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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 359 of 918

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Page 359
प्रकरण ६१# दायविभागे दायक्रमः
अध्याय ५

(१) अनीश्वराः पितृमन्तः स्थितपितृमातृकाः पुत्राः। तेषामूर्ध्वं पितृतो दायविभागः पितृद्रव्याणाम्। स्वयमर्जितमविभाज्यम् अन्यत्र पितृद्रव्यादुत्थितेभ्यः।

(२) पितृद्रव्यादविभक्तोपगतानां पुत्राः पौत्रा वा आ चतुर्थादित्यंशभाजः। तावदविच्छिन्नः पिण्डो भवति। विच्छिन्नपिण्डाः सर्वे समं विभजेरन्।

(३) अपितृद्रव्या विभक्तपितृद्रव्या वा सहजीवन्तः पुनर्विभजेरन्। यतश्चोत्तिष्ठेत स द्वयंशं लभेत।

(४) द्रव्यमपुत्रस्य सोदर्या भ्रातरः सहजीविनो वा हरेयुः कन्याश्च।


दाय विभाग

उत्तराधिकार का सामान्य नियम

(१) माता-पिता या केवल पिता के जीवित रहते लड़के संपत्ति के अधिकारी नहीं होते हैं। उनके न रहने पर लड़के आपस में संपत्ति का बँटवारा कर सकते हैं; जो संपत्ति किसी लड़के ने स्वयं अर्जित की है उसका बंटवारा नहीं होता है, यदि वह संपत्ति पिता का धन खर्च करके उपार्जित हो तो उसका बंटवारा हो सकता है।

(२) संयुक्त परिवार में रहने वाले पुत्रों के पुत्र-पौत्र आदि चौथी पीढ़ी तक अविभाजित पैतृक संपत्ति के बराबर के हकदार हैं। किन्तु यह जरूरी है कि उनकी वंशपरंपरा खंडित न हुई हो। यदि वंश-परंपरा खंडित हो गई हो तो उस दशा में सभी मौजूद भाई पैतृक संपत्ति का बराबर हिस्सा करें।

(३) जिन भाइयों को पिता की संपत्ति प्राप्त न हुई हो, अथवा जो भाई बँटवारा हो जाने के बाद भी एक साथ खाते-कमाते हों, वे फिर से संपत्ति का विभाग कर सकते हैं। जिस भाई के कारण संपत्ति की अधिक वृद्धि हुई हो वह बंटवारे के समय दो हिस्सा ले सकता है।

(४) जिसके कोई पुत्र न हों उसकी संपत्ति उसके सगे भाई या साथी ले सकते हैं, और विवाहादि के लिए जितने धन की अपेक्षा हो, कन्यायें उतना धन अपनी पैतृक संपत्ति में से ले लें।