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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 365 of 918

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Page 365

प्र० ६२ : अ० ६ ] दायविभाग ( २ ) २८१

(१) ब्राह्मणस्यानन्तरापुत्रस्तुल्यांशः । क्षत्रियवैश्ययोरर्धांशः । तुल्यांशो वा मानुषोपेतः ।
(२) तुल्यातुल्ययोरेकपुत्रः सर्वं हरेद् बन्धूंश्च बिभृयात् ।
(३) ब्राह्मणानां तु पारशवस्तृतीयमंशं लभेत । द्वावंशौ सपिण्डः कुल्यो वासन्नः स्वधावानहेतोः । तदभावे पितुराचार्योऽन्तेवासी वा ।
(४) क्षेत्रे वा जनयेदस्य नियुक्तः क्षेत्रजं सुतम् ।
मातृबन्धुः सगोत्रो वा तस्मै तत् प्रदिशेद् धनम् ॥

इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे दायविभागे अंशविभागो नाम षष्ठोऽध्यायः, आदितो द्विषष्टितमः ।

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हों, तथा वैश्य की वैश्या और शूद्रा, दो ही पत्नियां हों तो उनके पुत्रों का दायविभाग भी उक्त विधि से ही समझ लेना चाहिए ।

( १ ) यदि किसी के ब्राह्मणी और क्षत्रिया से दो ही पुत्र पैदा हुए हों तो तो वे दोनों सम्पत्ति को बराबर बांट लें । इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य के घर में नीच जाति की स्त्री से उत्पन्न हुए लड़के, समान वर्ण की स्त्री से उत्पन्न हुए लड़के के हिस्से में से आधी बांट ले ले । जिसमें पौरुष हो वह बराबर का ही हिस्सा ले ।

( २ ) समान या असमान, किसी भी वर्ण की स्त्री से यदि लड़का पैदा हुआ हो तो वही पिता की सारी सम्पत्ति को ले ले; और अपने बन्धु-बांधवों का भरण-पोषण करे ।

( ३ ) ब्राह्मण से शूद्रा में उत्पन्न हुआ पुत्र ब्राह्मण की सम्पत्ति के तीसरे हिस्से को प्राप्त करे । यदि किसी मातृकुल की या निकट के खानदान की स्त्री से लड़का उत्पन्न हुआ हो तो वह दो भाग ले ले, जिससे कि वह मृत पिता का पिण्डदान कर सके । इन सब के न होने पर मृतक का आचार्य अथवा शिष्य उसकी सम्पत्ति का अधिकारी है ।

( ४ ) अथवा मृतक की स्त्री से नियोग द्वारा पैदा हुआ पुत्र या उसके मातृकुल के भाई अथवा समीप के रिश्तेदार, मृतक की सम्पत्ति के अधिकारी हैं ।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में दायविभाग-अंशविभाग नामक छठा अध्याय समाप्त ।

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