्त्री से लड़का उत्पन्न हुआ हो तो वह दो भाग ले ले, जिससे कि वह मृत पिता का पिण्डदान कर सके । इन सब के न होने पर मृतक का आचार्य अथवा शिष्य उसकी सम्पत्ति का अधिकारी है ।
( ४ ) अथवा मृतक की स्त्री से नियोग द्वारा पैदा हुआ पुत्र या उसके मातृकुल के भाई अथवा समीप के रिश्तेदार, मृतक की सम्पत्ति के अधिकारी हैं ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में दायविभाग-अंशविभाग नामक छठा अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
प्रकरण ६३
अध्याय ७
दायविभागे पुत्रविभागः
(१) परपरिग्रहे बीजमुत्सृष्टं क्षेत्रिणः, इत्याचार्याः ।
(२) माता भस्त्रा यस्य रेतस्तस्यापत्यम्, इत्यपरे ।
(३) विद्यमानमुभयम्, इति कौटिल्यः ।
(४) स्वयंजातः कृतक्रियायामौरसः । तेन तुल्यः पुत्रिकापुत्रः । सगोत्रेणान्यगोत्रेण वा नियुक्तेन क्षेत्रजातः क्षेत्रजः पुत्रः । जनयितुरसत्यन्यस्मिन् पुत्रे स एव द्विपतृको द्विगोत्रो वा द्वयोरपि स्वधारिक्थभाग् भवति । तत्सधर्मा बन्धूनां गृहे गूढजातस्तु गूढजः । बन्धुनोत्सृष्टोऽपविद्धः संस्कर्तुः पुत्रः। कन्यागर्भः कानीनः । सगर्भोढाया सहोढः । पुनर्भूतायाः पौनर्भवः ।
दाय विभाग
पुत्रक्रम से उत्तराधिकार
( १ ) पुरातन आचार्यों का मत है कि ‘किसी पुरुष से किसी पराई स्त्री में पैदा हुआ पुत्र उस पराई स्त्री की संपत्ति है’।
( २ ) किन्तु दूसरे आचार्यों का कहना है कि ‘जो बच्चा जिसके वीर्य से पैदा हो वह उसी का समझा जाना चाहिए।’
( ३ ) आचार्य कौटिल्य की स्थापना है कि ‘वे दोनों ही उस बालक के पिता समझे जाँय।’
( ४ ) विधिपूर्वक विवाहित स्त्री से उसके पति द्वारा पैदा किया हुआ पुत्र औरस कहलाता है । उसी के समान लड़की का लड़का भी समझा जाता है । समानगोत्र अथवा भिन्नगोत्र स्त्री से उसके पति द्वारा पैदा किया गया लड़का क्षेत्रज कहलाता है । यदि मृतक पिता का कोई लड़का न हो तो वही, ( दो पिता या दो गोत्र वाला लड़का ही ) उन दोनों के पिंडदान और संपत्ति, का उत्तराधिकारी होता है । क्षेत्रज पुत्र की ही तरह जो बच्चा छिपे तौर पर स्त्री के किसी भाई-बन्धु के घर पैदा हो वह गूढज कहलाता है । यदि बन्धु-बान्धव उस बच्चे को अपने यहाँ न रखना चाहें और मारकर कहीं डाल दें या फेंक दें, उस दशा में जो उस बच्चे का पालन-पोषण करे वह पुत्र उसी का माना जाता है । अविवाहित कन्या के गर्भ से जो बच्चा पैदा हो उसे कानीन कहते है । गर्भवती स्त्री का विवाह होने पर जो बच्चा पैदा हो वह सहोढ कहलाता है । दुबारा व्याहता स्त्री से जो बच्चा पैदा हो उसे पौनर्भव कहते हैं ।
प्र० ६३ : अ० ७ ] दायविभाग ( ३ ) २८३
(१) स्वयंजातः पितृबन्धूनां च दायादः । परजातः संस्कर्तुरेव न बन्धूनाम् ।
(२) तत्सधर्मा मातृपितृभ्यामद्भिर्दत्तो दत्तः ।
(३) स्वयं बन्धुभिर्वा पुत्रभावोपगत उपगतः ।
(४) पुत्रत्वेऽधिकृतः कृतकः । परिक्रीतः क्रीत इति ।
(५) औरसे तूत्पन्ने सवर्णास्तृतीयांशहराः । असवर्णा ग्रासाच्छादन-भागिनः ।
