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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

About this granth

The Kautiliya Arthashastra (कौटिलीय अर्थशास्त्रम्) is the most detailed ancient Indian treatise on government, administration, economy, law and war. Tradition ascribes it to Kautilya (Chanakya, Vishnugupta), minister of Chandragupta Maurya. It is divided into fifteen books, covering the training of the king, the duties of departmental superintendents, civil and criminal justice, secret operations, the circle of neighbouring states, the six measures of foreign policy, calamities of the state, campaigns, battle, dealings with confederacies, the weaker king, the capture of forts, occult practices and the methods of the treatise itself.

This is No. 75 of the Vidyabhawan Sanskrit Granthamala, Chowkhamba Vidyabhawan, Varanasi, third edition 1984. It was edited with introduction, Hindi translation and glossary by Vachaspati Gairola of the Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad, and also includes the Chanakya Sutras. The book is dedicated to the memory of Mahamahopadhyaya T. Ganapati Shastri. Gairola's long introduction surveys early Indian assemblies such as the sabha and samiti and the growth of the state.

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प्र० ३१ : अ० १५ ] कोष्ठागाराध्यक्ष के कर्तव्य १६३

(१) अङ्गारांस्तुषान् लोहकर्मान्तभित्तिलेप्यानां हारयेत् । कणिकाः दासकर्मकरसूपकाराणाम् । अतोऽन्यदौदनिकापूपिकेभ्यः प्रयच्छेत् ।

(२) तुलामानभाण्डं रोचनीदृषन्मुसलोलूखलकुट्टकरोचकयन्त्रपत्रकशूर्पचालनिकाकण्डोलीपिटकसम्मार्जन्यश्चोपकरणानि ।

(३) मार्जकारक्षकधारकमापकमापकदायकदापकशलाकाप्रतिग्राहकदासकर्मकरवर्गश्च विष्टिः ।

(४) उच्चैर्धान्यस्य निक्षेपो मूताः क्षारस्य संहताः ।
मृत्काष्ठकोष्ठाः स्नेहस्य पृथिवी लवणस्य च ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे कोष्ठागाराध्यक्षो नाम पञ्चदशोऽध्यायः,
आदितः पञ्चत्रिंशः ।

—: ० :—


पक्षी हैं, उनको एक दिन खिलाकर, उसी अनुपात से उनकी खुराक निर्धारित कर लेनी चाहिए ।

( १ ) कोयला, चोकर और भूसी आदि सामग्री लुहारों तथा मकान पोतने वालों को दे देनी चाहिए । चावलों की कनकी क्रीतदासों, दूसरे कर्मकरों तथा रसोइयों को दे देनी चाहिए । इसके अतिरिक्त जो कुछ बचे, वह साधारण अन्न पकाने वालों तथा पकवान बनाने वाले नौकरों में वितरित कर देना चाहिए ।

( २ ) भोजनालय में नियमित रूप से उपयोग में आनेवाली सामग्री की तालिका इस प्रकार है : तराजू, बाट, चक्की, सिल-लोढ़ा, मूसल, ओखली, धान कूटने का मूसल, आटा पीसने की चक्की, सूप, छलनी, कडी, पिटारी और झाडू ।

( ३ ) झाडू लगाने वाला, कोष्ठागार का रक्षक, तौलने वाला, तुलवाने वाला अधिकारी, समान देने वाला, देने वाला अधिकारी, बोझ उठाने वाला, क्रीतदास और चाकर, ये सब विष्टि कहलाते हैं ।

( ४ ) अनाज को जमीन के स्पर्श से ऊपर रखना चाहिए; गुड़ और राख आदि चीजें ऐसी जगह रखनी चाहिए, जहाँ सील न पहुँच सके; घी और तेल के रखने के लिए मृतदान या लकड़ी के पात्र होने चाहिये; और नमक को जमीन पर किसी बर्तन पर रख लेना चाहिए ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में कोष्ठागाराध्यक्ष नामक
पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

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प्रकरण ३२
अध्याय १६

पण्याध्यक्षः

(१) पण्याध्यक्षः स्थलजलजानां नानाविधानां पण्यानां स्थलपथवारिपथोपयातानां सारफल्ग्वर्घान्तरं प्रियाप्रियता च विद्यात् । तथा विक्षेपसंक्षेपक्रयविक्रयप्रयोगकालान् ।
(२) यच्च पण्यं प्रचुरं स्यात्तदेकीकृत्यार्घमारोपयेत् । प्राप्तेऽर्घे वार्घान्तरं कारयेत् ।
(३) स्वभूमिजानां राजपण्यानामेकमुखं व्यवहारं स्थापयेत्, परभूमिजानामनेकमुखम् । उभयं च प्रजानामनुग्रहेण विक्रापयेत् । स्थूलमपि च लाभं प्रजानामौपघातिकं वारयेत् । अजस्रपण्यानां कालोपरोधं संकुलदोषं वा नोत्पादयेत् ।


पण्य का अध्यक्ष

(१) पण्य के अध्यक्ष को चाहिए कि वह स्थल-जल में उत्पन्न तथा स्थल-जलमार्ग से बिक्री के लिए आई हुई अनेक प्रकार की बहुमूल्य एवं अल्पमूल्य वस्तुओं के तारतम्य और उनकी लोकप्रियता ( माँग ) तथा अप्रियता ( अरुचि ) आदि के संबंध में अच्छी तरह जानकारी प्राप्त करे । उसको इस बात का भी पता होना चाहिए कि कम चीज को बढ़ाने, बढ़ी हुई को घटाने, बेची जाने योग्य वस्तु को खरीदने एवं खरीदी हुई वस्तु को बेच देने का उपयुक्त समय कौन है ।

(२) जो विक्रेय वस्तु अधिक तादात में उपलब्ध हो, पण्याध्यक्ष को चाहिए कि, उसे एकत्र कर व्यापार-कौशल से पहिले तो उसका दाम बढ़ा दे और जब समझ ले कि उसमें उचित लाभ हो गया है, तो फिर उसका भाव कम करके उसको बेचे ।

(३) अपने राज्य में उत्पन्न सरकारी वस्तुओं की बिक्री का प्रबंध एक ही जगह किसी नियत स्थान पर करना चाहिए । दूसरे देश में उत्पन्न वस्तुओं का विक्रय अनेक स्थानों में करना चाहिए । स्वदेश और परदेश की वस्तुओं की बिक्री का ऐसा प्रबंध करना चाहिए, जिससे प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट न हो । यदि किसी वस्तु में अधिक लाभ की संभावना हो, किन्तु उससे प्रजा को कष्ट पहुँचता हो, तो राजा को वह कार्य तत्काल रुकवा देना चाहिए । जल्दी ही बिक जाने योग्य वस्तुओं को रोके रखना अथवा उनको बेचने का ठेका किसी एक व्यक्ति को देकर पुनः लोभ-वश वह ठेका दूसरे को देना, सर्वथा अनुचित है ।

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प्र० ३२ : अ० १७ ] पण्य का अध्यक्ष १६५

(१) बहुमुखं वा राजपण्यं वैदेहकाः कृतार्थं विक्रीणीरन् । छेदानुरूपं च वैधरणं दद्युः ।
(२) षोडशभागो मानव्याजी । विंशतिभागस्तुलामानम् । गण्यपण्यानामेकादशभागः ।
(३) परभूमिजं पण्यमनुग्रहेणावाहयेत् । नाविकसार्थवाहेभ्यश्च परिहारमायतिकमं दद्यात् । अनभियोगश्चार्थिष्वागन्तूनामन्यत्रसभ्योपकारिभ्यः ।
(४) पण्याधिष्ठातारः पण्यमूल्यमेकमुखं काष्ठद्रोण्यामेकच्छिद्रापिधानायां निदध्युः । अह्नश्चाष्टमे भागे पण्याध्यक्षस्यार्पयेयुः इदं विक्रीतमिदं शेषमिति । तुलामानभाण्डकं चार्पयेयुः । इति स्वविषये व्याख्यातम् ।
(५) परविषये तु—पण्यप्रतिपण्ययोरर्घं मूल्यं च आगमय्य शुल्कवर्त्तन्यातिवाहिकगुल्मतरदेयभक्तभाटकव्ययशुद्धमुदयं पश्येत् । असत्युदये भाण्डनिर्वहणेन पण्यप्रतिपण्यार्घेण वा लाभं पश्येत् । ततः सारपादेन स्थलव्यवहारमध्वना क्षेमेण प्रयोजयेत् । अटव्यन्तपालपुरराष्ट्रमुख्यैश्च प्रतिसंसर्गं गच्छेदनुग्रहार्थम् ।


