Skip to content
SarvaKosh
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 357 of 918

Read in context
Page 357

प्र० ६० : अ० ४ ] विवाह सम्बन्ध ( ३ ) २७३

(१) कुटुम्बर्द्धिलोपे वा सुखावस्थैर्विमुक्ता यथेष्टं विन्देत जीवितार्थ-
मापद्गता वा ।
(२) धर्मविवाहात् कुमारी परिग्रहीतारमनाख्याय प्रोषितमश्रूयमाणं
सप्त तीर्थान्याकाङ्क्षेत, संवत्सरं श्रूयमाणम् । आख्याय प्रोषितमश्रूयमाणं
पञ्चतीर्थान्याकाङ्क्षेत, दश श्रूयमाणम् । एकदेशदत्तशुल्कं त्रीणि तीर्थान्या-
श्रूयमाणम्, श्रूयमाणं सप्त तीर्थान्याकाङ्क्षेत । दत्तशुल्कं पञ्च तीर्थान्य-
श्रूयमाणम्, दश श्रूयमाणम् । ततः परं धर्मस्थैर्विस्सृष्टा यथेष्टं विन्देत ।
तीर्थोपरोधो हि धर्मवधं इति कौटिल्यः ।
(३) दीर्घप्रवासिनः प्रव्रजितस्य प्रेतस्य वा भार्या सप्त तीर्थान्याका-
ङ्क्षेत, संवत्सरं प्रजाता । ततः पतिसोदर्य गच्छेत् । बहुषु प्रत्यासन्नं धार्मिकं

( १ ) कुटुम्बक्षय या समृद्ध बंधु-बांधवों के छोड़े जाने के कारण या विपत्ति की मारी हुई कोई भी प्रोषितपतिका जीवन-निर्वाह के लिए, अपनी इच्छा के अनुसार, दूसरा विवाह कर सकती है।

( २ ) चार प्रकार के धर्म-विवाहों के अनुसार जिस कुमारी का विवाह हुआ हो, और यदि उसका पति उससे बिना कहे ही परदेश चला जाय तो सात मासिक धर्म तक वह अपने पति की प्रतीक्षा करे। यदि उसकी कोई सूचना मिल गई हो तो एक वर्ष तक पत्नी उसकी प्रतीक्षा करे। यदि कहकर पति विदेश जाय और उसकी कोई खबर न मिले तो पाँच मासिक धर्म तक और मिल जाय तो दस मासिक धर्म तक उसकी इन्तजारी करे। विवाह के समय प्रतिज्ञात धन में से जिसने अपनी पत्नी को थोड़ा ही धन दिया हो और विदेश जाने पर उसकी कोई खबर न मिले तो तीन मासिक धर्म पर्यन्त; यदि खबर मिल जाय तो सात मासिक धर्म तक पत्नी उसकी प्रतीक्षा करे। जिस पति ने विवाह में प्रतिज्ञात सभी धन पत्नी को चुकता कर दिया हो, विदेश जाने पर उसकी कोई खबर न मिले तो पाँच मासिक धर्म तक और खबर मिल जाय तो दस मासिक धर्म तक उसकी प्रतीक्षा की जाय। इन सभी अवस्थाओं के बीत जाने पर कोई भी स्त्री धर्माधिकारी से आज्ञा लेकर अपनी इच्छा से अपना दूसरा विवाह कर सकती है। इस सम्बन्ध में आचार्य कौटिल्य का कथन है 'क्योंकि ऋतुकाल में स्त्री को पुरुष का सहवास न मिलना, धर्म का नाश हो जाने के बराबर, अमङ्गलकारी है'।

( ३ ) जिस स्त्री का पति संन्यासी हो गया हो या मर गया हो, उसकी स्त्री सात मासिकधर्म तक दूसरा विवाह न करे। यदि उसकी कोई सन्तान हो तो वह एक वर्ष तक ठहर जाय। उसके बाद वह अपने पति के सगे भाई के साथ विवाह कर ले। यदि ऐसे सगे भाई बहुत हों तो वह, पति के पीठ पीछे पैदा हुए धार्मिक

१८ कौ०