(६) ब्राह्मणक्षत्रिययोरनन्तरा पुत्राः सवर्णाः, एकान्तरा असवर्णाः ।
(७) ब्राह्मणस्य वैश्यायामम्बष्ठः, शूद्रायां निषादः पारशवो वा । क्षत्रियस्य शूद्रायामुग्रः ।
(८) शूद्र एव वैश्यस्य ।
( १ ) पिता या बन्धुओं से स्वयं उत्पन्न किया हुआ बच्चा उनकी संपत्ति का उत्तराधिकारी होता है । जो पुत्र गूढज पुत्र के समान दूसरे से पैदा हुआ हो, वह अपने पालन-पोषण करने वाले की संपत्ति का ही उत्तराधिकारी होता है; बन्धु-बान्धवों की संपत्ति का नहीं ।
( २ ) उक्त बालक के ही समान जो बालक माता-पिता के द्वारा, हाथ में जल लेकर, किसी दूसरे को दे दिया जाय वह दत्त कहलाता है; और पालन करने वाले की संपत्ति का वह उत्तराधिकारी होता है ।
( ३ ) जो स्वयं या बन्धुओं द्वारा पुत्र भाव से प्राप्त हुआ हो, वह उपगत कहलाता है ।
( ४ ) जो पुत्रभाव से स्वीकार किया जाय वह कृतक कहलाता है । जो खरीद कर पुत्र बनाया जाय उसको क्रीत पुत्र कहते हैं ।
( ५ ) औरस पुत्र के उत्पन्न होने पर अन्य सवर्ण स्त्रियों से उत्पन्न पुत्र, पिता की जायदाद के तीसरे हिस्से के अधिकारी होते हैं । असवर्ण स्त्रियों से उत्पन्न पुत्र केवल भोजन-वस्त्र के ही अधिकारी हैं ।
( ६ ) ब्राह्मण और क्षत्रिय के अनन्तर (ब्राह्मण के लिए क्षत्रिय और क्षत्रिय के लिए वैश्य) जाति की स्त्री से उत्पन्न पुत्र सवर्ण और एक जाति के व्यवधान से, अर्थात् ब्राह्मण से वैश्या में या क्षत्रिय से शूद्रा में, उत्पन्न पुत्र असवर्ण समझे जाते हैं ।
( ७ ) ब्राह्मण से वैश्या में उत्पन्न पुत्र अम्बष्ठ कहलाता है । ब्राह्मण से शूद्रा में उत्पन्न पुत्र निषाद या पारशव कहलाता है । क्षत्रिय से शूद्रा में उत्पन्न पुत्र उग्र कहलाता है ।
( ८ ) वैश्य से शूद्रा में उत्पन्न पुत्र शूद्र ही माना जायेगा ।
| २८४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ तीसरा अधिकरण |
|---|
(१) सवर्णासु चैषामचरितव्रतेभ्यो जाता व्रात्याः । इत्यनुलोमाः ।
(२) शूद्रादायोगवक्षत्तृचण्डालाः ।
(३) वैश्यान्मागधवैदेहकौ ।
(४) क्षत्रियात् सूतः ।
(५) पौराणिकस्त्वन्यः सूतो मागधश्च; ब्रह्मक्षत्राद्विशेषतः ।
(६) त एते प्रतिलोमाः स्वधर्मातिक्रमाद् राज्ञः सम्भवन्ति ।
(७) उग्रान्नैषाद्यां कुक्कुटकः, विपर्यये पुल्कसः । वैदेहिकायामम्बष्ठाद् वेणः, विपर्यये कुशीलवः । क्षत्तायामुग्राच्छ्वपाकः । इत्येतेऽन्ये चान्तरालाः । कर्मणा वैण्यो रथकारः ।
(८) तेषां स्वयोनौ विवाहः । पूर्वावरगामित्वं वृत्तानुवृत्तं च स्वधर्मान् स्थापयेत् । शूद्रसधर्माणो वा अन्यत्र चण्डालेभ्यः ।
( १ ) ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य द्वारा सवर्णा स्त्रियों में उत्पन्न पुत्रों का यदि यथासमय विधिपूर्वक उपनयन एवं ब्रह्मचर्य आदि संस्कार न किया जाय तो वे व्रात्य हो जाते हैं । ये सब अनुलोम विवाहों से पैदा होते हैं ।
