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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 261 of 918

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Page 261

प्र० ३५ अ० १९ ] तौल और माप का अध्यक्ष १७७

(१) पूर्वयोः पञ्चपलिकः प्रयामो मांसलोहलवणमणिवर्जम् ।
(२) काष्ठतुला अष्टहस्ता पदवती प्रतिमानवती मयूरपदाधिष्ठाना ।
(३) काष्ठपञ्चविंशतिपलं तण्डुलप्रस्थसाधनम् । एष प्रदेशो बह्वल्पयोः ।
(४) इति तुलाप्रतिमानं व्याख्यातम् ।
(५) अथ धान्यमाषद्विपलशतं द्रोणमायमानम् । सप्ताशीतिपलशतमर्धपलं च व्यावहारिकम् । पञ्चसप्ततिपलशतं भाजनीयम् । द्विषष्टिपलशतमर्धपलं चान्तःपुरभाजनीयम् ।

चाहिए, अर्थात् आयमानी तुला यदि पैंतीस पल लोहे की बनाई जाय तो व्यावहारिकी तुला तैंतीस पल की, भाजनी इकत्तीस पल की, और अन्तःपुरभाजनी उन्नीस पल की बनायी जाय । इनकी लम्बाई भी पूर्वापेक्षया उत्तरोत्तर छः-छः अङ्गुल कम होनी चाहिए, यदि आयमानी तुला बहत्तर अङ्गुल लम्बी बनाई जाय तो व्यावहारिकी छियासठ अङ्गुल की, भाजनी साठ अङ्गुल की और अन्तःपुरभाजनी चौवन अङ्गुल की ही हो ।

( १ ) परिमाणी और आयमानी तुलाओं में मांस, लोहा, नमक और मणियों को छोड़ कर अन्य वस्तुओं को तोलने पर पाँच पल अधिक तोला जाता है, इसी को प्रयाम कहते हैं ।

( २ ) लकड़ी की तुला आठ हाथ की होनी चाहिए, जिसमें एक, दो, तीन आदि गिनती के चिह्न बने होने चाहिए, इसके बाट पत्थर के और इसका आकार मोर के पैरों जैसा होना चाहिए ।

( ३ ) एक प्रस्थ चावलों को पकाने के लिए पच्चीस पल लकड़ी पर्याप्त है । इसी हिसाब से कम ज्यादा लकड़ी का उपयोग करना चाहिए ।

( ४ ) यहाँ तक सोलह प्रकार की तुलाऐं और चौदह प्रकार के बाटों का निरूपण किया गया है ।

( ५ ) इसके आगे द्रोण, आढक आदि मापने के साधनों का निरूपण किया जाता है :—दो-सौ पल धान्यमाष-परिमाण का एक आयमान द्रोण ( राजकीय आय को मापने योग्य ) होता है । एक-सौ साढ़े-सत्तासी पल का एक व्यावहारिक ( सर्वसामान्य के उपयोगी ) द्रोण होता है । एक-सौ पचहत्तर पल का एक भाजनीय द्रोण ( भृत्योपयोगी ) होता है, और एक-सौ साढ़े-बासठ पल का अन्तःपुरभाजनीय द्रोण ( अन्तःपुर के उपयोगी ) कहा जाता है, अर्थात् ;

२०० पल धान्यमाषक = १ आयमानद्रोण
१८७ ½ पल " = १ व्यावहारिकद्रोण
१७५ पल " = १ भाजनीयद्रोण
१६२ ½ पल " = १ अन्तःपुरभाजनीय द्रोण

१२ कौ०