कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context| प्रकरण ४८ |
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| अध्याय ३२ |
हस्त्यध्यक्षः हस्तिप्रचारश्च
(१) कर्मस्कन्धाः चत्वारः—दम्यः सान्नाह्य औपवाह्यो व्यालश्च।
(२) तत्र दम्यः पञ्चविधः—स्कन्धगतः स्तम्भगतो वारिगतोऽवपातगतो यूथगतश्चेति। तस्योपचारो विक्ककर्म।
(३) सान्नाह्यः सप्तक्रियापथः—उपस्थानं संवर्तनं संयानं वधावधो हस्तियुद्धं नागरायणं साङ्ग्रामिकं च। तस्योपविचारः कक्ष्याकर्म ग्रैवेयकर्म यूथकर्म च।
हाथियों की श्रेणियाँ तथा उनके कार्य
( १ ) कार्य-भेद से हाथियों की चार श्रेणियाँ होती हैं : १. दम्य ( शिक्षा देने योग्य ), २. सान्नाह्य ( युद्ध के योग्य ), ३. औपवाह्य ( सवारी के योग्य ) और ४. व्याल ( घातक वृत्तिवाला )।
( २ ) उनमें दम्य हाथी पाँच प्रकार का होता है : १. स्कंधगत ( जो सूंड का सहारा देकर सवार को अपने ऊपर बैठा ले ), २. स्तम्भगत ( जो हाथी खूंटे पर बँधा रह सके ), ३. वारिगत ( हाथियों की फँसाने वाली भूमि पर आ जाने वाला ), ४. अवपातगत ( हाथियों को फँसाने के लिए जंगलों में बनाये गये घास-फूस के गढों में आये हुये ) और ५. यूथगत (जो हथिनियों के साथ विहार करने के व्यसनी हों)। दम्य हाथी की परिचर्या हाथी के बच्चे के समान करनी चाहिए।
( ३ ) सान्नाह्य हाथी कार्य-भेद से सात प्रकार के होते हैं : १. उपस्थान ( आगे-पीछे के अङ्गों को ऊँचा-नीचा, छोटा-बड़ा करने वाला तथा रस्सी, बाँस, ध्वजा आदि को लांघने वाला ), २. संवर्त्तन ( सो जाने, बैठ जाने तथा कूदने-फाँदने वाला ), ३. संयान ( सीधी-बिरछी, गोलाकार चालों को समझने वाला ), ४. वधावध ( सूंड, दांत आदि से प्रहार करने या पकड़ देने वाला ), ५. हस्तियुद्ध ( हर प्रकार के हाथियों से लड़ने वाला ), ६. नगरायण ( नगर आदि को नष्ट करने वाला ) और ७. सांग्रामिक ( खुले आम युद्ध करने वाला )। सान्नाह्य हाथी को ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिये कि वह रस्सी बांधने, गले में फन्दा डालने और झुण्ड के अनुकूल कार्य करने में चतुर हो जाय।