( १ ) अनेक स्थानों पर बिकने वाली राजकीय वस्तुओं को सभी व्यापारी एक ही भाव से बेचें । यदि बेचते-बेचते मूल्य में कुछ कमी हो जाये तो उस कमी को व्यापारी ही पूरा करें ।

( २ ) गोदाम में सुरक्षित माल का सोलहवाँ भाग कर रूप में राजा को देना चाहिए; उसे व्याजी या मानव्याजी कहा जाता है । तौले जाने वाले माल का बीसवाँ भाग और गिने जाने वाले माल का ग्यारहवाँ भाग राजा के लिए कर में देना चाहिए ।

( ३ ) विदेशी माल को मँगाने में कर आदि की कुछ रियायत होनी चाहिए । नाव तथा जहाज आदि से माल मँगाने वाले व्यापारियों पर राजकर की छूट होनी चाहिए । विदेश से आये व्यापारियों को भी राजा बिना ही अभियोग ( प्रतिषेध ) के ऋण देने की व्यवस्था करे; किन्तु विदेशी व्यापारियों के सहयोगियों पर अभियोग होना चाहिए ।

( ४ ) राजकीय वस्तुओं को बेचने वाले व्यापारी, सायंकाल आठवें पहर में पण्याध्यक्ष के पास बिक्री का सब रुपया, लकड़ी की एक बंद संदूकची में रख कर उपस्थित हों, और बतायें कि इतना माल बिक गया है यथा इतना बाकी है । माप तौल के बाँटों को भी पण्याध्यक्ष के सुपुर्द कर दें । यहाँ तक अपने राज्य की विक्रेय वस्तुओं के संबंध में कहा गया है ।

( ५ ) परदेश में किस रीति से व्यापार किया जाता है, उसका विधान इस प्रकार है : निर्यात-व्यापार के संबंध में पण्याध्यक्ष को पहिली बात तो यह समझनी चाहिए कि स्वदेश तथा विदेश में बेची जाने वाली किन चीजों के मूल्य में परस्पर न्यूनाधिक्य है; इसके अतिरिक्त बिक्रीकर, सीमांत अधिकारी का टैक्स, सुरक्षा के

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१६६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) आपदि सारमात्मानं वा मोक्षयेत् । आत्मनो वा भूमिमप्राप्तः सर्वदेयविशुद्धं व्यवहरेत् ।
(२) वारिपथे च यानभाटकपथ्यदनपण्यप्रतिपण्यार्घप्रमाणयात्राकाल-भयप्रतीकारपण्यपत्तनचारित्राण्युपलभेत ।
(३) नदीपथे च विज्ञाय व्यवहारं चरित्रतः ।
यतो लाभस्ततो गच्छेदलाभं परिवर्जयेत् ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे पण्याध्यक्षो नाम षोडशोऽध्यायः,
आदितः षट्त्रिंशः ।
— : ० : —

लिए पुलिस को मार्गकर, जंगल के रक्षक का कर, नदी पार करने का कर, अपने भोजनादि का व्यय और भाड़ा आदि निकाल कर कितना बच सकेगा; इस पर भी विचार करे । इस प्रकार हिसाब लगाने पर कुछ बचत न दीख पड़े तो अपने माल को विदेश में ले जाकर, भविष्य में लाभ की प्रतीक्षा करते हुए, उसके विक्रय की व्यवस्था करे; अथवा अपने माल से वहाँ के लोकप्रिय माल को बदल कर उस रूप में अपने लाभ की बात सोचे । यदि विचारित योजना सफल होती दिखाई दे तो लाभ का चौथा भाग व्यय करके सुरक्षित स्थल मार्ग के द्वारा व्यापार करना आरंभ कर दे । जंगल तथा सीमा के रक्षकों से, नगर-प्रधान और राष्ट्र के प्रतिष्ठित पुरुषों से घनिष्ठता बढ़ानी चाहिए, जिससे कि व्यापार में कोई बाधा न आने पावे ।

( १ ) विदेश मे व्यापार करते हुए यदि आपत्ति आ पड़े तो सर्वप्रथम रत्नों की और अपनी रक्षा करनी चाहिए । यदि दोनों की रक्षा संभव न हो तो रत्नों का लोभ छोड़ कर वह अपने को बचाये । जब तक वह अपने देश में न लौट आवे तब तक वहाँ के जो सरकारी टैक्स हो उनको नियमपूर्वक अदा करते हुए अपने व्यापार को संभाले रखे ।

( २ ) जल-मार्ग से व्यापार करने वाले व्यापारी को यानभाटक ( नाव तथा जहाज का किराया ); पथ्यदन ( मार्ग में खाने-पीने का खर्च ), पण्य तथा प्रतिपण्य के मूल का प्रमाण ( अपनी तथा पराई विक्रेय वस्तु के मूल्य का तारतम्य ), यात्रा-काल ( किस ऋतु में यात्रा करनी चाहिए, उसकी अवधि ), भयप्रतीकार ( चोर आदि से सुरक्षा के उपाय ), और गंतव्य देश के आचार-व्यवहारों की जानकारी आदि के संबंध में बारीकी से विचार करने के अनंतर ही यात्रा करनी चाहिए ।

( ३ ) इसी प्रकार नदी मार्ग के संबंध मे भी उक्त बातों को ध्यान में रखकर, गंतव्य देश के आचार-विचार, चरित्र आदि का ज्ञान प्राप्त कर, जिस मार्ग से अधिक लाभ की संभावना हो उसी का अनुसरण करे; जहां लाभ की आशा न हो, और कष्ट भी अधिक मिले, उस मार्ग को छोड़ देना चाहिए ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में पण्याध्यक्ष नामक सोलहवां अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ३३कुप्याध्यक्षः
अध्याय १७

(१) कुप्याध्यक्षो द्रव्यवनपालैः कुप्यमानाययेत् । द्रव्यवनकर्मान्तांश्च प्रयोजयेत् द्रव्यवनच्छिदां च देयमत्ययं च स्थापयेदन्यत्रापद्भ्यः ।
(२) कुप्यवर्गः—शाकतिनिशधन्वनार्जुनमधूकतल कसा लशिश पारिमे-दराजादनशिरीषखदिरसरलतालसर्जश्वकर्णसोमवल्ककश। म्नप्रियकधवादिः सारदारुवर्गः ।
(३) उटजचिमियचापवेणुवंश सातीनकण्टकभाल्लूकादिर्वेणुवर्गः ।
(४) वेत्रशीकवल्लीवाशीश्यामलतानागलतादिर्वल्लीवर्गः ।


कुप्य का अध्यक्ष

( १ ) कुप्य के अध्यक्ष को चाहिए कि वह जंगल की रक्षा में नियुक्त पुरुषों द्वारा बढ़िया-बढ़िया लकड़ी मंगवाये । लकड़ी से बनने योग्य दूसरे कार्यों को भी वही करवाये । लकड़ी काटकर जीविकोपार्जन करने वाले लोगों को वह वेतन पर नियुक्त कर ले और आज्ञा का उल्लंघन करने पर उनके लिए दण्ड भी निर्धारित कर ले; किन्तु किसी आपत्ति के कारण कार्य में विघ्न उपस्थित हो जाय तो उन्हें दण्ड न दिया जाय ।

