कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
About this granth
The Kautiliya Arthashastra (कौटिलीय अर्थशास्त्रम्) is the most detailed ancient Indian treatise on government, administration, economy, law and war. Tradition ascribes it to Kautilya (Chanakya, Vishnugupta), minister of Chandragupta Maurya. It is divided into fifteen books, covering the training of the king, the duties of departmental superintendents, civil and criminal justice, secret operations, the circle of neighbouring states, the six measures of foreign policy, calamities of the state, campaigns, battle, dealings with confederacies, the weaker king, the capture of forts, occult practices and the methods of the treatise itself.
This is No. 75 of the Vidyabhawan Sanskrit Granthamala, Chowkhamba Vidyabhawan, Varanasi, third edition 1984. It was edited with introduction, Hindi translation and glossary by Vachaspati Gairola of the Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad, and also includes the Chanakya Sutras. The book is dedicated to the memory of Mahamahopadhyaya T. Ganapati Shastri. Gairola's long introduction surveys early Indian assemblies such as the sabha and samiti and the growth of the state.
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में गोऽध्यक्ष नामक
प्र० ४५ : अ० २६ ] पशुविभाग का अध्यक्ष २२१
(१) पादोनमश्वतरगोखराणां, द्विगुणं महिषोष्ट्राणां कर्मकरबलीवर्दा-
नाम्। पायनाथं च धेनूनाम्। कर्मकालतः फलतश्च विधानम्। सर्वेषां
तृणोदकप्राकाम्यम्। इति गोमण्डलं व्याख्यातम्।
(२) पञ्चर्षभं खराश्वानामजावीनां दशर्षभम्।
शक्यं गोमहिषोष्ट्राणां यूथं कुर्याच्चतुर्वृषम्॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे गोऽध्यक्षो नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः,
आदित एकोनपञ्चाशः।
—: ० :—
सौ पल माँस एक आढक दही, एक द्रोण जौ या उड़द, इन सब चीजों का सांदा बनाकर भी दिया चाहिए, एक द्रोण दूध या आधा आढक सुरा, एक प्रस्थ तेल या घी, दस पल गुड़ और एक पल सोठ, इन सबको एकत्र करके बैलों को देना चाहिए।
(१) बैलों की इस खुराक का चतुर्थांश कम खुराक खच्चरों तथा गधों को, बैलों की दुगुनी खुराक भैंसों, ऊँटों एवं खेतों में काम करने वाले बैलों को, दूध देने वाली गायों को, देनी चाहिए। काम करने वाले बैलों और दूध देने वाली गायों की खुराक उनके कार्य एवं दूध के औसत के अनुसार ही दी जानी चाहिए। सभी पशुओं को उनकी इच्छानुसार भरपेट घास-पानी देना चाहिए। यहाँ तक गो आदि पशुओं की आहार-व्यवस्था बताई गई।
(२) एक सौ गदही तथा घोड़ियों के झुण्ड पाँच घोड़े, सौ भेड़-बकरियों में दस बकरे, सौ-सौ गाय, भैंस तथा ऊँटों के झुण्डों में चार-चार सांड, छोड़ने चाहिए।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में गोऽध्यक्ष नामक
उन्तीसवाँ अध्याय समाप्त।
—: ० :—
प्रकरण ४६
अध्याय ३०
अश्वाध्यक्षः
(१) अश्वाध्यक्षः पण्यागारिकं क्रयोपगतमाहवलब्धमाजातं साहा-
य्यागतं पणस्थितं यावत्कालिकं वाश्वपर्यग्रं कुलवयोवर्णचिह्नकर्मवर्गा-
गमैर्लेखयेत् ।
(२) अप्रशस्तन्यङ्गव्याधितांश्चावेदयेत् ।
(३) कोशकोष्ठागाराभ्यां च गृहीत्वा मासलाभमश्ववाहश्चिन्तयेत् ।
(४) अश्वविभवेनायतामश्वायामद्विगुणविस्तारां चतुर्द्वारोपावर्तन-
मध्यां सप्रग्रीवां प्रद्वारासनफलकयुक्तां वानरमयूरपृषतनकुलचकोरशुकशा-
रिकाभिराकीर्णां शालां निवेशयेत् ।
(५) अश्वायामचतुरश्रश्लक्ष्णफलकास्तारं सखादनकोष्ठकं समूत्र-
पुरीषोत्सर्गमेकैकशः प्राङ्मुखमुदङ्मुखं वा स्थानं निवेशयेत् । शालावशेन
वा दिग्विभागं कल्पयेत् । वडबावृषकिशोराणाम् एकान्तेषु ।
अश्वविभाग का अध्यक्ष
( १ ) अश्वशाला के अध्यक्ष को चाहिए कि वह, भेंटस्वरूप प्राप्त, खरीदे हुए, युद्ध में मिले हुए, अपने यहाँ पैदा हुए, बदले में प्राप्त, रेहन रखे हुए और कुछ समय के लिए सहायतार्थ प्राप्त, इन सभी प्रकार के घोड़ों को उनकी नस्ल, उम्र, रंग, चिह्न, समूह, कर्म और कहाँ से वे मिले हैं, इन सभी बातों का विवरण अपने रजि-स्टर में दर्ज करे ।
( २ ) बुरी नस्ल वाले, लंगड़े-लूले और बीमार घोड़ों को बदल देना चाहिए या उनका उचित इलाज करना चाहिए ।
( ३ ) कोष और कोष्ठागार से एक महीने का पूरा खर्च लेकर साईस को चाहिए कि वह सावधानीपूर्वक घोड़ों की टहल-सेवा करे ।
( ४ ) घोड़ों को रखने के लिये ऐसी घुड़साल बनवाई जाय, जो घोड़ों की संख्या के अनुसार लम्बी और घोड़ों की लम्बाई से दुगुनी चौड़ी हो, उसमें चार दरवाजे, काफी फैलाव, बड़ा बरामदा, दरवाजों के दोनों ओर चबूतरे हों और जो बन्दर, मोर, नेवला, चकोर, तोता तथा मैना आदि से घिरी हुई हो ।
( ५ ) घोड़े की लम्बाई-चौड़ाई के अनुसार एक समतल चौकोर तख्ता बिछा होना चाहिए । इसके अतिरिक्त घास-भूसा खाने के लिए लकड़ी की नाँद, पेशाब
प्र० ४६ : अ० ३० ] अश्वविभाग का अध्यक्ष २२३
(१) बडबायाः प्रजातायास्त्रिरात्रं घृतप्रस्थपानम् । अत ऊर्ध्वं सक्तु प्रस्थः स्नेहभैषज्यप्रतिपानं दशरात्रं, ततः पुलाको यवसमार्तवश्चाहारः ।
(२) दशरात्रादूर्ध्वं किशोरस्य घृतचतुर्भागः सक्तुकुडवः क्षीरप्रस्थ- श्चाहार आ षण्मासादिति । ततः परं मासोत्तरमर्धवृद्धैर्यवप्रस्थ आत्रि- वर्षाद्, द्रोण आ चतुर्वर्षादिति । अत ऊर्ध्वं चतुर्वर्षः पंचवर्षो वा कर्मण्यः पूर्णप्रमाणः ।
