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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 311 of 918

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Page 311

प्र० ४६ : अ० ३० ] अश्वविभाग का अध्यक्ष २२७

(१) विक्रमो भद्राश्वासो भारवाह्य इति मार्गाः ।
(२) विक्रमो वल्गितमुपकण्ठमुपजवो जवश्च धाराः ।
(३) तेषां बन्धनोपकरणं योग्याचार्याः प्रतिदिशेयुः । साङ्ग्रामिकं रथाश्वालङ्कारं च सूताः । अश्वानां चिकित्सकाः शरीरह्लासवृद्धिप्रतीकारमृतुविभक्तं चाहारम् ।
(४) सूत्रग्राहकाश्वबन्धकयावसिकविधापाचकस्थानपालकेशकारजाङ्गलीविदश्च स्वकर्मभिरश्वानाराधयेयुः ।
(५) कर्मातिक्रमे चैषां दिवसवेतनच्छेदनं कुर्यात् । नीराजनोपरुद्धं वाहयतश्चिकित्सकोपरुद्धं वा द्वादशपणो दण्डः ।
(६) क्रियाभैषज्यसङ्गेन व्याधिवृद्धौ प्रतीकारद्विगुणो दण्डः । तदपराधेन वैलोम्ये पत्रमूल्यं दण्डः ।


( १ ) उक्त तीनों कोटि के घोड़ों की गति तीन प्रकार की होती है, यथा; १. मन्दगति, २. मध्यगति और ३. तीव्रगति ।

( २ ) मन्दगति से चलना, मध्यम गति से चलना, तीव्र गति से चलना, चौकन्ना होकर चलना, कूद-फाँदकर चलना, दायें-बायें होकर चलना, तेज-तेज चलना, इन सब तरह की चालों का नाम धारा है; धारा अर्थात् ढंग या क्रम ।

( ३ ) घोड़ों के विभिन्न अवयवों को किस प्रकार के आभूषणों से सजाना चाहिए, इसकी विधि, योग्य आचार्य बतलायें । युद्धोपयोगी घोड़ों और रथों को सजाने की सारी क्रिया का निर्देश सारथी करे । ऋतु के अनुसार घोड़ों का क्या-क्या आहार होना चाहिये एवं उनके मोटा होने या तंग होने का तरीका क्या है, इसका निर्देश अश्व-चिकित्सक करें ।

( ४ ) लगाम पहिना कर घोड़ों को टहलाने वाला नौकर, लगाम तथा जीन आदि चढ़ाने वाला कर्मचारी, घास खिलाने वाला नौकर, उनके लिये उड़द भूषा एवं चावल पकाने वाला रसोइया, घुड़साल की सफाई करने वाला व्यक्ति, घोड़ों के बाल तथा खुरें ठीक करने वाला नौकर और अश्वचिकित्सक; ये सभी नौकर-चाकर अपने-अपने कार्यों को नियत समय पर पूरा करते हुए घोड़ों की यथोचित परिचर्या करें ।

( ५ ) इनमें से जो भी कर्मचारी अपने कार्य को उचित रीति से न करे उसका उस दिन का वेतन काट लेना चाहिए । कुशल-क्षेम एवं बल-वृद्धि के लिए और चिकित्सा के लिए रोके गये घोड़ों को काम पर लगाने वाले व्यक्ति से बारह पण दण्डरूप में वसूल किए जाँय ।

( ६ ) घोड़ों की यथासमय चिकित्सा न करने के कारण यदि उनकी बीमारी बढ़ जाय तो इलाज में जितना व्यय हो, उसका दुगुना दण्ड अश्वशाला के अध्यक्ष