( २ ) कुप्यवर्ग में सर्वप्रथम सारदारु वर्ग ( सर्वोत्तम लकड़ी ) का निरूपण किया जाता है : शाक ( सागून ), तिनिश ( तैहुँआ ), धन्वस ( पीपल ), अर्जुन, मधुक ( महुआ ), तिलक ( फरास ), साल, शिंशपा ( शीशम ), अरिमेद ( दुर्गन्धित खैर ), राजादन ( खिरनी ), शिरीष ( सिरसा ), खदिर ( खैर ), सरल ( देवदारु) ताल ( ताड़ ), सर्ज ( साल ), अश्वकर्ण ( बड़ा साल ), सोमवल्क ( सफेद खैर ), कश ( बबूल ), आम्र, प्रियक ( कदंब ), धव ( गूलर ) आदि सर्वोत्तम लकड़ी सारदारुवर्ग के अन्तर्गत हैं ।

( ३ ) उटज ( खोखला ), चिमिय ( ठोस ), चाप ( कुछ पोला और ऊपर से खुरदरा ), वेणु ( चिकना, पोला ), वंश ( लंबी पोरियों वाला ), सातीन, कंटक ( दोनों काँटेदार ) और भाल्लूक ( मोटा, लंबा, कंटकरहित ), ये सब बाँसों के भेद हैं ।

( ४ ) वेत्र ( बेंत ), शीकबल्ली ( हंसबल्ली ), वाशी ( सफेद फूलों की लता), श्यामलता ( काली लता ), नागलता, ( नागबल्ली ) आदि सब लताओं के भेद हैं ।

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१६८कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

(१) मालतीमूर्वार्कशणगवेथुकातस्यादिर्वल्कवर्गः ।
(२) मुञ्जबल्बजादि रज्जुभाण्डम् । तालीतालभूर्जानां पत्रम् । किंशुककुसुम्भकुङ्कुमानां पुष्पम् ।
(३) कन्दमूलफलादिरौषधवर्गः ।
(४) कालकूटवत्सनाभहालाहलमेषशृङ्गमुस्ताकुष्ठमहाविषवेल्लितक-गौराद्र्रबालकमार्कंटहैमवतकालिङ्गकदारदकाङ्कोलगरक्रोष्ट्रकादीनि विषाणि ।
(५) सर्पाः कीटाश्च । त एव कुम्भगताः । विषवर्गः ।
(६) गोधासेरकद्वीपिंशिशुमारसिंहव्याघ्रहस्तिमहिषचमरसृमरखड्ग-गोमृगगवयानां चर्मास्थिपित्तस्नावस्थ-( ? )-दन्तशृङ्गखुरपुच्छानि अन्येषां वापि मृगपशुपक्षिव्यालानाम् ।
(७) कालायसताम्रवृत्तकांस्यसीसत्रपुवैकृन्तकारकूटानि लोहानि ।


( १ ) मालती ( चमेली ), मूर्वा ( मरोरफली ), अर्क ( आक ), शण (सन), गवेथुका ( नागवला ) और अतसी ( अलसी ), आदि वल्कवर्ग के हैं ।

( २ ) मुंज ( मूंज ), बल्वज ( लवा घास ), ये रज्जु, अर्थात् रस्सी बनाने बनाने की घासें हैं । ताली ( ताड़ का एक भेद ), ताल ( ताड़ ),भूर्ज ( भोजपत्र ), इनका पत्ता लिखने के काम में आता है । किंशुक ( पलाश के फूल ), कुसुम्भ ( कुसुम के फूल ), और कंकुम ( केसर ), ये सब वस्त्र आदि रंगने के साधन हैं ।

( ३ ) कंद ( बिदारी, सूरण आदि ), मूल ( अनंतमूल, कामराज, खस आदि ), और फल ( आंवला, हर्रा, बहेडा आदि ), ये सब औषधिवर्ग हैं ।

( ४ ) कालकूट, वत्सनाभ, हलाहल, मेषशृङ्ग, मुस्ता, कुष्ठ, महाविष, वेल्लितक, गोराद्रं, बालक, मार्केट, हैमवत, कलिगक, दारदक, अङ्कोलसारक और कुष्ट्रक इत्यादि सब विष हैं ।

( ५ ) धारीदार साँप, मेंढक तथा छिपकली आदि को सीसे के घड़े में बन्द करके आगे आने वाले 'औपनिषदिक' प्रकरण में लिखी गई विधि के अनुसार जब संस्कार किया जाता है तो वह भी विष बन जाते हैं ।

( ६ ) गोधा ( गोह ), सेरक ( सफद गोह ) द्वीपी ( वघेरा ), शिशुमार (बड़ी जाति की मछली ), सिंह, व्याघ्र, हाथी, भैंसा, चमरगाय, साँभर, गैंडा, गाय, हरिण और नीलगाय इनकी खाल, हड्डी, दाँत पित्ता, नसें, सींग, खुर और पूंछ आदि सभी उपयोग में आने वाली चीजें संग्रह-योग्य हैं; इनके अतिरिक्त अन्य मृग, पशु-पक्षी, साँप आदि जानवरों के चर्म का भी संग्रह करना चाहिए ।

( ७ ) काला लोहा, तांबा, काँसा, सीसा, राँगा, इस्पात और पीतल, ये सब लोहे के भेद हैं ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में कुप्याध्यक्ष सत्रहवां अध्याय समाप्त ।

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प्र० ३३ : अ० १७ ] कुप्य का अध्यक्ष १६९

(१) विदलमृत्तिकामयं भाण्डम् ।
(२) अङ्गारतुषभस्मानि मृगपशुपक्षिव्यालवाटाः काष्ठतृणवाटाश्चेति ।
(३) बहिरन्तरश्च कर्मान्ता विभक्ताः सर्वभाण्डिकाः ।
आजीवपुररक्षार्थाः कार्याः कुप्योपजीविना ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे कुप्याध्यक्षो नाम सप्तदशोऽध्यायः,
आदितोः सप्तत्रिंशः ।

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( १ ) पात्र दो प्रकार के होते हैं एक विदलमय ( पिटारी, टोकरी आदि ) और दूसरे मृत्तिकामय ( घड़े, शकोरे आदि ) ।

( २ ) कोयला, राख, मृग, पशु-पक्षी तथा अन्य जंगली जानवर, लकड़ी और घास-फूस आदि का ढेर भी कुप्य होने के कारण सङ्ग्रह-योग्य हैं ।

( ३ ) कुप्य के अध्यक्ष को और उसके सहयकों को चाहिए कि वे बाहर जंगलों के पास जनपद और दुर्ग आदि में गाड़ा तथा लकड़ी आदि से बनी हुई चीजें या सवारियों; सब तरह के बर्तन आदि को और अपनी आजीविका तथा नगर, जनपद की रक्षा के लिए अन्य आवश्यक वस्तुओं का भी संग्रह करे ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में कुप्याध्यक्ष सत्रहवां अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ३४## आयुधागाराध्यक्षः
अध्याय १८

(१) आयुधागाराध्यक्षः साङ्ग्रामिकं दौर्गकर्मिकं परपुराभिघातिकं यन्त्रमायुधमावरणमुपकरणं च तज्जातकारुशिल्पिभिः कृतकर्मप्रमाणकालवेतनफलनिष्पत्तिभिः कारयेत् । स्वभूमौ च स्थापयेत् । स्थानपरिवर्तनमातपप्रवातप्रदानं च बहुशः कुर्यात् । ऊष्मोपस्नेहकृमिभिरुपहन्यमानमन्यथा स्थापयेत् । जातिरूपलक्षणप्रमाणागममूल्यानिक्षेपैश्चोपलभेत ।

(२) सर्वतोभद्रजामदग्न्यबहुमुखविश्वासघातिसङ्घाटीयानकपर्जन्यकबाहूर्ध्वबाह्वर्धबाहूनि स्थितयन्त्राणि ।


