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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 358 of 918

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Page 358

२७४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

भर्मसमर्थं कनिष्ठमभार्यं वा । तदभावेऽप्यसोदर्यं सपिण्डं कुल्यं वा । आसन्न-
मेतेषाम् । एष एव क्रमः ।

(१) एतानुत्क्रम्य दायादान् वेदने जातकर्मणि ।
जारस्त्रीदातृवेत्तारः सम्प्राप्ताः सङ्ग्रहात्ययम् ।।

इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे विवाहसंयुक्ते निष्पतनं पथ्यनुसरणं
ह्रस्वप्रवासदीर्घप्रवासो नाम चतुर्थोऽध्यायः,
आदितः षष्टितमः ।

—: ० :—


एवं भरण-पोषण में समर्थ भाई के साथ विवाह कर ले; या जिस भाई की पत्नी न
हो उसके साथ विवाह कर ले । यदि पति का कोई सगा भाई न हो तो समान गोत्र
वाले उसके किसी पारिवारिक भाई साथ विवाह कर ले । कम से पति का जो नज-
दीक-से नजदीक का भाई हो, उसके साथ विवाह कर ले ।

( १ ) अपने पति की सम्पति के हकदार पुरुषों को छोड़कर यदि कोई स्त्री
किसी दूसरे पुरुष के साथ विवाह करे तो विवाह करने वाला पुरुष, वह स्त्री, उस
स्त्री को देने वाला, उस विवाह में शामिल होने वाले, ये सभी लोग, स्त्री को बह-
काने या अनुचित ढंग से उसको अपने काबू में करने के जुर्मदार समझे जाँय और
उनको यथोचित दण्ड दिया जाय ।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में चौथा अध्याय समाप्त ।

—: ० :—