(३) द्वात्रिंशदङ्गुलं मुखमुत्तमाश्वस्य, पञ्चमुखान्यायामः, विंशत्य- ङ्गुला जङ्घा, चतुर्जङ्घ उत्सेधः । त्र्यङ्गुलावरं मध्यमावरयोः । शताङ्गुलः परिणाहः । पञ्चभागावरं मध्यमानरयोः ।
(४) उत्तमाश्वस्य द्विद्रोणं शालिव्रीहियवप्रियङ्गुणामर्धशुष्कमर्धसिद्धं
तथा लीद रखने का उचित प्रबन्ध होना चाहिए, घुड़सालों के दरवाजे पूरव तथा उत्तर की ओर होने चाहिएँ, घोड़ों को बाँधने के लिए अलग-अलग खूंटे होने चाहिएँ। घुड़साल, या तो राजमहल के उत्तर-पूरव में होनी चाहिए; यदि ऐसा सम्भव न हो तो सुविधानुसार उचित दिशाओं की ओर उनके दरवाजे बना दिए जाँय । प्रसवा घोड़ियों, साँड़, घोडों और छह मास से तीन वर्ष तक के बछेड़ों को बाँधने के लिए अलग-अलग स्थान होने चाहिएँ ।
( १ ) जब घोड़ी व्याये तो उसे तीन दिन तक एक प्रस्थ घी पीने के लिए दिया जाना चाहिए । तदनन्तर दस दिन तक उसे एक प्रस्थ सत्तू और चिकनाई में मिली दवा पीने के लिए दी जानी चाहिए । उसके बाद उसे अधपके जौ का साँदा, घास और ऋतु के अनुसार आहार देना चाहिए ।
( २ ) नये पैदा हुए घोड़ों के बछड़े को दस दिन बाद एक कुडव सत्तू में चौथाई घी मिला कर देना चाहिए । छह महीने तक उसे एक प्रस्थ दूध प्रतिदिन दिया जाना चाहिए । तदनन्तर उसको जौ का एक प्रस्थ और उसमें उत्तरोत्तर प्रतिमास आधा प्रस्थ बढ़ाकर तीन वर्ष तक यही आहार देना चाहिए । उसके बाद पूरे एक वर्ष तक प्रतिदिन उसे एक द्रोण आहार मिलना चाहिए । तब जाकर चार या पाँच वर्ष में वह पूरी तरह काम लेने लायक होता है ।
( ३ ) जिस घोड़े की खाब बत्तीस अंगुल, लम्बाई एक-सौ-साठ अंगुल, जंघा बीस अंगुल और ऊँचाई अस्सी अंगुल हो वह उत्तम होता है । उससे तीन अंगुल कम परिमाण का घोड़ा मध्यम और उससे भी तीन अंगुल कम परिमाण को घोड़ा अधम कोटि का समझना चाहिए । उत्तम घोड़े की मोटाई सौ अंगुल, मध्यम घोड़े की मोटाई अस्सी अंगुल और अधम घोड़े की मोटाई चौंसठ अंगुल होती है ।
( ४ ) उत्तम घोड़ों को साठी, चावल, गेहूँ, जौ, काकुन आदि में से कोई भी दो
२२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र . [ दूसरा अधिकरण
वा मुद्गमाषाणां वा पुलाकः । स्नेहप्रस्थश्च । पञ्चपलं लवणस्य । मांसं पञ्चाशत्पलिकम् । रसस्याढकं द्विगुणं वा दघ्नः पिण्डक्लेदनार्थम् । क्षारपञ्चपलिकः सुरायाः प्रस्थः पयसो वा द्विगुणः प्रतिपानम् । दीर्घपथभारक्लान्तानां च खादनार्थं स्नेहप्रस्थोऽनुवासनम् । कुडुबो नस्यकर्मणः । यवसस्यार्धभारः, तृणस्य द्विगुणः, षडरत्निपरिक्षेपः पुञ्जीलग्रहो वा ।
(१) पादावरमेतन्मध्यमावरयाः । उत्तमसमो रथ्यो वृषश्च मध्यमः । मध्यमसमश्चावरः पादहीनं वडवानां पारशमानां च । अतोऽर्धं किशोराणां च । इति विधायोगः ।
(२) विधापाचकमूत्रग्राहचिकित्सकाः प्रतिस्वादभाजः ।
(३) युद्धव्याधिजराकर्मक्षीणाः पिण्डगोचरिकाः स्युः । असमरप्रयोज्याः पौरजानपदानांर्थेन वृषा बडबास्वायोज्याः ।
द्रोण धान्य अधपका या अधसूखा, ख़ूराक में देना चाहिए; अथवा इतना ही मूंग या उड़द का साँदा बनाकर देना चाहिए । इसके अतिरिक्त एक प्रस्थ घी या तेल; पाँच पल नमक पचास पल मांस एक आढक शोरवा या दो आढक दही में भीगी हुई सानी, पाँच पल गुड़ के साथ एक प्रस्थ शराब अथवा दो प्रस्थ दूध, प्रतिदिन तीसरे पहर पीने के लिये दिया जाना चाहिए । लम्बा सफर और अधिक बोझा उठाने के कारण थके हुये घोड़ों को एक प्रस्थ घी या तेल और साथ ही उतने ही परिमाण की थकावट को दूर करने वाली दवाइयों का मिश्रण ( अनुवासन ) पिलाना चाहिए । एक कुडव घी या तेल उसके नाक में छोड़ना चाहिए, खाने के लिये उसको दस तुला भूसा, बीस तुला हरी घास या जई आदि देना चाहिए ।
( १ ) उत्तम घोड़े की उक्त ख़ूराक का चौथाई हिस्सा कम मध्यम घोड़े की और उसमें से भी चौथाई हिस्सा कम अधम घोड़े की ख़ूराक है । जो मध्यम घोड़ा रथ में जोता जाय तथा जो साँड़ घोड़ी पर छोड़ा गया हो उनको भी उत्तम घोड़े का आहार देना चाहिये । इसी प्रकार जो अधम घोड़े रथ में जोते जाँय या साँड़ छोड़े जाँय उनको मध्यम घोड़े का आहार देना चाहिए । इस आहार से चौथा हिस्सा कम घोड़ी और खच्चरों का आहार है । उसका आधा आहार बछड़ों को देना चाहिए । यही घोड़ों के आहार का विधान है ।
( २ ) घोड़ों की परिचर्या करने वाले साईसों और उनकी चिकित्सा करने वाले वैद्यों को भी घोड़े के आहार में से कुछ हिस्सा दिया जाना चाहिए ।
( ३ ) जो घोड़े युद्ध के कारण, बीमारी, बुढ़ापे और भार ढोने के कारण, अशक्त तथा बेकार हो चुके हैं, उन्हें उतना ही आहार दिया जाय कि वे भूखे न मर सकें । जो घोड़े हृष्ट-पुष्ट होकर भी युद्धोपयोगी न हों, उन्हें नगर तथा जनपद के निवासियों की घोड़ियों में नस्ल पैदा करने के लिए साँड़ बना दिया जाय ।
प्र० ४६ : अ० ३० ] अश्वविभाग का अध्यक्ष २२५
(१) प्रयोग्यानामुत्तमाः काम्बोजकसैन्धवारट्टजवानायुजाः । मध्यमा बाह्लीकपापेयकसौवीरकतैतलाः । शेषाः प्रत्यवराः ।
(२) तेषां तीक्ष्णभद्रमन्दवशेन सान्नाह्यमौपवाह्यकं वा कर्म प्रयोजयेत् । चतुरस्रं कर्माश्वस्य सान्नाह्यम् ।
(३) वल्गनो नीचैर्गतो लंघनो धोरणो नारोष्ट्रश्चौपवाह्याः ।
(४) तत्रौपवेणुको वर्धमानको यमक आलीढप्लुतः ( पृथ ? पूर्व )-गस्त्रिकचाली च वल्गनः ।
(५) स एव शिरःकर्णविशुद्धो नीचैर्गतः, षोडशमार्गो वा । प्रकीर्णकः प्रकीर्णोत्तरो निषण्णः पार्श्वानुवृत्त ऊर्मिमार्गः शरभक्रीडितः शरभप्लुतः