आयुधागार का अध्यक्ष

( १ ) आयुधागार के अध्यक्ष को चाहिए कि वह, युद्धोपयोगी सामग्री तैयार करने वाले कारीगरों एवं कुशल शिल्पियों के द्वारा युद्ध में काम देने वाले, दुर्ग की रक्षा के योग्य शत्रु के नगर को विध्वंस कर देने वाले सर्वतोभद्र ( मशीनगन ), जामदग्न्य आदि यन्त्र, शक्ति, धनुष आदि हथियार कवच और सवारी आदि जितने भी साधन हैं, उनका निर्माण करवाये; उन कारीगरों से कितने समय में कितनी मजदूरी देकर कितना काम कराया जाय इत्यादि बातों को वह पहिले ही से निश्चित कर ले । तैयार हुए सामान को उसके उपयुक्त स्थान में रखवा दिया जाय अथवा अपने ही कब्जे में रखा जाय । अध्यक्ष को चाहिए कि जिससे समान पर जंक आदि न लगे, उसको धूप-हवा भी दिलाता रहे, गर्मी, सील और घुन आदि के कारण जो हथियार खराब हो रहे हों उन्हें वहां से उठवा कर किसी ऐसे स्थान में रखवा दे, कि वे अधिक खराब न होने पावें, उन हथियारों के जाति स्वरूप, लक्षण, लम्बाई, चौड़ाई, मोटाई प्राप्तिस्थान मूल्य और उपयुक्त स्थान आदि के सम्बन्ध में प्रत्येक बात को अच्छी तरह से समझ-बूझ ले ।

( २ ) दश प्रकार के स्थितयंत्र होते हैं, जिनका विवरण इस प्रकार है : १. सर्वतोभद्र ( मशीनगन ), २. जामदग्न्य ( जिसमें बीच के छेद से बड़े-बड़े गोले निकलें ), ३. बहुमुख ( किले की दीवारों में ऊँचाई पर बनाये गये वे स्थान, जहां से सैनिक गोलीवर्षा कर सकें ), ४. विश्वासघाती ( नगर के बाहर तिरछी बनावट का एक ऐसा यन्त्र, जिसको छू लेने से ही प्राणान्त हो जाय ), ५. संघाटि ( लंबे-ऊँचे बांसों से बना हुआ वह यंत्र, जो महलों के ऊपर रोशनी फेंके ), ६. यानक

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प्र० ३४ : अ० १८ ] आयुधागार का अध्यक्ष १७१

(१) पञ्चालिकदेवदण्डसूकरिकामुसलयष्टिहस्तिवारकतालवृन्तमुद्गर-द्रुघणगदास्पृक्तलाकुद्दालास्फोटिमोद्घाटिमोत्पाटिमशतघ्नीत्रिशूलचक्राणि चलयन्त्राणि।
(२) शक्तिप्रासकुन्तहाटकभिण्डिपालशूलतोमरवराहकर्णकणपकर्पण-त्रासिकादीनि च हलमुखानि।


( पहियों पर रखा जाने वाला लम्बा यन्त्र ), ७. पर्जन्यक ( वरुणास्त्र, फायर ब्रिगेड ), ८. बाहुयन्त्र ( पर्जन्यक की भाँति; किन्तु उसका आधा ), ६. ऊर्ध्वबाहु ( ऊपर स्तंभ की आकृति का नजदीक की मार करने वाला यन्त्र ) और १०. अर्धबाहु ( ऊर्ध्वबाहु का आधा )।

( १ ) चलयंत्र भी अनेक हैं, जिनका व्योरा इस प्रकार है : १. पाञ्चलिक ( बढ़िया लकड़ी पर तेज धार का बना यन्त्र, जो परकोटे के बाहर जल के बीच में शत्रु को रोकने के काम में आता है ), २. देवदण्ड ( कील रहित बड़ा भारी स्तम्भ, जो परकोटे के ऊपर रखा रहता है ), ३. सूकरिका ( सूत और चमड़े की या बाँस और चमड़े की बनी मशकरी, जो परकोटे तथा अट्टालक के ऊपर ढक कर रखी जाती है ), ४. मुसलयष्टि ( खैर की मूसल का बना हुआ डंडा, जिसके आगे शूल लगा हो ), ५. हस्तिवारक ( त्रिशूल या त्रिशूल डण्डा ), ६. तालवृन्त ( चारों ओर घूमने वाला यन्त्र ), ७. मुद्गर, ८. द्रुघण ( मुद्गर के ही समान यन्त्र ), ६. गदा, १०. स्पृक्तला ( काँटेदार गदा ), ११. कुद्दाल, १२. आस्फोटिम ( चमड़े से बना हुआ चार कोना वाला, मिट्टी के ढेले या पत्थर फेंकने वाला यन्त्र ), १३. उद्घाटिम ( मुद्गर की आकृति का यन्त्र ), १४. उत्पाटिम ( खंभे आदि को उड़ा देने वाला यन्त्र ), शतघ्नी ( कीले की दीवार के ऊपर रखा जाने वाला बड़े स्तम्भ की आकृति का यन्त्र ), १५. त्रिशूल और १६. चक्र, ये सोलह प्रकार के चलयन्त्र है।

( २ ) हलमुख ( भाले की तरह ) हथियारों के नाम इस प्रकार हैं : १. शक्ति ( कनेर के पत्ते की आकृति का लोहे का बना हथियार ), १. प्रास ( चौबीस अंगुल लम्बा, दुधारा हथियार, जिसकी मूठ बीच में लकड़ी की बनी हो ), ३. कुंत ( सात हाथ का उत्तम, छह हाथ का मध्यम और पाँच हाथ का निकृष्ट ), ४. हाटक ( कुंत के समान तीन कांटों वाला हथियार ), ५. भिण्डिपाल ( मोटे फल वाला, कुन्त के समान ), ६. शूल ( तेज मुख वाला हथियार ), ७. तोमर ( बाण के समान तेज मुख वाला, जो चार हाथ का अधम, साढ़े चार हाथ का मध्यम और पांच हाथ का उत्तम समझा जाता है ), ८. वराहकर्ण ( एक प्रकार का प्रास, जिसका मुख सुअर के कान के समान होता है ), ६. कणप ( लोहे का बना हुआ, दोनों ओर तीन-तीन कांटों से युक्त, चौबीस, बाईस और बीस अंगुल का क्रमशः उत्तम, मध्यम एवं अधम ), १०. कर्पण ( तोमर के समान, हाथ से फेंका जाने वाला बाण ), ११.

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१७२कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

(१) तालचापदारवशाङ्गीणि कार्मुककोदण्डद्रूणा धनूंषि ।
(२) मूर्वार्कशणगवेधुवेणुस्नायूनि ज्याः ।
(३) वेणुशरशलाकादण्डासननाराचाश्च इषवः । तेषां मुखानि छेदन-भेदनताडनान्यायसास्थिदारवाणि ।
(४) निस्त्रिंशमण्डलाग्रासियष्टयः खड्गाः । खड्गमहिषवारणविषाणदारुवेणूमूलानि त्सरवः ।
(५) परशुकुठारपट्टसखनित्रकुद्दालक्रकचकाण्डच्छेदनाः क्षुरकल्पाः ।
(६) यन्त्रगोष्पणमुष्टिपाषाणरोचनीदृषदश्चायुधानि ।
(७) लोहजालजालिकापट्टकवचसूत्रकङ्कटशिशुमारखड्गधेनुकहस्तिगोचर्मखुरभृङ्गसंघातं वर्मणि । शिरस्त्राणकण्ठत्राणकूर्पासकञ्चुकवारवाण-


त्रासिका ( प्रास जितनी, सम्पूर्ण लोहे की बनी ); ये सब हथियार हलमुख कहलाते हैं, क्योंकि इन सभी का अग्रभाग हल के अग्रभाग की तरह तेज होता है ।

( १ ) धनुष चार प्रकार से बनाये जाते हैं : १. ताल ( ताड़ का बना हुआ ), २. चाप ( अच्छे बाँस का बना हुआ ), ३. दारव ( मजबूत लकड़ी का बना हुआ ) और ४. शाङ्ग ( सींगों का बना हुआ ); आकृति और क्रिया-भेद से इनके कार्मुक, कोदण्ड और द्रूण, आदि नाम हैं ।