( २ ) शूद्र द्वारा वैश्या, क्षत्रिया तथा ब्राह्मणी स्त्रियों में उत्पन्न पुत्र क्रमशः आयोगव, क्षत्ता और चाण्डाल कहलाते हैं ।
( ३ ) वैश्य द्वारा क्षत्रिया तथा ब्राह्मणी में उत्पन्न पुत्र क्रमशः मागध और वैदेहक कहलाते हैं ।
( ४ ) क्षत्रिय द्वारा ब्राह्मणी में उत्पन्न पुत्र सूत कहलाता है ।
( ५ ) किन्तु पुराणों में वर्णित सूत और मागध इनसे सर्वथा भिन्न हैं और वे ब्राह्मण तथा क्षत्रियों से भी श्रेष्ठ हैं ।
( ६ ) राजा जब धर्मभ्रष्ट हो जाता है तभी ये प्रतिलोम वर्णसंकर सन्तानें पैदा होती हैं ।
( ७ ) क्षत्रिय-शूद्रा से उत्पन्न उग्र पुरुष द्वारा निषाद जाति की स्त्री में उत्पन्न बालक कुक्कुट कहलाता है । निषाद पुरुष से उग्रा स्त्री में उत्पन्न पुत्र पुल्कस कहलाता है । अम्बष्ठ पुरुष से वैदेहिका स्त्री में उत्पन्न पुत्र वैण कहलाता है । वैदेहक पुरुष से अम्बष्ठा स्त्री में उत्पन्न पुत्र कुशीलव कहलाता है । इसी प्रकार उग्र-क्षत्ता से श्वापाक आदि अवान्तर संकर जातियों के सम्बन्ध में समझना चाहिए । वैण्य; कर्म करने से रथकार कहा जाता है ।
( ८ ) उक्त संकर वर्णों का विवाह अपनी ही जाति में होता है । पूर्वापरगामी होने तथा धर्म का निर्णय करने में वे अपने पूर्वजों का अनुगमन करें । अथवा चाण्डालों को छोड़कर सभी संकर जातियों का धर्म, शूद्रों के ही समान समझना चाहिये ।
प्र० ६३ : अ० ७ ] दाय विभाग ( ३ ) २८५
( १ ) केवलमेवं वर्तमानः स्वर्गमाप्नोति राजा नरकमन्यथा ।
( २ ) सर्वेषामन्तरालानां समो विभागः ।
( ३ ) देशस्य जात्याः सङ्घस्य धर्मो ग्रामस्य वापि यः ।
उचितस्तस्य तेनैव दायधर्मं प्रकल्पयेत् ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे दायविभागे
पुत्रविभागो नाम सप्तमोऽध्यायः,
आदितस्त्रिषष्टितमोऽध्यायः ।
—: ० :—
( १ ) प्रजा की सुव्यवस्था का यही एकमात्र विधान है, जिसको करने पर राजा स्वर्ग जाता है; अन्यथा उसको नरक होता है ।
( २ ) इन सभी संकर जातियों में जायदाद का बराबर-बराबर हिस्सा होना चाहिए ।
( ३ ) देश, जाति, संघ और गाँव के लिए जैसा धर्मोचित एवं श्रेयस्कर हो, उसी के अनुसार वहाँ का दाय-विभाग करना चाहिए ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में दायविभाग-पुत्रविभाग नामक सातवाँ अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ६४ | वास्तुके गृहवास्तुकम् |
|---|---|
| अध्याय ८ |
(१) सामन्तप्रत्यया वास्तुविवादाः ।
(२) गृहं क्षेत्रमारामः सेतुबन्धस्तटाकमाधारो वा वास्तुः ।
(३) कर्णकीलायससम्बन्धोऽनुगृहं सेतुः । यथासेतुभोगं वेश्म कारयेत् ।
(४) अभूतं वा परकुड्यादपक्रम्य द्वावरत्नी त्रिपदीं पादे बन्धं कारयेत् ।
(५) अवस्करं भ्रममुदपानं वा न गृहोचितमन्यत्र अन्यत्र सूतिकाकूपादानिर्दशाहादिति । तस्यातिक्रमे पूर्वः साहसदण्डः ।
(६) तेनेन्धनावघातनकृतं कल्याणकृत्येष्वाचामोदकमार्गाश्च व्याख्याताः ।
वास्तुक
गृह-निर्माण
( १ ) गाँव के मुखियाओं ( सामन्तों ) को चाहिए कि वे वास्तु-विषयक झगड़ों का फैसला करें ।