( १ ) चाल एवं कवायद में प्रवीण युद्धयोग्य घोड़ों में काबुल, सिंध, आरट्ट और अरब देशों के घोड़े उत्तम श्रेणी के हैं। व्यास, सतलज के मध्यवर्ती प्रदेश (बाह्लीक), पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त ( पापेयक ), राजस्थान और तितल देशों में उत्पन्न घोड़े मध्यम कोटि के होते हैं। इनके अतिरिक्त सभी घोड़े अधम कोटि में आते हैं ।
( २ ) तेज, मध्यम और मन्द गति के अनुसार ही घोड़ों को युद्धकार्यों और साधारण सवारी आदि कार्यों में प्रयुक्त करना चाहिये । विशेषज्ञों द्वारा युद्ध-सम्बन्धी हर प्रकार की चालों की शिक्षा दिलाना ही घोड़े का सन्नाह्य कर्म कहलाता है ।
( ३ ) सवारी या खेलों में प्रयुक्त किए जाने वाले घोड़ों की चाल के पांच भेद हैं : १. वल्गन, २. नीचैर्गत, ३. लंघन, ४. धोरण और ५. नारोष्ट्र ।
( ४ ) मण्डलाकार चक्कर लगाने को बल्गन कहते हैं । वह छह प्रकार का होता है : १. औपवेणुक ( एक हाथ के गोल घेरे में घूमना ), २. वर्धमानक ( उतने ही घेरे में कई बार घूमना ), ३. यमक ( बराबर के दो घेरों में एक साथ घूमना ), ४. आलीढप्लुत ( एक पैर को समेट कर और दूसरे पैर को फैलाकर छलांग मारना और तत्काल ही घूम जाना ) ५. पूर्वंग ( शरीर के अगले हिस्से के सहारे घूमना ) और ( ६ ) त्रिकचाली ( पुट्ठी और पिछली दो टांगों के सहारे घूमना ) ।
( ५ ) शिर और कान में किसी प्रकार की कंपन पैदा किए बिना ही गोल घेरे में चक्कर लगाना ही नीचैर्गत कहलाता है; उसके सोलह प्रकार हैं : १. प्रकीर्णक ( सभी चालें एक साथ मिली हुई होना ), २. प्रकीर्णोत्तर ( सभी चालें एक साथ मिली हुई होने पर भी एक चाल का मुख्य होना ), ३. निषण्ण ( पीठ पर कंपन किये बिना ही किसी विशेष चाल को निकालना ), ४. पार्श्वानुवृत्त ( एक ही ओर तिरछी चाल चलना ) ५. ऊर्मिमार्ग ( लहरों जैसी ऊँची-नीची चाल चलना ), ६. शरभक्रीडित ( तरुण हाथी की तरह क्रीडा करते हुए चलना), ७. शरभप्लुत ( तरुण हाथी की तरह कूद कर चलना ), ८, त्रिताल ( तीन पैरों से चलना ), ६. वाह्यानु-
१५ कौ०
२२६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
त्रितालो बाह्यानुवृत्तः पञ्चपाणिः सिंहायतः स्वाधूतः क्लिष्टः श्लिङ्गितो बृंहितः पुष्पाभिकीर्णश्चेति नीचैर्गतमार्गाः ।
(१) कपिप्लुतो भेकप्लुत एणप्लुत एकपादप्लुततः कोकिलसञ्चार्युरस्यो बकचारी च लङ्घनः ।
(२) काङ्को वारिकाङ्क्षो मायूरोऽर्धमायूरो नाकुलोऽधनाकुलो वाराहोऽर्धवाराहश्चेति धोरणः ।
(३) संज्ञाप्रतिकारो नारोष्ट्र इति ।
(४) षण्णव द्वादशेति योजनान्यध्वा रथ्यानाम् । पञ्च योजनान्यर्धाष्टमानि दशेति पृष्ठवाह्यानामश्वानामध्वा ।
वृत्त ( दायें-बायें घेरा बनाकर चलना ), १०. पंचपाणि ( पहिले तीन पैरों को एक साथ रखकर फिर एक पैर को दो बार रख कर चलना ), ११. सिंहायत ( शेर के समान लम्बी चाल भरना ), १२. स्वाधूत ( लम्बी कूद भरना ), १३. क्लिष्ट ( बिना सवार के ही चलना ), १४. श्लिंगित ( शरीर के अगले हिस्से को झुका कर चलना ), १५. बृंहित ( शरीर के अगले हिस्से को ऊँचा करके चलना ) और १६. पुष्पाभिकीर्ण ( टेढ़ी-मेढ़ी चाल चलना ) ।
( १ ) कूद कर चलने वाली चाल का नाम लंघन है; उसके सात प्रकार हैं : १. कपिप्लुत ( बन्दर की तरह कूद कर चलना ), २. भेकप्लुत ( मेढक की तरह उछल कर चलना ), ३. एणप्लुत ( हरिण की तरह छलांग मारकर चलना ), ४. एकपादप्लुत ( तीन पैरों को समेट कर एक पैर से ही छलांग मार कर चलना ), ५. कोकिलसंचारी ( कोयल की तरह फुदक कर चलना ), ६. उरस्य ( पैरों को समेट कर छाती के बल कूदकर चलना ) और ७. बकचारी ( बगुले की तरह बीच में धीरे-धीरे चलकर सहसा एक साथ कूदकर चलना ) ।
( २ ) धीरे-धीरे चलकर सहसा सरपट चाल से चलना धोरण गति कहलाती है; उसके आठ प्रकार हैं : १. कांक ( बगुले की चाल चलना ), २. वारिकांक्ष ( बत्तख की चाल चलना ), ३. मायूर ( मोर की चाल चलना ), ४. अर्धमायूर ( आधी चाल मोर की चलना ), ५. नाकुल (नेवले की चाल चलना), ६. अर्धनाकुल ( आधी चाल नेवले की चलना ), ७. वराह ( सुअर की चाल चलना ) और ८. अर्धवराह ( आधी चाल सुअर की चलना ) ।
( ३ ) सिखाये हुये इशारों पर चलना नारोष्ट्र चाल कहलाती है ।
( ४ ) रथ में जोते जाने योग्य अधम घोड़ों को छह योजन, मध्यम घोड़ों को नौ योजन और उत्तम घोड़ों को बारह योजन चलाये जाने के बाद विश्राम देना चाहिये; अधम, मध्यम और उत्तम किस्म के भार ढोने वाले घोड़ों को इसी क्रम से पाँच, साढे सात और दस योजन चलाने के बाद विश्राम देना चाहिए ।
प्र० ४६ : अ० ३० ] अश्वविभाग का अध्यक्ष २२७
(१) विक्रमो भद्राश्वासो भारवाह्य इति मार्गाः ।
(२) विक्रमो वल्गितमुपकण्ठमुपजवो जवश्च धाराः ।
(३) तेषां बन्धनोपकरणं योग्याचार्याः प्रतिदिशेयुः । साङ्ग्रामिकं रथाश्वालङ्कारं च सूताः । अश्वानां चिकित्सकाः शरीरह्लासवृद्धिप्रतीकारमृतुविभक्तं चाहारम् ।
(४) सूत्रग्राहकाश्वबन्धकयावसिकविधापाचकस्थानपालकेशकारजाङ्गलीविदश्च स्वकर्मभिरश्वानाराधयेयुः ।
(५) कर्मातिक्रमे चैषां दिवसवेतनच्छेदनं कुर्यात् । नीराजनोपरुद्धं वाहयतश्चिकित्सकोपरुद्धं वा द्वादशपणो दण्डः ।
(६) क्रियाभैषज्यसङ्गेन व्याधिवृद्धौ प्रतीकारद्विगुणो दण्डः । तदपराधेन वैलोम्ये पत्रमूल्यं दण्डः ।
( १ ) उक्त तीनों कोटि के घोड़ों की गति तीन प्रकार की होती है, यथा; १. मन्दगति, २. मध्यगति और ३. तीव्रगति ।