( २ ) मूर्वा, आख सन, गवेधुकावेणु ( रामबाँस ) और ताँत; इनसे मजबूत धनुष की डोरी बनती है ।

( ३ ) बाण के भी अनेक भेद हैं, जिनके प्रकार हैं : १. वेणु ( बाँस ), २. शर ( नरसल ), ३. शालाका ( मजबूत लकड़ी ), ४. दण्डासन ( आधा लोहा और आधा बाँस ) और ५. नाराच ( सम्पूर्ण लोहे का ) । इन बाणों के अग्रभाग में लोहे, हड्डी तथा मजबूत लकड़ी की बनी नोक छेदने, काटने, आघात पहुँचाने वाला रक्त-सहित एवं रक्तरहित घाव करने के लिए लगी रहती है ।

( ४ ) खड्ग ( तलवार ) तीन प्रकार के होते हैं : १. निस्त्रिंश ( जिसका अगला भाग काफी टेढ़ा हो ), २. मण्डलाग्र ( जिसका अगला हिस्सा कुछ गोलाकार हो ) और ३. असियष्टि ( जिसका आकार पतला एवं लम्बा हो ) । खड्ग के लिए गैंडा, भैंस की सींग, हाथीदाँत, मजबूत लकड़ी और बाँस की जड़ की मूठ बनवानी चाहिए ।

( ५ ) फरसा, कुल्हाड़ा, द्विमुखी त्रिशूल, फावड़ा, कुदाल, आरा और गँड़ासा; ये सब छुरे की धार की भाँति तेज होने के कारण क्षुरकल्प या क्षुरवर्ग के हथियार कहलाते हैं ।

( ६ ) यन्त्रपाषाण, गोष्पणपाषाण, मुष्टिपाषाण, रोचनी और दृषद; ये सब आयुध कहलाते हैं ।

( ७ ) कवच छह प्रकार से बनाये जाते हैं, जिनके तरीके इस प्रकार हैं : १. लोहजाल ( सिर से पैर तक ढकने वाला ), २. लोहजालिका सिर के अलावा सारे

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प्र० ३४ : अ० १८ ] आयुधागार का अध्यक्ष १७३

पट्टनागोदरिकाः । पेटीचर्महस्तिकर्णतालमूलधमनिकाकवाटकटिकाप्रति-
हतवलाहकान्ताश्चावरणानि ।

(१) हस्तिरथवाजिनां योग्याभाण्डमालङ्कारिकं सन्नाहकल्पनाश्रोप-
करणानि । ऐन्द्रजालिकमौपनिषदिकं च कर्म ।

(२) कर्मान्तानां च,

इच्छामारम्भनिष्पत्तिं प्रयोगं व्याजमुद्दयम् ।
क्षयव्ययौ च जानीयात् कुप्यानामायुधेश्वरः ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे आयुधागाराध्यक्षो नाम अष्टादशोऽध्यायः;
आदितोऽष्टचत्वारिंशः ।

—: ० :—


शरीर को ढकने वाला ), ३. लोहपट्ट ( बाहों को छोड़ सारे शरीर को ढक देने वाला ), ४. लोहकवच ( केवल पीठ तथा छाती को ढक देने वाला ), ५. सूत्रकंकण ( सूत का बना कवच ) और ६. मछली, गैंडा, नीलगाय, हाथी तथा बैल, इन पाँचों के चमड़े, खुर एवं सींगों को मिलाकर बनाया हुआ कवच । इनके अतिरिक्त शिरस्त्राण ( सिर को ढक देने वाला ), कंठत्राण ( गले को ढक देने वाला ) कूर्पास ( आधी बाँहों को ढक देने वाला ), कंचुक ( घुटनों तक शरीर को ढक देने वाला ), वारवाण (सारी देह को ढक देने वाला ), पट्ट ( बिना बाहों एवं बिना लोहे का कवच ), नागोदरिका ( केवल हाथ की उङ्गलियों की रक्षा करने वाला ); ये सात प्रकार के आवरण ( कवच ) देह पर धारण किए जाने योग्य हैं । चमड़े की पेटी, मुँह ढकने का आवरण, लकड़ी की पेटी, सूत की पेटी, लकड़ी का पट्टा, चमड़ा एवं बाँस को कूट कर बनाई गई पेटी, पूरे हाथों को ढकने वाला आवरण और किनारों पर लोहे के पत्तों से बँधा आवरण; आदि अनेक प्रकार के होते हैं ।

( १ ) हाथी, घोड़ा, रथ आदि की शिक्षा एवं सजावट के साधन; अंकुश, कोड़े, पताका, कवच और शरीर की रक्षा करने वाले अन्य आवरण; ये सब उपकरण कहलाते हैं । ऐन्द्रजालिक और औपनिषदिक आदि जादू एवं प्रयोग-क्रियायें भी उपकरण कहलाती हैं ।

( २ ) कुप्य के अध्यक्ष को चाहिए कि वह पिछले दो अध्यायों में निर्दिष्ट द्रव्य-व्यापारों से सम्बद्ध कार्यों का आरम्भ एवं उनकी समाप्ति राजा की इच्छा तथा रुचि के अनुसार ही करे; उन विषयों और कार्यों की उपयोगिता, तथा हानि-लाभ को भी वह भलीभाँति समझे; आयुधागार के अध्यक्ष के लिए भी इन बातों का जानना आवश्यक है ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में आयुधागाराध्यक्ष नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

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प्रकरण ३५# तुलामानपौतवम्
अध्याय १९

(१) पौतवाध्यक्षः पौतवकर्मान्तान् कारयेत् ।
(२) धान्यमाषा दश सुवर्णमाषकः । पञ्च वा गुञ्जाः । ते षोडश सुवर्णः कर्षो वा । चतुष्कर्षं पलम् ।
(३) अष्टाशीतिगौरसर्षपा रूप्यमाषकः । ते षोडश धरणम् । शैम्ब्यानि वा विंशतिः ।
(४) विंशतितण्डुलं वज्रधरणम् ।


तोल और माप का अध्यक्ष

( १ ) पौतवाध्यक्ष (तोल-माप की जांच करने वाला सरकारी अफसर) को चाहिये कि वह शास्त्रोक्त विधि से तोलने-मापने के साधन तराजू, बाट आदि बनवाये ।

( २ ) दस उड़द के दाने अथवा पाँच रत्ती परिमाण का एक सुवर्णमाषक होता है । सोलह माष का एक सुवर्ण या एक कर्ष होता है । चार कर्ष का एक पल होता है; अर्थात् :

सोने का तोल

$$\left.\begin{array}{l} \text{१० उर्द के दाने} \ \text{५ रत्ती} \end{array}\right} = \text{१ सुवर्णमाषक}$$
१६ माष = १ सुवर्ण या १ कर्ष
४ कर्ष = १ पल

( ३ ) अठ्ठासी सफेद सरसों परिमाण का एक रूप्यमापक होता है । सोलह रूप्यमापक या बीस मूली के बीज परिमाण का एक धरण होता है; जैसे :

चाँदी का तोल

८८ सफेद सरसों = १ रूप्यमाषक
$$\left.\begin{array}{l} \text{१६ रूप्यमाषक} \ \text{२० मूली के बीज} \end{array}\right} = \text{१ धरण}$$

( ४ ) बीस चावल परिमाण का एक वज्रधरण होता है :

हीरे का तोल

२० चावल = १ वज्रधरण

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प्र० ३५ : अ० १६ ] तौल और माप का अध्यक्ष १७५