( २ ) घर, खेत, बाग-बगीचे, सीमावंध, तालाब और वाँध आदि सब वास्तु कहलाते हैं ।
( ३ ) प्रत्येक घर के चारों ओर चारों कोनों पर लोहे के छोटे खम्भे गाड़कर उनमें जो तार खींच दिया जाता है, उसी का नाम सेतु ( सीमा ) है । सीमा ( सेतु ) के अनुसार ही मकान बनवाना चाहिए ।
( ४ ) दूसरे की दीवार के सहारे मकान न बनवाया जाय । मकान की नींव में सवा फुट या तीन पद ( दो अरत्नी ) कंकरीट भरवानी चाहिए ।
( ५ ) दस दिन के लिए बनाये जाने वाले सूतिकागृह को छोड़कर, बाकी सब मकानों में पाखाना, पाइप, कुआँ, पाकशाला और भोजनशाला अवश्य बनवाने चाहिए । इस नियम का उल्लंघन करने वाले को पूर्व साहस दण्ड दिया जाना चाहिए ।
( ६ ) इसी प्रकार उत्सवों के समय कुल्ले का पानी बाहर निकालने के लिए नालियों और भट्टियों का प्रबन्ध भी हर मकान में रहना चाहिए ।
प्र० ६४ : अ० ८ ] वास्तुक ( १ ) २६७
(१) त्रिपदीप्रतिक्रान्तमध्यर्धमरत्निं वा प्रवेश्य गाढप्रसृतमुदकमार्गं प्रस्रवणप्रपातं वा कारयेत् । तस्यातिक्रमे चतुष्पञ्चाशतपणो दण्डः ।
(२) एकपदीप्रतिक्रान्तमरत्निं वा चक्रिचतुष्पदस्थानमग्निष्ठमुदञ्जर-स्थानं रोचनीं कुट्टनीं वा कारयेत् । तस्यातिक्रमे चतुर्विंशतिपणो दण्डः ।
(३) सर्ववास्तुकयोः प्राक्षिप्तयोर्वा शालयोः किष्कुरन्तरिका त्रिपदी वा । तयोश्चतुरङ्गुलं नीप्रान्तरं समारूढकं वा । किष्कुमात्रमाणिद्वारमन्त-रिकायां खण्डफुल्लार्थमसम्पातं कारयेत् । प्रकाशार्थमल्पमूर्ध्वं वातायनं कारयेत् । सम्भूय वा गृहस्वामिनो यथेष्टं कारयेयुरनिष्टं वारयेयुः ।
(४) वानलटचाञ्चोर्ध्वमावार्यभागं कटप्रच्छन्नमवमर्शिभिन्ति वा कारयेद् वर्षबाधभयात् । तस्यातिक्रमे पूर्वः साहसदण्डः ।
(५) प्रतिलोमद्वारवातायनबाधायां च, अन्यत्र राजमार्गरथ्याभ्यः ।
(६) खातसोपानप्रणालीनिश्श्रेण्यवस्करभागैर्बहिर्बाधायां भोगनिग्रहे च ।
( १ ) प्रत्येक मकान पर सवा फुट ( तीन पद ) का गहरा, प्लेन तथा साफ-सुथरा पतनाला पानी के बहने के लिए दीवार के साथ-साथ अथवा दीवार से अलग बनवाया जाय । इस नियम का उल्लंघन करने वाले पर पचास पण दण्ड किया जाय ।
( २ ) घर के बाहर एक तरफ चार खम्भों से सज्जत एक यज्ञशाला बनवाई जाय, जिसमें एक पद गहरा पानी बाहर निकलने की नाली हो; यज्ञशाला की दूसरी ओर आटा पीसने की चक्की और अनाज कूटने के लिए ओखली बनवाई जाँय । ऐसा प्रबन्ध न करने वाले को चौबीस पण दण्ड दिया जाय ।
( ३ ) साधारणतया दो मकानों के बीच में एक हाथ ( तीन पद ) का फासला होना चाहिए; छज्जे वाले या उसारे वाले मकानों में भी इतना फासला अवश्य रहना चाहिए । प्रत्येक दो मकानों की छतों में चार अंगुल का अन्तर हो या वे आपस में मिली भी रहें । गली की ओर एक हाथ ( एक किष्कु ) नाप की खिड़की बनाई जाय, जो मजबूत हो और जिसको यथावसर खोला जा सके । रोशनी आने के लिए खिड़की में ऊपर छोटे-छोटे रोशनदान बनवाये जाँय । अन्तिम मकान के रोशनदान पर छाया के लिए टिन आदि लगवा देना चाहिए । अथवा पास-पड़ोस के रहने वाले आपसी समझौते से अपनी इच्छानुसार मकान बनवा लें, जिससे एक-दूसरे को कोई कष्ट न हो ।