( २ ) मन्दगति से चलना, मध्यम गति से चलना, तीव्र गति से चलना, चौकन्ना होकर चलना, कूद-फाँदकर चलना, दायें-बायें होकर चलना, तेज-तेज चलना, इन सब तरह की चालों का नाम धारा है; धारा अर्थात् ढंग या क्रम ।
( ३ ) घोड़ों के विभिन्न अवयवों को किस प्रकार के आभूषणों से सजाना चाहिए, इसकी विधि, योग्य आचार्य बतलायें । युद्धोपयोगी घोड़ों और रथों को सजाने की सारी क्रिया का निर्देश सारथी करे । ऋतु के अनुसार घोड़ों का क्या-क्या आहार होना चाहिये एवं उनके मोटा होने या तंग होने का तरीका क्या है, इसका निर्देश अश्व-चिकित्सक करें ।
( ४ ) लगाम पहिना कर घोड़ों को टहलाने वाला नौकर, लगाम तथा जीन आदि चढ़ाने वाला कर्मचारी, घास खिलाने वाला नौकर, उनके लिये उड़द भूषा एवं चावल पकाने वाला रसोइया, घुड़साल की सफाई करने वाला व्यक्ति, घोड़ों के बाल तथा खुरें ठीक करने वाला नौकर और अश्वचिकित्सक; ये सभी नौकर-चाकर अपने-अपने कार्यों को नियत समय पर पूरा करते हुए घोड़ों की यथोचित परिचर्या करें ।
( ५ ) इनमें से जो भी कर्मचारी अपने कार्य को उचित रीति से न करे उसका उस दिन का वेतन काट लेना चाहिए । कुशल-क्षेम एवं बल-वृद्धि के लिए और चिकित्सा के लिए रोके गये घोड़ों को काम पर लगाने वाले व्यक्ति से बारह पण दण्डरूप में वसूल किए जाँय ।
( ६ ) घोड़ों की यथासमय चिकित्सा न करने के कारण यदि उनकी बीमारी बढ़ जाय तो इलाज में जितना व्यय हो, उसका दुगुना दण्ड अश्वशाला के अध्यक्ष
२२८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण
२२८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण
(१) तेन गोमण्डलं खरोष्ट्रमहिषमजाविकं च व्याख्यातम् ।
(२) द्विरह्नः स्नानमश्वानां गन्धमाल्यं च दापयेत् ।
कृष्णसन्धिषु भूतेज्याः शुक्लेषु स्वस्तिवाचनम् ॥
(३) नीराजनामाश्वयुजे कारयेन्नवमेऽहनि ।
यात्रादाववसाने वा व्याधौ वा शान्तिके रतः ॥इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणेऽश्वाध्यक्षो नाम त्रिंशोऽध्यायः, आदितः पञ्चाशः।
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पर करना चाहिए। यदि चिकित्सा और दवाई के दोष के कारण घोड़ा मर जाय तो जितनी कीमत का घोड़ा हो उतना दण्ड अश्वशाला के अध्यक्ष पर किया जाय ।
( १ ) घोड़ों की परिचर्या और चिकित्सा के लिए ऊपर जो नियम बताये गये हैं, गाय, बैल, गधा, ऊँट, भैंस और भेड़-बकरियों को परिचर्या चिकित्सा के सम्बन्ध में भी वही नियम समझने चाहिए; इनके सम्बन्ध में भी वही दण्ड-व्यवस्था है ।
( २ ) शरद और ग्रीष्म, दोनों ऋतुओं में घोड़ों को दो-दो बार नहलाना चाहिये । गन्ध और मालाएँ उन्हें प्रतिदिन दी जानी चाहिए । अमावस्था को घोड़ों के निमित्त भूतों को बलि देनी चाहिए । और पूर्णमासी को उनके कुशल-क्षेम के लिये स्वस्तिवाचन पढ़ा जाना चाहिए ।
( ३ ) आश्विन मास की नवमी को घोड़ों के स्वस्थ-नीरोग रहने के लिये नीराजना संस्कार करना चाहिए । यात्रा के आगे और यात्रा की समाप्ति पर और घोड़ों में कोई संक्रामक रोग फैलने पर भी नीराजना संस्कार करना चाहिए ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में अश्वाध्यक्ष नामक तीसवाँ अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ४७ | # हस्त्यध्यक्षः |
|---|---|
| अध्याय ३१ |
(१) हस्त्यध्यक्षो हस्तिवनरक्षां दम्यकर्मक्षान्तानां हस्तिहस्तिनीकलभानां शालास्थानशय्याकर्मविधायवसप्रमाणं कर्मस्वायोगं बन्धनोपकरणं साङ्ग्रामिकमलङ्कारं चिकित्सकानीकस्थोपस्थायुकवर्गं चानुतिष्ठेत् ।
(२) हस्त्यायामद्विगुणोत्सेधविष्कम्भायामां हस्तिनीस्थानाधिकां सप्रग्रीवां कुमारीसङ्ग्रहां प्राङ्मुखीमुदङ्मुखीं वा शालां निवेशयेत् ।
(३) हस्त्यायामचतुरश्रश्लक्ष्णालानस्तम्भफलकान्तरकं मूत्रपुरीषोत्सर्गस्थानं निवेशयेत् । स्थानसमशय्यामर्धापाश्रयां दुर्गे सान्नाह्योपवाह्यानां बहिर्दम्यव्यालानाम् ।
गजशाला का अध्यक्ष
(१) गजशाला के अध्यक्ष को चाहिए कि वह हाथियों के जंगल की रक्षा करे; सिखाये जाने योग्य हाथी-हथिनी और उनके बच्चों के लिए वह गजशाला, बाँधने, उठने-बैठने के यथोचित स्थान बनवाये; वही युद्ध-सम्बन्धी कार्य, पका हुआ भोजन और हरी घास-भूसा आदि के तौल का निर्णय करे; हाथियों को हर तरह की चाल चलना सिखाये; हाथियों के अम्बारी, अंकुश आदि साजों और युद्धसम्बन्धी आभूषणों का प्रबन्ध करे; हाथियों के चिकित्सक और उनकी सेवा-टहल करने वाले कर्मचारियों पर भी अध्यक्ष नजर रखे ।
(२) हाथी के लिए उसकी लम्बाई से दुगुनी ऊँची, दुगुनी चौड़ी और दुगुनी लम्बी गजशाला बनवानी चाहिए, हथिनी के रहने की गजशाला उससे छह हाथ अधिक लम्बी होनी चाहिए, गजशाला के आगे बरामदा, उसमें बाँधने के लिये तराजू के आकार के खूंटे (कुमारी) और उसके दरवाजे पूर्व या उत्तर की ओर होने चाहिए ।
(३) हाथी की लम्बाई जितना, चौकोर, चिकना एक खूंटा वहाँ गाड़ा जाय, खूंटा एक तख्ते के बीच में लगाकर गाड़ा जाय, जिससे ऊपर की जमीन ढकी रहे और खूंटे को उखाड़ा न जा सके; पाखाना और पेशाब के लिए पीछे की ओर ढलवां स्थान बनवाना चाहिए । हाथी के सोने-बैठने के लिए एक चबूतरा-सा बनवाया जाय, जिसकी ऊँचाई साढ़े चार हाथ होनी चाहिए । युद्ध तथा सवारी के उपयोगी हाथियों की शय्या किले के भीतर ही बनवाई जाय, जो हाथी अभी सिखवा या बनैले हों उन्हें किले के बाहर ही रखना चाहिए ।
२३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) प्रथमसप्तमावष्टमभागावह्नः स्नानकालौ, तदनन्तरं विधायाः । पूर्वाह्ने व्यायामकालः, पश्चादह्नः प्रतिपानकालः । रात्रिभागौ द्वौ स्वप्नकालौ, त्रिभागः संवेशनोत्थानिकः ।