(१) अर्धमाषकः, माषकः, द्वौ, चत्वारः, अष्टौ माषकाः, सुवर्णो, द्वौ, चत्वारः, अष्टौ सुवर्णाः, दश, विंशतिः, चत्वारिंशत्, शतमिति ।
(२) तेन धरणानि व्याख्यातानि ।
(३) प्रतिमानान्वयोमयानि मागधमेकलशैलमयानि, यानि वा नोदक-प्रदेहाभ्यां वृद्धिं गच्छेयुरुष्णेन वा ह्रासम् ।
(४) षडङ्गुलादूर्ध्वमष्टाङ्गुलोत्तराः दश तुलाः कारयेल्लोहपलादूर्ध्व-कपलोत्तराः । यन्त्रमुभयतः शिक्यं वा ।
(५) पञ्चविंशत्पललोहां द्विसप्तत्यङ्गुलायामां समवृत्तां कारयेत् । तस्याः पञ्चपलिकं मण्डलं बद्ध्वा समकरणं कारयेत् । ततः कर्षोत्तरं पलं, पलोत्तरं दशपलं, द्वादश पञ्चदश विंशतिरिति पदानि कारयेत् । तत आ शताद् दशोत्तरं कारयेत् । अक्षेषु नद्ध्त्रीपिनद्धं कारयेत् ।


( १ ) तोलने के बाटों ( प्रतिमानों ) का निर्माण इस क्रम से होना चाहिए : आधा माषक, माषक, दो माषक, चार माषक, आठ माषक, सुवर्ण, दो सुवर्ण, चार सुवर्ण, आठ सुवर्ण, दस सुवर्ण, बीस सुवर्ण, तीस सुवर्ण, चालीस सुवर्ण, सौ सुवर्ण, सोना तोलने के लिए ये १४ बाट होने चाहिए ।

( २ ) इसी क्रम से चांदी तोलने के लिए धरण एवं रूप्यमाषक बाटों का भी निर्माण करवाना चाहिए; अर्थात् धरण, दो धरण, चार धरण, आठ धरण, दस धरण, बीस धरण, तीस धरण, चालीस धरण और सौ धरण; एवं अर्ध माषक, माषक, दो माषक, चार माषक, आठ माषक; आदि १४ बाटों का क्रम है ।

( ३ ) तौलने के बाट लोहे के बनने चाहिए या मगध तथा मेकल देश के पत्थर के होने चाहिए; या ऐसी-वस्तुओं के बनने चाहिए, जो पानी पड़ने तथा लेप लगने से वजनी न हो जांय और गर्मी के प्रभाव से हलके न पड़ जांय ।

( ४ ) सोना-चांदी तोलने के लिये छोटी-बड़ी दस तुलाऐं बनवानी चाहिए, जिनका क्रम इस प्रकार है १. छह अंगुल की, २. चौदह अंगुल की, ३. बाईस अंगुल की, ४. तीस अंगुल की ५. अड़तीस अंगुल की, ६. छियालीस अंगुल की, ७. चौवन अंगुल की, ८. बासठ अंगुल की, ६. सत्तर अंगुल की और १०. अठहत्तर अंगुल की; उनका वजन क्रमशः एक पल से १० पल तक होना चाहिए; उनके दोनों ओर पलड़े ( शिक्य ) लगे होने चाहिए ।

( ५ ) सोना-चांदी के अतिरिक्त दूसरे पदार्थों को तोलने के लिए जो तुलायें बनवायी जाँय, उनका आकार-प्रकार इस तरह होना चाहिए; पैतीस पल लोहे से बनी हुई, तीन हाथ लंबी समवृत्ता ( गोलाकार ) नामक तुला अन्य पदार्थों को तोलने के लिए बनवानी चाहिए । उसके बीच में पाँच पल का काँटा लगवाकर ठीक मध्य में एक चिह्न भी करवा देना चाहिए । उसके बाद काँटे की गोलाकार परिधि में उस चिह्न से क्रमशः एक कर्ष, दो कर्ष, तीन कर्ष, चार कर्ष, एक पल, दो पल,

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१७६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) द्विगुणलोहां तुलामतः षण्णवत्यङ्गुलायामां परिमाणीं कारयेत् । तस्याः शतपदादूर्ध्वं विंशतिः, पञ्चाशत्, शतमिति पदानि कारयेत् ।
(२) विंशतितौलिको भारः ।
(३) दशधरणिकं पलम् । तत्पलशतमायमानी ।
(४) पञ्चपलावरा व्यावहारिकी भाजन्यन्तःपुरभाजनी च ।
(५) तासामर्धधरणावरं पलम् । द्विपलावरमुत्तरलोहम् । षडङ्गुलावराश्चायामाः ।


इस प्रकार दस पल तक; दस पल के बाद बारह पल, पन्द्रह पल और बीस पल के चिह्न लगवाये जाँय । फिर बीस पल के आगे दस-दस पल का अन्तर देकर सौ पल तक के चिह्न होने चाहिए । प्रत्येक पाँच पल के बाद, मोटी जानकारी के लिये, लम्बी रेखा बनवा देनी चाहिए ।

( १ ) उक्त समवृत्ता तुला से दुगुने लोहे ( सत्तर पल परिमाण ) से बनी छियानवे अंगुल लम्बी तुला का नाम परिमाणी है । उस पर भी समवृत्ता नामक तुला के ही अनुसार सौ पल तक चिह्न लगाने के बाद एक सौ बीस, एक सौ पचास और दो सौ पल तक के चिह्न और लगने चाहिए ।

( २ ) सौ पल परिमाण की एक तुला और बीस तुला परिमाण का एक भार होता है, यथा :

१०० पल = १ तुला
२० तुला = १ भार

( ३ ) दस धरण का एक पल और सौ पल परिमाण की आयमानी नामक तुला होती है, आयमानी अर्थात् आमदनी की वस्तुओं को तोलनेवाली तुला । जैसे :

१० धरण = १ पल
१०० पल = १ आयमानी

( ४ ) आयमानी से पाँच पल कम ( ९५ पल ) परिमाण की तुला का नाम व्यावहारिकी ( क्रय-विक्रय में व्यवहार योग्य ) है, उससे पाँच पल कम (९० पल) की तुला का नाम भाजनी ( भृत्यों को द्रव्य देने योग्य ), और उससे भी पाँच पल कम ( ८५ पल ) परिमाण की तुला का नाम अन्तःपुरभाजनी ( रानी एवं राजकुमारों को द्रव्य देने योग्य ) है, अर्थात्

९५ पल = १ व्यावहारिकी
९० पल = १ भाजनी
८५ पल = १ अन्तःपुरभाजनी

( ५ ) व्यावहारिकी, भाजनी और अन्तःपुरभाजनी, इन तीनों तुलाओं में उत्तरोत्तर आधा-आधा धरण कम हो जाता है । अर्थात् आयमानी तुला में दस धरण का एक पल होता है तो व्यावहारिकी का ९½ धरण का एक पल भाजनी का ९ धरण का एक पल और अन्तःपुरभाजनी का ८½ धरण का एक पल होना चाहिए । इसी प्रकार इन तुलाओं के बनाने में लोहा भी उत्तरोत्तर दो-दो पल कम लगना

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प्र० ३५ अ० १९ ] तौल और माप का अध्यक्ष १७७

(१) पूर्वयोः पञ्चपलिकः प्रयामो मांसलोहलवणमणिवर्जम् ।
(२) काष्ठतुला अष्टहस्ता पदवती प्रतिमानवती मयूरपदाधिष्ठाना ।
(३) काष्ठपञ्चविंशतिपलं तण्डुलप्रस्थसाधनम् । एष प्रदेशो बह्वल्पयोः ।
(४) इति तुलाप्रतिमानं व्याख्यातम् ।
(५) अथ धान्यमाषद्विपलशतं द्रोणमायमानम् । सप्ताशीतिपलशतमर्धपलं च व्यावहारिकम् । पञ्चसप्ततिपलशतं भाजनीयम् । द्विषष्टिपलशतमर्धपलं चान्तःपुरभाजनीयम् ।