( ४ ) वर्षा ऋतु के लिए स्थायी रूप से घास-फूस की एक छत बनवा लेनी चाहिए । ऐसा न करने पर पूर्व साहस दण्ड दिया जाय ।
( ५ ) जो व्यक्ति बाहर की ओर दरवाजा या खिड़की बनवाकर पड़ोसियों को कोई तकलीफ दे उसको भी पूर्व साहस दण्ड दिया जाय । यदि वे दरवाजे या खिड़कियाँ शाही सड़क या बाजार की ओर खुलें तो कोई हर्ज नहीं है ।
( ६ ) गड्ढा, जीना, सीढ़ी और पाखाना आदि के द्वारा जो मकान मालिक
२८८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) परकुड्यमुदकेनोपघ्नतो द्वादशपणो दण्डः। मूत्रपुरीषोपघाते द्विगुणः।
(२) प्रणालीमोक्षो वर्षति, अन्यथा द्वादशपणो दण्डः।
(३) प्रतिषिद्धस्य च वसतः। निरस्यतश्चावक्रयणम्, अन्यत्र पारुष्यस्तेयसाहससङ्ग्रहणमिथ्याभोगेभ्यः। स्वयमभिप्रस्थितो वर्षावक्रयशेषं दद्यात्।
(४) सामान्ये वेश्मनि साहाय्यमप्रयच्छतः सामान्यमुपरुन्धतो भोगं च गृहे द्वादशपणो दण्डः, विनाशयतस्तद्द्विगुणः।
(५) कोष्ठकाङ्गणवर्जनामग्निकुट्टनशालयोः ।
विवृतानां च सर्वेषां सामान्यो भोग इष्यते ॥इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे वास्तुके गृहवास्तुकं नाम अष्टमोऽध्यायः,
आदितश्चतुष्षष्टितमः।
—: ० :—
अपने पड़ोसियों को कष्ट पहुँचावे, सहन को रोके और पानी निकालने का ठीक प्रबन्ध न करे तो वह भी पूर्व साहस दण्ड का भागीदार है।
(१) पानी आदि से जो दूसरे की दीवाल को नुकसान पहुँचाये उसे बारह पण दण्ड दिया जाय। पेशाब और पाखाने की रुकावट करने वाले को चौबीस पण दण्ड दिया जाय।
(२) कूड़ा-करकट बहने के लिये वर्षा-ऋतु में हरेक नाली खुली रहनी चाहिए; अन्यथा उसको बारह पण दण्ड दिया जाय।
(३) मालिक मकान के मना करने पर भी जो किरायादार मकान खाली न करे और किराया देने पर भी जो मकान मालिक किरायेदार को निकाले, उन्हें बारह पण दण्ड दिया जाय; बशर्ते कि उनके सम्बन्ध में कठोर भाषण, चोरी, डाका, व्यभिचार तथा धोखाधड़ी का कोई मामला न हो। यदि किरायेदार स्वेच्छा से मकान को छोड़ दे तो साल भर का किराया मालिक को अदा करे।
(४) धर्मशाला आदि पंचायती घरों में सहायता न देने वाले व्यक्ति को तथा उन घरों का उपयोग करने में बाधा डालने वाले व्यक्ति को बारह पण दण्ड दिया जाय। यदि कोई उन पञ्चायती घरों की क्षति करे तो उस पर चौबीस पण जुर्माना किया जाय।
(५) कोठा और आँगन को छोड़कर अग्निशाला, कुट्टनशाला (ओखली) तथा दूसरे सभी खुले स्थानों का सब लोग उपयोग कर सकते हैं।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में आठवाँ अध्याय समाप्त।
—: ० :—
| प्रकरण ६५ | # वास्तुके वास्तुविक्रयः |
|---|---|
| अध्याय ९ |
(१) ज्ञातिसामन्तधनिकाः क्रमेण भूमिपरिग्रहान् क्रेतुमभ्याभवेयुः । ततोऽन्ये बाह्याः ।