(२) ग्रीष्मे ग्रहणकालः । विंशतिवर्षो ग्राह्यः ।
(३) विक्को मूढो मत्कुणो व्याधितो गर्भिणी धेनुका हस्तिनी चाग्राह्याः ।
(४) सप्तारत्निरुत्सेधो नवायामो दशपरिणाहः । प्रमाणतश्चत्वारिंशद्वर्षो भवत्युत्तमः । त्रिंशद्वर्षो मध्यमः । पञ्चविंशतिवर्षोऽवरः ।
(५) तयोः पादावरो विधाविधिः ।
(६) अरत्नौ तण्डुलद्रोणः । अर्धाढकं तैलस्य । सर्पिषस्त्रयः प्रस्थाः । दशपलं लवणस्य । मांसं पञ्चाशतपलिकम् । रसस्याढकं द्विगुणं वा दध्नः पिण्डक्लेदनार्थम् । क्षारं दशपलिकम् । मद्यस्य आढकं द्विगुणं वा पयसः प्रतिपानम् गात्रावसेकस्तैलप्रस्थः शिरसोऽष्टभागः प्रादीपकश्च । यवस्य द्वौ भारौ सपादौ शष्पस्य शुष्कस्यार्धतृतीयो भारः । कडङ्गारस्यानियमः ।
( १ ) एक दिन के, बराबर आठ भागों में पहिला तथा सातवाँ भाग हाथी के स्नान करने के लिये होना चाहिए। स्नान के बाद ( अर्थात् दूसरे और आठवें भाग में ) उन्हें पका खाना खिलाना चाहिए, दोपहर से पहिले उन्हें कवायद सिखानी चाहिए, दोपहर के बाद पीने के लिये देना चाहिए । रात के बराबर तीन भागों में से दो भाग सोने के लिए और एक भाग उठने-बैठने के लिए होना चाहिए ।
( २ ) गर्मी के मौसम में ही हाथियों को पकड़ना चाहिए । बीस वर्ष या उससे अधिक आयु का हाथी पकड़ने योग्य है ।
( ३ ) दूध पीने वाला हाथी ( विक्क ), हथिनी के समान दातों वाला ( मूढ ), जिसके दाँत न निकले हों ( मत्कुण ) बीमार हाथी और गर्भिणी तथा दूध चुराने वाली हथनी को न पकड़ना चाहिये ।
( ४ ) सात हाथ ऊँचा, नौ हाथ लम्बा और दस हाथ मोटा, चालीस वर्ष उम्र वाला हाथी सर्वोत्तम समझा जाता है । तीस वर्ष का मध्यम; और पच्चीस वर्ष का अधम माना गया है ।
( ५ ) उत्तम हाथी को जितना आहार दिया जाय उससे चौथाई हिस्सा कम मध्यम को और उससे भी चौथाई हिस्सा कम अधम को दिया जाना चाहिए ।
( ६ ) सात हाथ ऊँचे उत्तम हाथी को एक द्रोण चावल, आधा आढक तेल, तीन प्रस्थ घी, दस पल नमक, पचास पल मांस, एक आढक शोरवा या दो आढक दही में सना हुआ दाना दस पल गुड़, दोपहर के बाद पीने के लिए एक आढक शराब या उससे दुगुना दूध, शरीर के मलने के लिए एक प्रस्थ तेल, शिर में लगाने के लिए आधा कुडब तेल, इतना ही तेल रात को लगाने के लिए, चालीस तुला तृण, पचास
प्र० ४७ : अ० ३१ ] गजशाला का अध्यक्ष २३१
(१) सप्तारत्निना तुल्यभोजनोऽष्टारत्निरत्यरालः ।
(२) यथाहस्तमवशेषः षडरत्निः पञ्चारत्निश्च ।
(३) क्षीरयावसिको विक्कः क्रीडार्थं ग्राह्यः ।
(४) सञ्जातलोहिता प्रतिच्छन्ना संलिप्तपक्षा समकक्ष्या व्यतिकीर्णमांसा समतलपतला जातद्रोणिकेति शोभाः ।
(५) शोभावशेन व्यायामं भद्रं मन्दं च कारयेत् ।
मृगसङ्कीर्णलिङ्गं च कर्मस्वृतुवशेन वा ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे हस्त्यध्यक्षो नामैकत्रिंशोऽध्यायः,
आदित एकपञ्चाशः ।
— : ० : —
तुला हरी घास, साठ तुला रूखी घास और भूसा तथा पत्तियाँ जितना खा सके, खिलाना चाहिए ।
( १ ) आठ हाथ ऊँचे अत्यराल नामक हाथी को सात हाथ ऊँचे उत्तम हाथी के ही बराबर खाना दिया जाय ।
( २ ) छह हाथ ऊँचे हाथी मध्यम कोटि के हैं; उनका आहार उत्तम हाथी के आहार से चौथाई हिस्सा कम होना चाहिए; इसी प्रकार पाँच हाथ ऊँचे अधम श्रेणी के हाथियों के आहार मध्यम हाथियों के आहार से चौथाई हिस्सा कम होना चाहिए ।
( ३ ) दूध पीने वाले बच्चों को केवल क्रीडाकौतुक के लिए पकड़ा जाय और दूध, हरी घास या जई आदि के छोटे-छोटे ग्रास देकर उनका पालन-पोषण किया जाय ।
( ४ ) अवस्थानुसार हाथियों की सात प्रकार की शोभा मानी गई है; १. जब हाथियों के शरीर में केवल हड्डी, चमड़ा ही रह जाय; फिर धीरे-धीरे खूब संचरने लगे, इस शोभा को संजातलोहिता कहते हैं; २. जब मांस बढ़ने लगे, उस अवस्था की शोभा को प्रतिच्छन्ना कहते हैं; ३. जब दोनों ओर मांस भरने लगे, उस अवस्था को संलिप्तपक्षा कहते हैं; ४. जब सारे अवयवों में मांस भरने लगे, उस समय की शोभा को समकक्ष्या कहते हैं; ५. जब शरीर पर कहीं ऊँचा कहीं नीचा मांस दिखाई दे, उस शोभा को व्यतिकीर्णमांसा कहते हैं; ६. जब रीढ़ की हड्डी के बराबर मांस चढ़ जाय, उस अवस्था की शोभा को समतलपतला कहते हैं; और ७. जब मांस रीढ़ की हड्डी से ऊपर चढ़ जाय, उस शोभा का नाम जातिद्रोणिका है ।
( ५ ) इस प्रकार अवस्थाओं को ध्यान में रखकर हाथियों को कवायद सिखायी जाय । जिन हाथियों में उत्तम, मध्यम आदि सांकर्य लक्षण प्रकट हों, उनको युद्ध-सम्बन्धी कार्यों में लगाना चाहिए; अथवा ऋतुओं के अनुसार ही उन्हें युद्ध आदि कार्यों में लगाया जाय ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में एकतीसवाँ अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ४८ |
|---|
| अध्याय ३२ |
हस्त्यध्यक्षः हस्तिप्रचारश्च
(१) कर्मस्कन्धाः चत्वारः—दम्यः सान्नाह्य औपवाह्यो व्यालश्च।
(२) तत्र दम्यः पञ्चविधः—स्कन्धगतः स्तम्भगतो वारिगतोऽवपातगतो यूथगतश्चेति। तस्योपचारो विक्ककर्म।
(३) सान्नाह्यः सप्तक्रियापथः—उपस्थानं संवर्तनं संयानं वधावधो हस्तियुद्धं नागरायणं साङ्ग्रामिकं च। तस्योपविचारः कक्ष्याकर्म ग्रैवेयकर्म यूथकर्म च।
हाथियों की श्रेणियाँ तथा उनके कार्य
( १ ) कार्य-भेद से हाथियों की चार श्रेणियाँ होती हैं : १. दम्य ( शिक्षा देने योग्य ), २. सान्नाह्य ( युद्ध के योग्य ), ३. औपवाह्य ( सवारी के योग्य ) और ४. व्याल ( घातक वृत्तिवाला )।