चाहिए, अर्थात् आयमानी तुला यदि पैंतीस पल लोहे की बनाई जाय तो व्यावहारिकी तुला तैंतीस पल की, भाजनी इकत्तीस पल की, और अन्तःपुरभाजनी उन्नीस पल की बनायी जाय । इनकी लम्बाई भी पूर्वापेक्षया उत्तरोत्तर छः-छः अङ्गुल कम होनी चाहिए, यदि आयमानी तुला बहत्तर अङ्गुल लम्बी बनाई जाय तो व्यावहारिकी छियासठ अङ्गुल की, भाजनी साठ अङ्गुल की और अन्तःपुरभाजनी चौवन अङ्गुल की ही हो ।

( १ ) परिमाणी और आयमानी तुलाओं में मांस, लोहा, नमक और मणियों को छोड़ कर अन्य वस्तुओं को तोलने पर पाँच पल अधिक तोला जाता है, इसी को प्रयाम कहते हैं ।

( २ ) लकड़ी की तुला आठ हाथ की होनी चाहिए, जिसमें एक, दो, तीन आदि गिनती के चिह्न बने होने चाहिए, इसके बाट पत्थर के और इसका आकार मोर के पैरों जैसा होना चाहिए ।

( ३ ) एक प्रस्थ चावलों को पकाने के लिए पच्चीस पल लकड़ी पर्याप्त है । इसी हिसाब से कम ज्यादा लकड़ी का उपयोग करना चाहिए ।

( ४ ) यहाँ तक सोलह प्रकार की तुलाऐं और चौदह प्रकार के बाटों का निरूपण किया गया है ।

( ५ ) इसके आगे द्रोण, आढक आदि मापने के साधनों का निरूपण किया जाता है :—दो-सौ पल धान्यमाष-परिमाण का एक आयमान द्रोण ( राजकीय आय को मापने योग्य ) होता है । एक-सौ साढ़े-सत्तासी पल का एक व्यावहारिक ( सर्वसामान्य के उपयोगी ) द्रोण होता है । एक-सौ पचहत्तर पल का एक भाजनीय द्रोण ( भृत्योपयोगी ) होता है, और एक-सौ साढ़े-बासठ पल का अन्तःपुरभाजनीय द्रोण ( अन्तःपुर के उपयोगी ) कहा जाता है, अर्थात् ;

२०० पल धान्यमाषक = १ आयमानद्रोण
१८७ ½ पल " = १ व्यावहारिकद्रोण
१७५ पल " = १ भाजनीयद्रोण
१६२ ½ पल " = १ अन्तःपुरभाजनीय द्रोण

१२ कौ०

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१७८कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

(१) तेषामाढकप्रस्थकुडवाश्चतुर्भागावराः ।
(२) षोडशद्रोणा खारी, विंशतिद्रोणिकः कुम्भः, कुम्भैर्दशभिर्वहः ।
(३) शुष्कसारदारुमयं समं चतुर्भागशिखं मानं कारयेत् । अन्तःशिखं वा । रसस्य तु ।
(४) सुरायाः पुष्पफलयोः तुषाङ्गाराणां सुधायाश्च शिखामानं द्विगुणोत्तरा वृद्धिः ।
(५) सपादपणो द्रोणमूल्यम् । आढकस्य पादोनः । षण्माषकाः प्रस्थस्य । माषकः कुडवस्य ।
(६) द्विगुणं रसादीनां मानमूल्यम् ।
(७) विंशतिपणाः प्रतिमानस्य । तुलामूल्यं त्रिभागः ।


(१) द्रोण का चौथाई आढक, आढक का चौथाई प्रस्थ और प्रस्थ का चौथाई कुडव होता है ।

(२) सोलह द्रोण की एक खारी, बीस द्रोण का एक कुम्भ और दस कुम्भ परिमाण का एक वह होता है, यथा :

१६ द्रोण = १ खारी
२० द्रोण / १ १/४ खारी = १ कुम्भ
१० कुम्भ = १ वह

(३) अनाज मापने के लिए बढ़िया सूखी लकड़ी का ऐसा मान बनवाया जाय, कि जितना अनाज उसमें समा सके, उसका चतुर्थांश उसकी गर्दन में आ जाय, अथवा गर्दन बनाकर ऊपर से नीचे तक उसकी एक जैसी बनावट रहे, उसका मुँह खुला रहना चाहिए । घी-तेल मापने के लिए भी ऐसा ही मान बनवाया जाय ।

(४) शराब, फल, फूल, भूसी, कोयला, और चूना-कलई, इन छह पदार्थों को मापने के लिए जो बर्तन बनवाया जाय उसके ऊपर का हिस्सा, नीचे के हिस्से से दुगुना चौड़ा होना चाहिए और उस पर गर्दन भी बनी होनी चाहिए ।

(५) लकड़ी के बने एक द्रोण परिमाण बर्तन का मूल्य सवा पण होना चाहिए । इसी प्रकार एक आढक परिमाण के बर्तन की कीमत पौन पण, एक प्रस्थ के वर्तन की छह माषक और एक कुडव परिमाण वाले वर्तन की कीमत एक माषक होनी चाहिए ।

(६) घी-तेल आदि द्रव पदार्थों को मापने वाले बर्तनों की कीमत अनाज मापने वाले बर्तनों से दुगुनी होनी चाहिए ।

(७) चौदह प्रकार के सम्पूर्ण बाटों की कीमत बीस पण और सम्पूर्ण तुलाओं की कीमत उसके तिहाई अर्थात् ६ २/३ पण होती है ।

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प्र० ३५ : अ० १९ ] तौल और माप का अध्यक्ष १७९

(१) चातुर्मासिकं प्रातिवेधनिकं कारयेत्। अप्रतिविद्धस्यात्ययः सपादः सप्तविंशतिपणः। प्रातिवेधनिकं काकणिकमहरहः पौतवाध्यक्षाय दद्युः।
(२) द्वात्रिंशद्भागस्तप्तव्याजी सर्पिषश्चतुःषष्टिभागस्तैलस्य। पञ्चाशद्भागो मानस्त्रावो द्रवाणाम्।
(३) कुडवार्धचतुरष्टभागानि मानानि कारयेत्।
(४) कुडबाश्चतुराशीतिर्वारकः सर्पिषो मतः।
चतुःषष्टिस्तु तैलस्य पादश्च घटिकानयोः ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे तुलामानपौतवं नामैकोनविंशोऽध्यायः,
आदित एकोनचत्वारिंशः।

—: ० :—

(१) पौतवाध्यक्ष को चाहिए कि हर चौथे मास वह तुला, बाट, द्रोण आदि का निरीक्षण करे। जो व्यापारी निर्धारित समय पर जाँच न करवावे उसे सवा सत्ताईस पण जुर्माना देना चाहिए। व्यापारियों को चाहिए कि वे एक काकणी प्रतिदिन के हिसाब से चार मास की एक-सौ-बीस काकणी निरीक्षण-कर के रूप में पौतवाध्यक्ष को दें।

(२) यदि गरम घी खरीदा जाय तो उसका बत्तीसवाँ हिस्सा और तेल खरीदा जाय तो उसका चौंसठवाँ हिस्सा छीजन के रूप में अधिक (व्याजी) लेना चाहिए। द्रव पदार्थों में पाँचवाँ हिस्सा छीजन होती है।

(३) छोटी तोल के लिए एक कुडव, आधा कुडव, चौथाई कुडव तथा आठवाँ हिस्सा कुडव, ये चार प्रकार के बाट और माप बनवाने चाहिए।

(४) घी तोलने के लिए चौरासी कुडव परिमाण का एक वारक और तेल तोलने के लिए चौसठ कुडव का एक वारक माना गया है। इक्कीस कुडव की एक घृतघटिका और सोलह कुडव की एक तैलघटिका होती है।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में तुलामानपौतव नामक उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त।

—: ० :—

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प्रकरण ३६देशकालमानम्
अध्याय २०