(२) सामन्तचत्वारिंशत्कुल्या गृहप्रतिमुखे वेश्म श्रावयेयुः । सामन्त-ग्रामवृद्धेषु क्षेत्रमारामं सेतुबन्धं तटाकमाधारं वा मर्यादासु यथासेतुभोगम् । 'अनेनार्घेण कः क्रेता' इति त्रिराघुषितमव्याहतं क्रेता क्रेतुं लभेत ।
(३) स्पर्धया वा मूल्यवर्धने मूल्यवृद्धिः सशुल्का कोशं गच्छेत् । विक्रय-प्रतिक्रोष्टा शुल्कं दद्यात् ।
(४) अस्वामिप्रतिक्रोशे चतुर्विंशतिपणो दण्डः । सप्तरात्रादूर्ध्वमनभि-
वास्तुक
मकान बेचना, सीमाविवाद, खेतों की सीमाएँ, मिश्रित विवाद, कर की छूट
(१) मकान बेचना—यदि मकान बेचना हो तो मकान मालिक को चाहिए कि क्रमशः वह अपने कुटुम्बी, गाँव का मुखिया और धनाढ्य से पूछे । यदि वे खरीदने से इनकार कर दें तब बाहर के लोगों से बातचीत चलायी जाय ।
(२) दूसरे गाँवों के मुखिया तथा उनके चालीस कुल तक के पुरुषों को, मकान के सामने ही मकान की कीमत सुनाई जाय । गाँव के मुखिया तथा अन्य वृद्ध पुरुषों के सामने खेत, बाग, सीमबन्ध, तालाब और हौज आदि की मर्यादा के अनुसार कीमत निर्धारित करे 'इस मकान की इतनी कीमत है; इसको कौन खरीदना चाहता है ?' इस प्रकार तीन बार आवाज लगाने पर जो भी खरीदार बोली बोले, उसको बेरोक-टोक मकान बेच देना चाहिए ।
(३) खरीददारों की होड़ के कारण बोली बढ़ जाय तो वह बढ़ा हुआ मूल्य शुल्क सहित सरकारी खजाने में जमा किया जाय । बेचने वाले से वह शुल्क वसूल किया जाय ।
(४) मकान मालिक की अनुपस्थिति में उसके मकान का नीलाम करने वाले पर चौबीस पण दण्ड किया जाय । सूचना देने पर भी सात दिन के भीतर यदि
१९ कौ०
२९० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
सरतः प्रतिक्रुष्टो विक्रीणीत । प्रतिक्रुष्टातिक्रमे वास्तुनि द्विशतो दण्डः, अन्यत्र चतुर्विंशतिपणो दण्डः । इति वास्तुविक्रयः ।
(१) सीमविवादं ग्रामयोरुभयोः सामन्ता पञ्चग्रामी दशग्रामी वा सेतुभिः स्थावरैः कृत्रिमैर्वा कुर्यात् ।
(२) कर्षकगोपालवृद्धकाः पूर्वभुक्तिका वा, अबाह्याः सेतुनामभिज्ञा बहव एको वा निर्दिश्य सीमसेतून् विपरीतवेषाः सीमानं नयेयुः । उद्दिष्टानां सेतुनामदर्शने सहस्रदण्डः । तदेव नीते सीमापहारिणां सेतुच्छिदां च कुर्यात् ।
(३) प्रनष्टसेतुभोगं वा सीमानं राजा यथोपकारं विभजेत् ।
(४) क्षेत्रविवादं सामन्तग्रामवृद्धाः कुर्युः । तेषां द्वैधीभावे यतो बहवः शुचयोऽनुमता वा ततो नियच्छेयुः । मध्यं वा गृह्णीयुः । तदुभयं परोक्तं वास्तु राजा हरेत् प्रनष्टस्वामिकं च । यथोपकारं वा विभजेत् ।
मकान मालिक उपस्थित न हो तो उसकी अनुपस्थिति में ही नीलाम करने वाला मकान बेच दे । बोली बोल देने के बाद यदि कोई व्यक्ति मकान लेने से मुकर जाय तो उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । मकान के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं के सम्बन्ध में चौबीस पण दण्ड किया जाय । यहाँ तक मकान बेचने के सम्बन्ध में कहा गया ।
( १ ) सीमा-विवाद—दो गाँवों के झगड़ों को उन गाँवों के मुखिया या आस-पास के पाँच-पाँच, दस-दस गाँवों के मुखिया आपस में मिलकर निबटायें; दो गाँवों के बीच वे स्थायी या अस्थायी हदबन्दी कायम कर दें ।