( २ ) उनमें दम्य हाथी पाँच प्रकार का होता है : १. स्कंधगत ( जो सूंड का सहारा देकर सवार को अपने ऊपर बैठा ले ), २. स्तम्भगत ( जो हाथी खूंटे पर बँधा रह सके ), ३. वारिगत ( हाथियों की फँसाने वाली भूमि पर आ जाने वाला ), ४. अवपातगत ( हाथियों को फँसाने के लिए जंगलों में बनाये गये घास-फूस के गढों में आये हुये ) और ५. यूथगत (जो हथिनियों के साथ विहार करने के व्यसनी हों)। दम्य हाथी की परिचर्या हाथी के बच्चे के समान करनी चाहिए।
( ३ ) सान्नाह्य हाथी कार्य-भेद से सात प्रकार के होते हैं : १. उपस्थान ( आगे-पीछे के अङ्गों को ऊँचा-नीचा, छोटा-बड़ा करने वाला तथा रस्सी, बाँस, ध्वजा आदि को लांघने वाला ), २. संवर्त्तन ( सो जाने, बैठ जाने तथा कूदने-फाँदने वाला ), ३. संयान ( सीधी-बिरछी, गोलाकार चालों को समझने वाला ), ४. वधावध ( सूंड, दांत आदि से प्रहार करने या पकड़ देने वाला ), ५. हस्तियुद्ध ( हर प्रकार के हाथियों से लड़ने वाला ), ६. नगरायण ( नगर आदि को नष्ट करने वाला ) और ७. सांग्रामिक ( खुले आम युद्ध करने वाला )। सान्नाह्य हाथी को ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिये कि वह रस्सी बांधने, गले में फन्दा डालने और झुण्ड के अनुकूल कार्य करने में चतुर हो जाय।
प्र० ४८ : अ० ३२ ] हाथियों के कार्य २३३
( १ ) औपवाह्योऽष्टविधः—आचरणः, कुञ्जरोपवाह्यः, धोरणः, आधानगतिकः, यष्टचुपवाह्यः, तोत्रोपवाह्यः, शुद्धोपवाह्यः, मार्गायु-कश्चेति । तस्योपविचारः—शारदकर्म हीनकर्म नारोष्ट्रकर्म च ।
( २ ) व्याल एकक्रियापथः । तस्योपविचार आयम्यैकरक्षः कर्मशङ्कि-तोऽवरुद्धो विषमः प्रभिन्नः प्रभिन्नविनिश्चयः मदहेतुविनिश्चयश्च ।
( ३ ) क्रियाविपन्नो व्यालः । शुद्धः सुव्रतो विषमः सर्वदोषप्रदुष्टश्च ।
( ४ ) तेषां बन्धनोपकरणमनीकस्थप्रमाणम् । आलानग्रैवेयककक्ष्यापा-रायणपरिक्षेपोत्तरादिकं बन्धनम् । अंकुशवेणुयन्त्रादिकमुपकरणम् । वैज-
( १ ) औपवाह्य हाथी आठ प्रकार के होते हैं : १. आचरण ( उठने, बैठने, झुकने, मुड़ने आदि अनेक प्रकार की गतियों को जानने वाला ), २. कुंजरोपवाह्य ( दूसरे हाथियों के साथ चाल चलने वाला ), ३. धोरण ( एक ही ओर से अनेक प्रकार को चाल दिखाने वाला ), ४. आधानगतिक ( अनेक प्रकार की चाल चलने वाला ), ५. यष्टचुपवाह्य ( ताड़ने पर भी कार्य न करने वाला ), ६. तोत्रोपवाह्य ( बरछी मारने पर भी कार्य न करने वाला ), ७. शुद्धोपवाह्य ( बिना तोड़े, पैर के इशारे से ही कार्य करने वाला ) और ८. मार्गायुक्त ( शिकार सम्बन्धी कार्यों में निपुण ) । उनको शिक्षा देते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि जो हाथी अधिक मोटे हों उन्हें दुबला बनाया जाय, जो स्वस्थ हों उनकी रक्षा की जाय, जो मेहनत न करता हो उससे मेहनत करवाई जाय, इसी प्रकार प्रत्येक हाथी को हर प्रकार के इशारों की शिक्षा दी जानी चाहिए ।
( २ ) घातक ( व्याल ) हाथी से कार्य लेने का एक ही मार्ग है कि उसको बाँध कर रखा जाय या डण्डे के जोर पर उसे काबू में रखा जाय । उसके उपद्रवों से सावधान रहा जाय । उसके उपद्रव हैं : कवायद के समय बिगड़ जाना, कार्य की लापरवाही कर देना, मनमानी करना, उन्मत्त हो जाना, मद तथा आहार के लिए बेचैन हो जाना, और जिसके बिगड़ने का कारण पता ही न लगे ।
( ३ ) कार्य बिगाड़ देने वाले दुष्ट हाथी को व्याल कहते हैं । उसके चार भेद हैं : १. शुद्ध ( जो केवल मारने वाला हो ), २. सुव्रत ( जो ठीक से न चलता हो ), ३. विषम ( जो मारता भी हो और ठीक तरह से चलता भी न हो ) और ४. सर्वदोषप्रदुष्ट ( जिसमें सभी बुराइयाँ हों ) ।
( ४ ) हाथियों पर कसी जाने वाली सारी सामग्री की व्यवस्था, चतुर हस्ति-शिक्षकों की राय से करनी चाहिए । हाथियों पर कसने के लिए खूँटा ( आलान ), गले की जंजीर ( ग्रैवेयक ), काँख में बांधने को रस्सी ( कक्ष्या ), चढ़ते समय सहारा देने वाली रस्सी ( परायण ), हाथीं के पैर में बाँधने की जंजीर ( परिक्षेप ) और
२३४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
यन्तीक्षुरप्रमालास्तरणकुथादिकं भूषणम् । वर्मतोमरशरावापयन्त्रादिकः सांग्रामिकालङ्कारः ।
(१) चिकित्सकानीकस्थारोहकाधोरणहस्तिपकौचारिक विधापाचक-यावसिकपादपाशिककुटीरक्षकौपशायिकादिरौपस्थायिकवर्गः ।
(२) चिकित्सकुटीरक्षकविधापाचकाः प्रस्थौदनं स्नेहप्रसृतिं क्षार-लवणयोश्च द्विपलिकं हरेयुः । दशपलं मांसस्यान्यत्र चिकित्सकेभ्यः ।
(३) पथिव्याधिकर्ममदजराभितप्तानां चिकित्सकाः प्रतिकुर्य्युः ।
(४) स्थानस्याशुद्धिर्यवसस्याग्रहणं स्थले शयनमभागे घातः परा-रोहणमकाले यानमभूमावतीर्थेऽवतारणं तरुषण्ड इत्यत्ययस्थानानि । तमेषां भक्तवेतनादाददीत ।
उसके गले में बाँधने की रस्सी ( उत्तर ) । अंकुश, बाँस का डंडा और अम्बारी ( यन्त्र ) आदि उसके लिए अन्य उपकरण हैं । इसके अतिरिक्त वैजयन्ती ( हाथी के ऊपर लगाये जाने वाली पताका ), क्षुरप्रमाला ( उसको पहनाने की माला ), आस्त-रण ( अंबारी के नीचे का गद्दा ) और कुथ ( झूला ), यह सामग्री हाथियों को सजाने के लिए है । हाथियों के संग्राम-संबन्धी अलङ्करण हैं : कवच, तोमर, तूणीर और भिन्न-भिन्न प्रकार के हथियार ।
( १ ) गजवैद्य, गजशिक्षक, गजारोही, गजसंबन्धी शास्त्रोक्त विधियों का ज्ञाता, गजरक्षक, नहलाने-धुलाने वाला, खाना बनाने वाला, चारा देने वाला, बाँधने वाला, गजशाला का रक्षक और हाथी के सोने की जगह का प्रबन्ध करने वाला; ये सब हाथी की परिचर्या करने वाले कर्मचारी हैं ।