(१) मानाध्यक्षो देशकालमानं विद्यात् ।
(२) अष्टौ परमाणवो रथचक्रविप्रुट् । ता अष्टौ लिक्षा । ता अष्टौ यूकामध्यः । ते अष्टौ यवमध्यः । अष्टौ यवमध्याः अङ्गुलम् ।
(३) मध्यमस्य पुरुषस्य मध्यमाया अङ्गुल्या मध्यप्रकर्षो वाऽङ्गुलम् ।
(४) चतुरङ्गुलो धनुर्ग्रहः । अष्टाङ्गुला धनुर्मुष्टिः ।
(५) द्वादशाङ्गुला वितस्तिः, छायापौरुषं च । चतुर्दशाङ्गुलं शमः शलः परिरयः पदं च । द्विवितस्तिररत्निः प्राजापत्यो हस्तः ।
(६) सधनुर्ग्रहः पौतवविवीतमानम् । सधनुर्मुष्टिः किष्कुः कंसो वा ।


देश और काल का मान

( १ ) पौतवाध्यक्ष को चाहिए कि वह देश और काल का मान भी अच्छी तरह से जान ले । उसकी जानकारी के सूत्र इस प्रकार हैं :

( २ ) ८ परमाणु = १ धूलकण
८ धूलकण = १ लिक्षा
८ लिक्षा = १ यूकामध्य
८ यूकामध्य = १ यवमध्य
८ यवमध्य = १ अंगुल

( ३ ) अथवा मध्यम कोटि के पुरुष की मध्यमा की मोटाई का माप एक अंगुल बराबर होता है ।

( ४ ) ४ अंगुल = १ धनुर्ग्रह
$$\left.\begin{aligned} &\text{८ अंगुल} \ &\text{२ धनुर्ग्रह} \end{aligned}\right}$$ = १ धनुर्मुष्टि
(पाठ संरचना: ८ अंगुल / २ धनुर्ग्रह = १ धनुर्मुष्टि)

( ५ )
$$\left.\begin{aligned} &\text{१२ अंगुल} \ &\text{३ धनुर्ग्रह} \ &\text{१ ½ धनुर्मुष्टि} \end{aligned}\right}$$ = १ वितस्ति या १ छायापुरुष
(पाठ संरचना: १२ अंगुल / ३ धनुर्ग्रह / १ ½ धनुर्मुष्टि = १ वितस्ति या १ छायापुरुष)
१४ अंगुल = १ शम, शल परिरय या पद ( पैर )
२ वितस्ति = १ अरत्नि, प्राजापत्य हाथ

( ६ ) २८ अङ्गुल = १ हाथ ( विवीत और पौतव नापने के लिये )
३२ अङ्गुल = १ किष्कु या कंस

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प्र० ३६ : अ० २० ] देश और काल का मान १४१

(१) द्विचत्वारिंशदङ्गुलस्तक्षणः क्राकचिककिष्कुः स्कन्धावारदुर्ग-राजपरिग्रहमानम् । चतुःपञ्चाशदङ्गुलः कुप्यवनहस्तः ।
(२) चतुरशीत्यङ्गुलो व्यामो रज्जुमानं खातपौरुषं च ।
(३) चतुररत्निर्दण्डो धनुर्नालिका पौरुषं च ।
(४) गार्हपत्यमष्टशताङ्गुलं धनुः पथिप्राकारमानम् । पौरुषं च अग्निचित्यानाम् ।
(५) षट्कंसो दण्डो ब्रह्मदेयातिथ्यमानम् । दशदण्डा रज्जुः । द्विरज्जुकः परिदेशः । त्रिरज्जुकं निवर्त्तनम् ।
(६) एकतो द्विदण्डाधिको बाहुः द्विधनुःसहस्रं गोरुतम् । चतुर्गोरुतं योजनम् । इति देशमानम् ।
(७) कालमानमत ऊर्ध्वम् । तुटो लवो निमेषः काष्ठा कला नालिका


( १ ) ४२ अङ्गुल = १ हाथ ( छावनी आदि में बढ़ई के उपयोगार्थ )
३२ अङ्गुल = १ किष्कु या कंस ( छावनी आदि में लकड़ी चीरने के लिये )
५४ अङ्गुल = १ हाथ (जंगली लकड़ी और पदार्थ नापने के लिये)
( २ ) ८४ अङ्गुल = १ हाथ ( रस्सी, खाई और कुआँ नापने के लिए )
( ३ ) ४ अरत्नि = १ दण्ड, धनु, नालिका, पौरुष
( ४ ) १०८ अङ्गुल = १ गार्हपत्यधनु ( विश्वकर्मा द्वारा निश्चित, सड़क, किला एवं परकोटा नापने के लिए )
१०८ अङ्गुल = १ पौरुष ( यज्ञसम्बन्धी कार्यों के लिए )
( ५ ) ६ कंस } = १ दण्ड ( ब्राह्मण आदि को भूमिदान देने के लिए )
८ हाथ }
१० दण्ड } = १ रज्जु
४ अरत्नि }
२ रज्जु = १ परिदेश
३ रज्जु } = १ निवर्त्तन
१३ परिदेश }
( ६ ) ३० + ३२ दण्ड = १ बाहु ( पूरा हाथ )
६६६ २/३ निवर्त्तन } = १ गोरुत ( १ कोश )
२००० धनु }
४ गोरुत = १ योजन

यहाँ तक देश-मान का निरूपण किया गया है ।
( ७ ) इसके बाद काल-मान का निरूपण किया जाता है । तुट, लव, निमेष,

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१८४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

मुहूर्तः पूर्वापरभागौ दिवसो रात्रिः पक्षो मास ऋतुरयनं संवत्सरो युगमिति कालः ।
(१) निमेषचतुर्भागस्तुटः ।
(२) द्वौ त्रुटौ लवः ।
(३) द्वौ लवौ निमेषः ।
(४) पञ्च निमेषाः काष्ठाः ।
(५) त्रिंशत् काष्ठाः कला ।
(६) चत्वारिंशत् कला नाडिका ।
(७) सुवर्णमाषकाश्चत्वारश्चतुरंगुलायामाः कुम्भच्छिद्रकाढकमम्भसो वा नालिका ।
(८) द्विनालिको मुहूर्तः । पञ्चदशमुहूर्तो दिवसो रात्रिश्च चैत्रे मास्याश्वयुजे च मासि भवतः । ततः परं त्रिभिर्मुहूर्तैरन्यतरः षण्मासं वर्धते ह्सते चेति ।
(९) छायायामष्टपौरुष्यामष्टादशभागच्छेदः, षट्पौरुष्यां चतुर्दश-


काष्ठा, कला, नालिका, मुहूर्त, पूर्वाह्ण, अपराह्न, दिन, रात, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर और युग, काल के ये सत्रह विभाग हैं ।

( १ ) निमेष = पलक मारने तक का समय, त्रुटि = निमेष का चौथा हिस्सा
( २ ) २ त्रुटि = १ लव
( ३ ) २ लव = १ निमेष
( ४ ) ५ निमेष = १ काष्ठा
( ५ ) ३० काष्ठा = १ कला
( ६ ) ४० कला = १ नालिका
( ७ ) अथवा एक घड़े में चार सुवर्णमाषक के बराबर चौड़ा और चार अंगुल लम्बा छेद बनाकर इतने ही परिमाण की एक नली घड़े में लगा दी जाय, उस घड़े में एक आढ़क जल भर दिया जाय । वह जल उस नली के द्वारा जितने समय में बाहर निकले, उतने समय को नलिका कहते हैं ।
२ नालिका = १ मुहूर्त
१५ मुहूर्त = १ दिन या १ रात

( ८ ) इस मान के दिन और रात केवल चैत तथा आश्विन मास में होते हैं । इसके बाद छह-मास तक दिन बढ़ता और रात्रि घटती है, दूसरे छह महीने तक रात्रि बढ़ती है और दिन घटता रहता है ।

( ९ ) जब धूपघड़ी की छाया ९६ अङ्गुल लम्बी हो तो दिन का अठारहवां भाग समाप्त हुआ समझना चाहिए, ७२ अङ्गुल छाया रहने पर दिन का चौदहवां भाग,