( २ ) गाँव के किसान, ग्वाले, वृद्ध तथा बाहर के अन्य अनुभवी, एक या अनेक पुरुष, जो शरहद की ठयेबन्दी से परिचित न हों, अपना वेश बदल कर वे सीमा के चिह्नों का पता लगायें और तब सीमाएँ निर्धारित करें । निर्णय किये हुए या बताये गए सीमा-चिह्नों के न देखे जाने पर अपराधी पर एक हजार पण दण्ड किया जाय । जो सीमा की भूमि का अपहरण करे या उसके चिह्नों को काटे, उसे भी यही दण्ड दिया जाय ।
( ३ ) जहाँ पर कि सीमा के चिह्न सर्वथा मिट गए हों और निर्णय के लिए कोई आधार नजर न आये, वहाँ पर राजा स्वयं इस प्रकार का सीमा-विभाग करे, जिससे कि किसी भी ग्रामवासी को कोई हानि न उठानी पड़े ।
( ४ ) खेतों की सीमाएँ—खेतों के झगड़े का निबटारा गाँव के मुखिया तथा वृद्ध पुरुष करें । यदि उनका आपस में मतभेद हो जाय तो वे धार्मिक पुरुष उसका निर्णय करें, जिनको प्रजा स्वीकार करती हो या किसी दूसरे को मध्यस्थ बना कर निर्णय किया जाय । यदि इन दोनों अवस्थाओं में भी कुछ निर्णय न हो सके तो उन विवादग्रस्त खेतों को राजा अपने कब्जे में ले ले और उस सम्पत्ति को भी राजा ले
प्र० ६५ : अ० ६ ] वास्तुक ( २ ) २९१
(१) प्रसह्यादाने वास्तुनि स्तेयदण्डः । कारणादाने प्रयासमाजीवं च परिसङ्ख्याय बन्धं दद्यात् । मर्यादापहरणे पूर्वः साहसदण्डः । मर्यादाभेदे चतुर्विंशतिपणः ।
(२) तेन तपोवनविवीतमहापथश्मशानदेवकुलयजनपुण्यस्थानविवादा व्याख्याताः । इति मर्यादास्थापनम् ।
(३) सर्व एव विवादाः सामन्तप्रत्ययाः । विवीतस्थलकेदारषण्डखल-वेश्मवाहनकोष्ठानं पूर्वं पूर्वमाबाधं सहेत ।
(४) ब्रह्मसोमारण्यदेवयजनपुण्यस्थानवर्जः स्थलप्रदेशः ।
(५) आधारपरिवाहकेदारोपभोगैः परक्षेत्रकृष्टबीजहिंसायां यथोपघातं मूल्यं दद्युः । केदारारामसेतुबन्धानां परस्परहिंसायां हिंसाद्विगुणो दण्डः ।
ले, जिसका कोई वारिस न हो । या जनता की लाभ की दृष्टि से उनका यथोचित विभाग कर दे ।
( १ ) जो व्यक्ति मकान, भूमि आदि अचल सम्पत्ति पर नाजायज कब्जा करे उसे चोरी का दण्ड किया जाय । किन्तु, यदि ऋण आदि के बदले कब्जा करे तो कब्जेदार को चाहिए कि वह सम्पत्ति के मालिक के शारीरिक श्रम का फल और कर्जे की अपेक्षा सम्पत्ति का जो अधिक मूल्य बैठे, उसका हिसाब मालिक को अदा कर दे । सीमाबन्दी को सरकाने पर प्रथम साहस दण्ड और सीमा-चिह्नों को मिटाने पर चौबीस पण दण्ड दिया जाय ।
( २ ) इसी प्रकार तपोवन, चारागाह, बड़ी सड़कें, श्मशान, देवालय, यज्ञस्थान और दूसरे पुण्यस्थानों के विवादास्पद विषयों का भी निर्णय करना चाहिए । यहाँ तक सीमाविषयक विवाद पर निर्णय का विधान वर्णन किया गया ।
( ३ ) मिश्रित विवाद—सब तरह के विवादों का निर्णय मुखिया ( सामन्त ) लोगों को करना चाहिए । चरागाह, खेती योग्य जमीन, खलिहान, मकान और घुड़साल, इनके सम्बन्ध में विवाद उपस्थित होने पर क्रमशः पहिले को प्रधानता देते हुए निर्णय किया जाय ।