( २ ) गजवैद्य, गजशाला का रक्षक और हाथियों का रसोइया, ये तीनों हाथी के आहार में से एक प्रस्थ अन्न, आधी अञ्जली तेल या घी तथा दो पल गुड़ एवं नमक ले लिया करें । गजवैद्य को छोड़ कर बाकी दोनों सेवक दस-दस पल मांस भी ले लें ।
( ३ ) रास्ता चलने से, बीमारी के कारण, अधिक कार्य करने से, मद के कारण तथा बुढ़ापे की वजह से हाथियों को कोई भी कष्ट हो जाय तो गजवैद्य सावधानी से उनकी चिकित्सा करें ।
( ४ ) हाथी के स्थान की सफाई न करना, उसे खाना न देना, उसको खाली जगह सुला देना, उसके नाजुक स्थानों पर चोट मारना, किसी अनधिकारी व्यक्ति को उस पर चढ़ाना, बेसमय हाथी को चलाना, बिना घाट के ही उतार देना, घने पेड़ों के बीच हाथी को ले जाना; हाथियों के साथ इस प्रकार का व्यवहार करने वाले प्रत्येक कर्मचारी को दण्डित किया जाना चाहिए । यह दण्ड उनके भत्ते और वेतन में से काट लिया जाय ।
प्र० ४८ अ० ३२ ] हाथियों के कार्य २३५
(१) तिस्रो नीराजनाः कार्याश्चातुर्मास्यृतुसन्धिषु ।
भूतानां कृष्णसन्धीज्याः सेनान्यः शुक्लसन्धिषु ॥
(२) दन्तमूलपरीणाहद्विगुणं प्रोज्झ्य कल्पयेत् ।
अब्दे द्वयर्धे नदीजानां पञ्चाब्दे पर्वतौकसाम् ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे हस्तिप्रचारो नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः,
आदितः द्विपञ्चाशः ।
—: ० :—
( १ ) हाथियों की बल-वृद्धि और उनके कुशल क्षेम के लिए चार मास बाद ऋतु-संधि की तिथि पर वर्ष में तीन बार नीराजन कर्म कराया जाय; प्रत्येक अमावस्या पर भूतवलि और प्रत्येक पूर्णमासी पर स्कन्दपूजा भी करवाई जाय ।
( २ ) हाथी का दाँत जड़ में जितना मोटा हो, उससे दुगुना हिस्सा छोड़कर, आगे का बाकी हिस्सा कटा देना चाहिए । जो हाथी नदीचर हों, उनके दाँत ढाई वर्ष के बाद और जो हाथी पर्वतों के रैवासी हों उनके दाँत पाँच वर्ष के बाद और कटवाने चाहिए ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में हस्तिप्रचार नामक बत्तीसवाँ अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ४९-५० | # रथाध्यक्षः पत्त्यध्यक्ष सेनापतिप्रचारः |
|---|---|
| अध्याय ३३ |
(१) अश्वाध्यक्षेण रथाध्यक्षो व्याख्यातः ।
(२) स रथकर्मान्तान् कारयेत् ।
(३) दशपुरुषो द्वादशान्तरो रथः। तस्मादेकान्तरावरा आ षडन्त-
रादिति सप्त रथाः ।
(४) देवरथपुष्परथसाङ्ग्रामिकपारियाणिकपरपुराभियानिकवैनयि-
कांश्च रथान् कारयेत् ।
(५) इष्वस्त्रप्रहरणावर णोपकरणकल्पनाः सारथिरथिकरथ्यानां च
रथसेना तथा पैदलसेना के अध्यक्षों और सेनापति के कार्यों का निरूपण
( १ ) रथसेना के अध्यक्ष के कार्य : पिछले प्रकरण में अश्वशाला के अध्यक्ष के जो-जो कार्य बताये गये हैं, उन्हीं के अनुसार रथ का अध्यक्ष भी अपनी जुम्मेदारी के कार्यों की व्यवस्था करे ।
( २ ) उसको चाहिए कि वह नये-नये रथ बनवाये और जीर्ण हो जाने पर उनकी मरम्मत करवाये ।
( ३ ) एक सौ बीस अंगुल ऊँचा और उतना ही लम्बा रथ उत्तम कोटि का माना जाता है । सबसे बड़ा रथ बारह बित्ता लम्बा होता है, उसमें एक-एक बित्ता कम करके अन्त में सबसे छोटा रथ छह बित्ते का होता है । रथ सात प्रकार के होते हैं ।
( ४ ) रथाध्यक्ष को चाहिए कि वह विभिन्न कार्यों के उपयोगी देवरथ ( यात्रा, उत्सव आदि के लिए ), पुष्परथ ( विवाह आदि कार्यों के लिए ), साङ्ग्रामिक ( युद्ध आदि कार्यों के लिए ), पारियाणिक ( सामान्य यात्रा के लिए ), परपुराभियानिक ( शत्रु के दुर्ग को ढाहने के लिए ) और वैनयिक ( घोड़े आदि को सिखाने के लिए ) आदि अलग-अलग रथों का निर्माण करवाये ।
( ५ ) रथाध्यक्ष को चाहिए कि वह बाण, तूणीर, धनुष, अस्त्र, तोमर, गदा, रथ के झूलों, और लगाम आदि सामग्री के सम्बन्ध में तथा सारथि, रथ बनाने
प्र० ४९-५० : अ० ३३ ] सेनाध्यक्षों के कार्य २३७
कर्मस्वायोगं विद्यात् । आ कर्मभ्यश्च भक्तवेतनं भृतानामभृतानां च योग्या-
रक्षानुष्ठानमर्थमानकर्म च ।(१) एतेन पत्त्यध्यक्षो व्याख्यातः । स मौलभृतश्रेणिमित्रामित्राटवीब-
लानां सारफल्गुतां विद्यात् । निम्नस्थलप्रकाशकूटखनकाकाशदिवारात्रियुद्ध-
व्यायामं च विद्यात् । आयोगमयागं च कर्मसु ।(२) तदेव सेनापतिः सर्वयुद्धप्रहरणविद्याविनीतो हस्त्यश्वरथचर्या-
संघुष्टश्चतुरङ्गस्य बलस्यानुष्ठानाधिष्ठानं विद्यात् ।(३) स्वभूमिं युद्धकालं प्रत्यनीकमभिन्नभेदनं भिन्नसन्धानं संहतभेदनं
भिन्नवधं दुर्गवधं यात्राकालं च पश्येत् ।
वाला, रथ के घोड़े आदि के कार्यों की पूरी जानकारी रखे । रथाध्यक्ष का यह भी कर्तव्य है कि वह नियमित रूप से कार्य करने वाले तथा अस्थायी रूप से कार्य करने वाले कारीगरों एवं कर्मचारियों के उचित वेतन-भत्ता तथा निर्वाहयोग्य धन की व्यवस्था करे एवं उनका आदर-सत्कार करे ।
( १ ) पैदल सेना के अध्यक्ष के कार्य : रथ्याध्यक्ष के ही समान पत्त्यध्यक्ष की आरम्भिक कार्य-व्यवस्था को भी समझना चाहिए । इसके अतिरिक्त वह राजधानी की रक्षा करने वाली सेना ( मौलबल ), वेतनभोगी सेना ( भृतबल ), विभिन्न प्रदेशों में रखी गई सेना ( श्रेणिबल ), मित्रराजा की सेना ( मित्रबल ), शत्रुराजा की सेना ( अमित्रबल ) और जङ्गल की सुरक्षा के लिये नियुक्त सेना ( अटवीबल ) के सामर्थ्य-असामर्थ्य की पूरी जानकारी रखे । इसके अतिरिक्त वह, जङ्गल, तराई, मोर्चबंदी, छल-कपट, खाई, हवाई, दिन और रात आदि सभी प्रकार के युद्धों की जानकारी प्राप्त करे । देश-काल की दृष्टि से सेनाओं की उपयोगिता और अनुपयोगिता का भी वह ज्ञान रखे ।