( ४ ) ब्रह्मारण्य, सोमारण्य, देवस्थान, यज्ञस्थान और अन्य पुण्यस्थानों को छोड़कर आवश्यकता होने पर सभी जगह खेती करायी जा सकती है ।
( ५ ) जलाशय, क्यारी तथा नाली बनाते समय यदि किसी के बीज बोये खेत का नुकसान हो जाय तो हानि के अनुसार उसका मूल्य चुका देना चाहिए । यदि कोई व्यक्ति खेत, बाग-बगीचा और सीमाबन्ध आदि को एक-दूसरे के बदले में नुकसान पहुँचायें तो उन्हें नुकसान का दुगुना दण्ड देना चाहिए ।
| २९२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ तीसरा अधिकरण |
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(१) पश्चान्निविष्टमधरतटाकं नोपरितटाकस्य केदारमुदकेनाप्लावयेत् । उपरि निविष्टं नाधरतटाकस्य पूरस्स्रावं वारयेद् अन्यत्र त्रिवर्षोपरतकर्मणः । तस्यातिक्रमे पूर्वः साहसदण्डस्तटाकवामनं च ।
(२) पञ्चवर्षोपरतकर्मणः सेतुबन्धस्य स्वाम्यं लुप्येतान्यत्रापद्भ्यः ।
(३) तटाकसेतुबन्धानां नवप्रवर्तने पाञ्चवार्षिकः परिहारः । भग्नोत्सृष्टानां चातुर्वार्षिकः समुपारूढानां त्रैवार्षिकः । स्थलस्य द्वैवार्षिकः । स्वातमाधाने विक्रये च ।
(४) खातप्रावृत्तिमन्नदीनिबन्धायतनतटाककेदारारामषण्डवापानां सस्यवर्णभागोत्तरिकम्, अन्येभ्यो वा यथोपकारं दद्युः ।
(५) प्रक्रयाविक्रयाधिभागभोगनिसृष्टोपभोक्तारश्चैषां प्रतिकुर्युः । अप्रतीकारे हीनद्विगुणो दण्डः ।
( १ ) बाद में बने हुए नीचे के तालाब से सींचे जाने वाले खेत को ऊपर के तालाब के पानी से न सींचा जाय । नीचे के तालाब में आते हुए ऊपर के तालाब का पानी तब तक न रोका जाय, यदि नीचे का तालाब तीन वर्ष तक बेकार न पड़ा हो । इस नियम का उल्लंघन करने वाले को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय और उसके तालाब का पानी निकलवा दिया जाय ।
( २ ) पाँच वर्ष तक यदि जल आदि का कोई सीमाबन्ध बेकार रहे उस दशा में उस पर उसके स्वामी का हक नहीं रहता है; किन्तु विपत्तियों के कारण यदि उसको उपयोग में न लाया गया हो तो कोई बात नहीं ।
( ३ ) कर की छूट—नये शिरे से तालाब और सीमाबन्ध बनवाने वाले व्यक्ति पर पाँच वर्ष तक सरकारी टैक्स न लगाया जाय । यदि वह जीर्णोद्धार कराये तो चार वर्ष तक; यदि उनको बढ़ाये तो तीन वर्ष तक सरकारी टैक्स न लिया जाय । इसी प्रकार भूमि को गिरवी रखने और बेचने पर दो वर्ष तक सरकारी टैक्स न लिया जाय ।
( ४ ) जिन तालाबों में नदी का पानी न आता हो और किसान रहट आदि लगाकर अपने खेतों, बगीचों तथा फुलवाड़ियों में से पानी देते हों उनकी उपज पर सरकार उतना ही कर लगाये जितने से उन लोगों को कोई कष्ट न हो ।
( ५ ) जिन किसानों के तालाब नहीं हैं वे भी कीमत देकर, कुछ बंधी हुई रकम देकर, अपनी उपज का कुछ हिस्सा देकर अथवा मालिक की आज्ञा से दूसरे तालाबों से पानी ले सकते हैं । किन्तु उनके लिए यह आवश्यक है कि वे तालाब, रहट आदि की बराबर मरम्मत करते रहें । मरम्मत न करने पर जो नुकसान होगा उसका दुगुना जुर्म उन्हें भुगतना पड़ेगा ।