( २ ) सेनापति के कार्य : सेनापति को चाहिये कि वह अश्वाध्यक्ष से लेकर पत्त्यध्यक्ष तक के सम्पूर्ण कार्य-व्यापार को भली भांति समझे, सेनापति को हर प्रकार के युद्ध करने, हथियार चलाने और आन्वीक्षिकी आदि शास्त्रों में पारंगत होना चाहिए, हाथी, घोड़े और रथ चलाने की भी पूरी योग्यता उसमें होनी चाहिए, चतुरङ्गिणी सेना के कार्य और स्थान की भी उसे पूरी जानकारी होनी चाहिए ।
( ३ ) इसके अतिरिक्त उसमें, अपनी भूमि, युद्धकाल, शत्रुसेना, शत्रुव्यूह का तोड़ना, बिखरी हुई सेना को समेटना, बिखरी हुई शत्रुसेना का मर्दन करना, दुर्ग तोड़ना और उचित समय पर युद्ध के लिये प्रस्थान करना, इन सभी बातों को समझने-करने की पूरी क्षमता होनी चाहिए ।
२३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) तूर्यध्वजपताकाभिर्व्यूहसंज्ञाः प्रकल्पयेत् ।
स्थाने याने प्रहरणे सैन्यानां विनये रतः ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयाऽधिकरणे रथाध्यक्षपत्त्यध्यक्ष-सेनापतिप्रचारो नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः, आदितस्त्रिपञ्चाशः ।
—: ० :—
( १ ) सेनापति को चाहिये कि युद्धकाल में अपनी सेना को संचालित करने के लिये वह चढ़ाई करने, कूच करने एवं धावा बोलने के लिये बाजे, ध्वजा तथा झण्डियों के द्वारा ऐसे इशारों का प्रयोग करे, जिन्हें शत्रुसेना न समझ सके ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में रथाध्यक्ष पत्त्यध्यक्ष सेनापति-प्रचार नामक तैंतीसवाँ अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ५१-५२ | # मुद्राध्यक्षः विवीताध्यक्षः |
|---|---|
| अध्याय ३४ |
(१) मुद्राध्यक्षो मुद्रां माषकेण दद्यात् ।
(२) समुद्रो जनपदं प्रवेष्टुं निष्क्रमितुं वा लभेत ।
(३) द्वादशपणममुद्रो जानपदो दद्यात् । कूटमुद्रायां पूर्वः साहसदण्डः । तिरोजनपदस्योत्तमः ।
(४) विवीताध्यक्षो मुद्रां पश्येत् ।
(५) भयान्तरेषु च विवीतं स्थापयेत् । चोरव्यालभयान्निम्नारणयानि शोधयेत् ।
मुद्राविभाग और चारागाहविभाग के अध्यक्ष
( १ ) मुद्रा-विभाग का अध्यक्ष : मुद्रा-विभाग के अध्यक्ष को चाहिए कि वह जनपद में आनेवाले और नगर से जानेवाले प्रत्येक व्यक्ति को राजकीय मुहर लगा हुआ पासपोर्ट दे तथा बदले में एक माषक टैक्स वसूल करे ।
( २ ) जिस व्यक्ति के पास पासपोर्ट हो वही जनपद में प्रवेश कर सकता है और वही जनपद से बाहर जा सकता है ।
( ३ ) अपने जनपद में रहनेवाला कोई पुरुष बिना पासपोर्ट के यदि प्रवेश करे या बाहर जाये तो उस पर बारह पण दण्ड किया जाना चाहिए । अपने ही राज्य का कोई व्यक्ति यदि जाली पासपोर्ट लेकर आना-जाना चाहे तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए, यदि दूसरे देश का व्यक्ति ऐसा करे तो उसे उत्तम साहस दण्ड देना चाहिए ।
( ४ ) चारागाह-विभाग का अध्यक्ष : विवीताध्यक्ष का कार्य है कि जो व्यक्ति बिना पासपोर्ट या जाली पासपोर्ट लेकर छिपे तौर से जङ्गलों के रास्ते होकर सफर करते हुए पकड़ा जाय उसको गिरफ्तार कर लें ।
( ५ ) जिन स्थानों से चोर, शत्रु या शत्रु के गुप्तचर आदि के आने-जाने की संभावना हो, ऐसे स्थानों पर चारागाह ( विवीत ) स्थापित किये जाँय । चोर और हिंसक जानवरों के संभावित घने जंगलों में भी खाइयाँ और गुफाएँ बनाकर निगरानी रखनी चाहिए ।
२४० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
२४० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) अनुदके कूपसेतुबन्धोत्सान् स्थापयेत्, पुष्पफलवाटांश्च।
(२) लुब्धकश्वगणिनः परिव्रजेयुररण्यानि। तस्करामित्राभ्यागमे शंखदुन्दुभिशब्दमग्राह्याः कुर्युः शैलवृक्षाधिरूढा वा शीघ्रवाहना वा।
(३) अमित्राटवीसंचारं च राज्ञो गृहकपोतैर्मुद्रायुक्तैर्हारयेयुः धूमाग्निपरम्परया वा।
(४) द्रव्यहस्तिवनाजीवं वर्तनीं चोररक्षणम्।
सार्थातिवाह्यं गोरक्ष्यं व्यवहारं च कारयेत्॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे मुद्राध्यक्ष-विवीताध्यक्षो नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः, आदितश्चतुष्पञ्चाशः।
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(१) जिस जगह पानी का अभाव हो वहाँ पक्के कुयें, पक्के तालाव, फूल तथा फलों के बगीचे और प्याऊ आदि की व्यवस्था की जाय।
(२) शिकारी और बहेलिये निरन्तर जंगलों में घूमते रहें। उन्हें चाहिए कि वे चोर या शत्रुओं के आने की सूचना पहाड़ पर या वृक्ष पर चढ़कर अथवा शंख-दुन्दुभी बजाकर अन्तपाल को पहुँचायें, अथवा शीघ्रगामी घोड़ों पर चढ़कर वे इस सूचना को अन्तपाल तक पहुँचावें।
(३) यदि जंगल में शत्रु आ जांय तो मुहर लगे पालतू कबूतरों के द्वारा उसका समाचार राजा तक पहुँचाया जाय, यदि रात को शत्रु जंगल में प्रवेश करें तो आग जलाकर और दिन में धुआँ लुङ्ग करके सूचित करें।
(४) विवीताध्यक्ष का कार्य है कि वह द्रव्यवनों और हस्तिवनों के घास, लकड़ी तथा कोयले आदि का भी प्रबन्ध करें, दुर्ग के रास्ते जाने का टैक्स, चोरों से की हुई रक्षा का टैक्स, गोरक्षा का टैक्स तथा इन सभी वस्तुओं के खरीद-फरोख्त का प्रबन्ध भी विवीताध्यक्ष ही करवाये।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में मुद्राध्यक्ष-विवीताध्यक्ष नामक चौतीसवाँ अध्याय समाप्त।
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